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पृथ्वी पर सबसे बड़े विनाश के बाद फूटे नए जीवन के अंकुर

नीड़ का निर्माण फिर-फिर : 3.26 अरब साल पहले टकराया था माउंट एवरेस्ट से चार गुना बड़ा उल्कापिंड

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न्यूयॉर्क. अब तक माना जाता था कि 6.6 करोड़ साल पहले विशाल उल्कापिंड ने पृथ्वी पर भयंकर तबाही मचाई थी, जिससे डायनासोर और कई अन्य जीव खत्म हो गए थे। अमरीकी वैज्ञानिकों के नए शोध में दावा किया गया कि यह पृथ्वी से टकराने वाला सबसे बड़ा उल्कापिंड नहीं था। सबसे विशाल उल्कापिंड 3.26 अरब साल पहले पृथ्वी से टकराया था, जो बाद के उल्कापिंड से 200 गुना और माउंट एवरेस्ट से चार गुना बड़ा था।‘प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज’ जर्नल से छपे हार्वर्ड यूनिव्र्सिटी के वैज्ञानिकों के शोध में इस उल्कापिंड को ‘विशाल उर्वरक बम’ बताया गया, क्योंकि इससे पृथ्वी पर भारी विनाश के साथ जीवन के नए अंकुर भी फूटे। उल्कापिंड टकराने के बाद पृथ्वी पर फास्फोरस और आयरन के भंडार बढ़े। इससे उस काल के बैक्टीरिया और ‘आर्किया’ (एक-कोशीय प्राचीन जीव) को पनपने के लिए जरूरी पोषक तत्व मिले।

पहले के मुकाबले ज्यादा तेजी से फले-फूले

शोधकर्ताओं ने दक्षिण अफ्रीका के उत्तर-पूर्वी इलाके में बार्बर्टन ग्रीनस्टोन बेल्ट की प्राचीन चट्टानों पर इस उल्कापिंड के प्रभाव का अध्ययन किया। उन्हें प्राचीन कार्बनिक पदार्थों के रासायनिक संकेत और समुद्री बैक्टीरिया के जीवाश्म मिले। इससे पता चला कि विनाश के बाद जीवन सामान्य दशा में लौट आया था। पृथ्वी पर जीवन पनपने की प्रक्रिया न सिर्फ तेज हुई, बल्कि यह पहले के मुकाबले ज्यादा फल-फूल गया।

चट्टानें बनीं भाप, उबलने लगा समुद्र

शोध की मुख्य लेखक नादया ड्राबॉन का कहना है कि उल्कापिंड का व्यास करीब 37-58 किलोमीटर था। पृथ्वी से इसकी टक्कर इतनी विनाशकारी थी कि कई चट्टानें भाप और धूल में बदलकर पूरी पृथ्वी पर फैल गईं। टक्कर ने समुद्री तलों को उखाड़ फेंका। ऊर्जा ने वातावरण इतना गर्म कर दिया कि समुद्र की ऊपरी सतह उबलने लगी। धूल बैठने और वातावरण ठंडा होने में कई दशक लगे होंगे।