
गांव में नाले में बेस्ट क्वालिटी की लहसुन बहाते हुए किसान दिलीपकुमार अहीर।
मुकेश सहारिया, नीमच. 16 साल देश सेवा की। स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने के बाद से गांव में रहकर ही खेती रह रहे हैं दिलीपकुमार अहीर। अपने खून पसीने से पैदा की 40 कट्टे लहसुन उन्होंने गांव के नाले में बहा दी। पीड़ा यह कि जितनी लागत लहसुन पैदा करने में लगी उतनी भी कीमत नहीं मिल रही थी। बेचने के लिए मंडी लेकर जाता तो अतिरिक्त खर्चा अलग से हो जाता।
लोगों को पेट भरने वाला अन्नदाता आज भी बेसहारा
बकौल दिलीपकुमार मैंने अपने गांव चौकानखेड़ा तहसील जावद में एक बीघा में लहसुन की बोवनी की थी। लहसुन बोवनी के लिए तमिलनाडू से बीज लेकर आया था। 26 हजार 762 रुपए का बीज पड़ा था। कड़ी मेहनत और पसीना बहाकर लहसुन पैदा की थी। उत्पादन भी अच्छा हुआ। जब मंडी में बेचने का समय आया तो पता चला कि जितने दाम मिल रहे हैं उससे तो लागत भी नहीं निकल रही है। एक बार मन में विचार आया मंडी में जाकर बेचने का प्रयास करे। तब पता चला कि भाड़ा भी काफी भारी पड़ेगा। ऐसे में एक ही रास्ता बचा था लहसुन को नष्ट कर दूं। एक बार तो सोचा अच्छी क्वालिटी की हैै बर्बाद नहीं करूं, लेकिन बाद में गांव के बहते नाले में ही 40 कट्टे लहसुन बहा दी। इसका मुझे कोई दु:ख या मलाल नहीं है।
आवश्यक वस्तुओं के दाम आसमान और उपज के धरातल पर
अहीर ने बताया कि मन में बस एक ही बात चुभ रही है कि देश सेवा में अपने प्राणों की परवाह नहीं की थी, लेकिन देश का अन्नदाता आज भी बेबस और लाचार है। उसकी कहीं कोई सुनवाई नहीं होती। पिछले 5-7 सालों में आवश्यक वस्तुओं के दामों में वृद्धि का आंकलन करें तो पाएंगे कि उपज के दाम उस तेजी से नहीं बढ़े हैं। पिछले 5-7 साल पहले गेहूं या अन्य उपज के जितने दाम थे उससे कुछ ही दाम बढ़े होंगेे। जबकि अन्य आवश्यक वस्तुओं के दाम आज आसमान छू रहे हैं। बिजली बिल, खाद, बीज, मजदूरी आदि के साथ किसान की मेहनत जोड़े तो मंडी में उपज के मिलने वाले दामों से अधिक तो खर्चा बैठता है। एक बीघा में लहसुन पैदा करने में ही 40 से 45 हजार रुपए का खर्चा बैठता, लेकिन दाम 400 से 1000 रुपए तक हैं। ऐसे में मजबूर किसान इस तरह के कदम नहीं उठाएगा तो और क्या करेगा।
आत्महत्या करने को मजबूर हो जाएगा किसान
भारत में किसान की और मंडी में उपज की वेल्यू नहीं बची। मैंने 16 साल सेना में रहकर देश सेवा की। स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने के बाद से गांव में खेती कर रहा हूं। एक किसान को उसकी मेहनत का औसत प्रतिदिन कम से कम 250 से 300 रुपए मेहनताना तो मिलना ही चाहिए। एक बीघा में लहसुन बोया था, लेकिन लागत तक नहीं मिलने पर मैंने 40 कट्टे लहसुन गांव के ही नाले में बहा दिया। लहसुन अच्छी क्वालिटी का था। किसान को उसकी उपज का वाजिब दाम नहीं मिलेगा तो वो आत्महत्या करने जैसे आत्मघाती कदम भी उठाने को मजबूर होगा।
- दिलीपकुमार अहीर, पीडि़त किसान
Published on:
01 Jan 2023 08:11 pm
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