
जामा मस्जिद के सामने इस तरह लग रही बकरों की मंडी।
नीमच. कान कटा हो या लंगड़ा हो। या फिर काड़ा ही क्यों न हो। सिंग टूट गया हो तो इस तरह के बकरे कोई नहीं खरीदता। यहां तक कि बीमा कम्पनी द्वारा कान में पहनाए गए बिल्ले की वजह से भी ईद पर कुर्बानी के लिए कोई ऐसा बकरा नहीं खरीदता। यही कारण है कि कुर्बानी के लिए बकरे को काफी हिफाजत के साथ बड़ा करना पड़ता है।
बच्चे की तरह करना पड़ती है देखभाल
बुधवार को चांद दिखने पर ईदुलजुहा पर्व मनाया जाएगा। इसके लिए मुस्लिम समाजजन बड़ी संख्या में बकरों की खरीदी कर रहे हैं। कसाई के पास बकरों की कमी नहीं रहती, लेकिन कुर्बानी का कबरा तैयार करने के लिए उसे बच्चों की तरह पालना पड़ता है। 8 से 10 माह के बच्चे को कुर्बानी के लिए तैयार किया जाता है। जब बकरा दो बार दांत तोड़ देता है इसके बाद उसे कुर्बानी के लिए तैयार माना जाता है। नीमच शहर में ऐसे बकरे तैयार होते हैं जिनकी महानगरों तक में काफी मांग है। मुम्बई, इंदौर, रतलाम, बांसवाड़ा आदि शहरों में नीमच से बकरे भेजे जाते हैं। प्रतिस्पर्धा बढऩे की वजह से अब नीमच से अन्य शहरों में भेजे जाने वाले तैयार बकरों की संख्या कम हो गई है।
600 के करीब बिक जाते हैं बकरे
कुर्बानी के लिए शहर में बड़ी संख्या में समाजजनों ने बकरे खरीदे हैं। जानकारों की माने तो करीब 550 से 600 बकरे इस अवसर पर बिक जाते हैं। नीमच में 4-5 व्यापारी ऐसे हैं जो कुर्बानी के लिए बकरे थोक में तैयार करते हैं। अन्य लोग आसपास के गांवों से यहां बेचने आते हैं। बाजार में 13 हजार से 45 हजार तक की कीमत का बकरा बिका है। वजन के मान से 30 किलो से लेकर 90 किलो वजन तक के बकरे बाजार में उपलब्ध हैं।
अजमेर से मंगवाते हैं हरी लूम
हर साल कुर्बानी के लिए करीब तीन दर्जन बकरे तैयार करता हूं। इनके खाने पीने और रहने का विशेष ध्यान रखना पड़ता है। बकरे को चोट नहीं लगे। उसका सींग नहीं टूटे इस बात का खास ध्यान रखा जाता है। बकरों को तैयार करने के लिए अजमेर, नसीराबाद आदि शहरों से हरी लूम मंगवाते हैं। इसके अतिरिक्त मक्का और जौ बकरों को खिलाई जाती है। सर्दी-गर्मी और बारिश से बचाने के विशेष इंतजाम किए जाते हैं। कमाई साल में एक बार होती है और खर्चा पूरे साल करना पड़ता है।
- अब्दुल जब्बार कुरैशी, थोक व्यापारी
Published on:
19 Aug 2018 10:50 pm
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