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कोमा में पति, लेकिन मां बनने की चाह में खटखटाया हाई कोर्ट का दरवाजा

Coma sperm freeze case: दिल्ली में एक महिला ने कोमा में पड़े अपने पति का स्पर्म फ्रीज कराने की अनुमति के लिए हाई कोर्ट का रुख किया है। वह भविष्य में अपने पति के बच्चे की मां बनना चाहती है। लेकिन मौजूदा कानून के अनुसार इसमे पति पत्नी दोनों की सहमति की जरूरत होती है। इस वजह से यह केस चुनौती बन गया है।
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नई दिल्ली

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Harshita Saini

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Updated: 9 Apr 2026, 3:01 PM IST

coma sperm freeze case delhi high court wife seeks permission for husband sperm preservation

दिल्ली हाईकोर्ट (Source-ANI)

Coma sperm freeze case: दिल्ली में एक महिला ने अपने कोमा में पड़े पति से जुड़े बहुत संवेदनशील मामले को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। महिला का पति पिछले साल से कोमा में है और आईसीयू में जिंदगी के लिए संघर्ष कर रहा है, लेकिन पत्नी अपने भविष्य को लेकर एक अहम कदम उठाना चाहती है। उसने अदालत से गुहार लगाई है कि उसके पति का स्पर्म सुरक्षित रखा जाए, ताकि वह आगे चलकर उनके बच्चे को जन्म दे सके। यह सिर्फ इच्छा का मामला नहीं है बल्कि समाज में प्रजनन अधिकार, सहमति और मेडिकल एथिक्स का भी मामला है।

पत्नी ने बताई अपनी मजबूरी

महिला के वकील ने कोर्ट में कहा कि इस मामले में देर करना ठीक नहीं होगा। समय बीतने के साथ स्पर्म की क्वालिटी खराब हो सकती है, जिससे आगे चलकर बच्चा होना मुश्किल हो सकता है। महिला बस इतना चाहती है कि वह अपने पति के बच्चे की मां बन सके, इसलिए उसने यह मांग की है। उसने कोर्ट से यह भी कहा है कि एक डॉक्टरों की टीम बनाई जाए, जो मरीज की हालत देखकर तय करे कि स्पर्म निकालना सुरक्षित है या नहीं।

कैसे होता है स्पर्म सुरक्षित करने का प्रोसेस?

डॉक्टरों के अनुसार, इस प्रक्रिया को सर्जिकल स्पर्म रिट्रीवल कहते हैं। इसमें एक पतली सुई की मदद से टेस्टिस से स्पर्म निकाला जाता है। इसके बाद उसे बहुत ठंडे तापमान, करीब माइनस 196 डिग्री पर सुरक्षित रखा जाता है, ताकि वह लंबे समय तक खराब न हो। इस तरीके को क्रायोप्रिजर्वेशन कहा जाता है। बाद में IVF जैसी तकनीक से इस स्पर्म का इस्तेमाल करके बच्चा पैदा किया जा सकता है।

पति की सहमति लेना सबसे बड़ी चुनौती

इस मामले में सबसे बड़ी दिक्कत कानूनी है। मौजूदा नियमों के अनुसार, स्पर्म के संरक्षण और उपयोग के लिए पति-पत्नी दोनों की सहमति जरूरी होती है। लेकिन यहां पति कोमा में है और अपनी इच्छा जाहिर करने की स्थिति में नहीं है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या पत्नी अकेले इस फैसले का अधिकार रखती है? कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में ऐसे मामले बेहद कम सामने आए हैं, जिससे इस पर स्पष्ट दिशा-निर्देश भी नहीं हैं। यही वजह है कि यह केस अदालत के लिए भी चुनौतीपूर्ण बन गया है। चूंकि इस ममाले में कोई भी फैसला मौजूदा नियमों को प्रभावित कर सकता है। इस वजह से केंद्र सरकार भी इस केस पर नजर बनाए हुए है और गंभीरता के साथ इस केस के बारे में विचार किय जा रहा है।