नीमच. जय भादवामाता, जय मातादी, भादवामाता की जय हो आदि जयकारों से भादवामाता का दरबार गूंज उठा। बुधवार को हजारों की संख्या में श्रद्धालु माता के दरबार दर्शन के लिए पहुंचे। इस अवसर पर महिला पुरूषों के अलग अलग कतारें मंदिर परिसर के बाहर दूर तक लग गई थी। ऐसे में हर कोई हाथ में फूल, माला, अगरबत्ती, प्रसाद लेकर अपनी बारी आने का इंतजार करता दिखा।
शाम से ही नंगे पैर मां के दरबार की ओर रवाना हो गए थे भक्त
नवरात्रि के दौरान सबसे अधिक संख्या में पहुंचने वाले श्रद्धालुओं की संख्या अष्टमी पर नजर आई। बड़ी संख्या में लोग परिवार सहित माता के दरबार में शीश झुकाने पहुंचे। अष्टमी पर माता के दरबार में दूरदराज से भी हजारों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। श्रद्धालुओं ने माता के दर्शन के पश्चात मेले का लुत्फ भी उठाया। वैसे बुधवार शाम से ही नीमच से भादवामाता तक का मार्ग जय मातादी के जयकारों से गूंजने लगा था। किसी के हाथों में ध्वजाएं थी तो कोई सिर पर चुनरी बांधे था। हर एक के मुंह से जय मातादी के नारे सुनाई दे रहे थे। मार्ग के दोनो तरफ जल-पान के कई स्टॉल लगे थे जहां माता के भक्त हाथ जोड़कर पदयात्रियों को स्वल्पाहार, फलिहारी, दूध चाय या ठंडा पीने की मनुहार कर रहे थे। अनुमान है कि अष्टमी पर लगभग ८० हजार से अधिक श्रद्धालुओं ने माता के दर्शन किए। भादवामाता के दर्शन के लिए हजारों की संख्या में पदयात्री शाम से ही नीमच से भादवामाता की ओर रवाना हो गए थे। अष्टमी पर शुभ मुहुर्त में यज्ञ आरंभ हुआ। अष्टमी पर माता के दर्शन के लिए नीमच सहित अन्य नगरों, गावों के लोग बड़ी संख्या में पदयात्रा करते हुए माता के दरबार में पहुंचे। कोई माता के भजनों पर नृत्य करते चल रहे थे तो कोई झूमते, जयकारे लगाते चल रहे थे।
६० से अधिक स्टॉलों पर कराया जलपान
पदयात्रियों के लिए मार्ग में सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक दलों की ओर से नीमच से भादवामाता तक के १९ किलोमीटर के मार्ग के दोनों ओर लगभग ६० से अधिक स्टॉल लगाए गए थे। इन स्टॉल पर सेवा दे रहे भक्तों ने पदयात्रियों की मनुहार कर उन्हें चाय पकोड़े, ठंडा दूध, लस्सी, फलिहारी, फ्रूट सलाद, सहित कई व्यंजन परोसे। कुछ स्थानों पर लंगर भी लगाए गए थे। माता के दरबार में पदयात्रियों के अलावा बैलगाड़ी से कोई चौपहिया तो कोई दुपहिया वाहनों से भी दर्शनार्थी पहुंचे। बसों में भी भारी भीड़ रही। देर रात तक यह सिलसिला जारी रहा। इसके साथ नवरात्रि मेले का भी समापन हो गया। माता के दरबार में एक ओर हवन चल रहा था तो दूसरी तरफ माता के दर्शनार्थ भक्तों की कतार खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही थी। अष्टमी की सुबह से प्रारंभ हुआ सिलसिला, नवमीं की सुबह तक जारी रहा। मालवा एवं मेवाड़ के अलावा दूरदराज से भी बड़ी संख्या में यहां पर लकवाग्रस्त रोगियों एवं उनके परिजनों ने पवित्र बावड़ी के जल से स्नान कर आरोग्य लाभ लिया। श्रद्धालुओं एवं रोगियों के लिए यहां ठहरने, पेयजल, सुविधाघर आदि के व्यापक इंतजाम किए गए थे।