
नई दिल्ली। कर्नाटक में सिद्धारमैया से मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिलवाकर डी के शिवकुमार के मुख्यमंत्री बनने का रास्ता सुगम किया गया है। केरल के बाद कर्नाटक में बिना किसी विरोध के कांग्रेस में मुख्यमंत्री बनाने को लेकर यह कदम संकेत दे रहा है कि राहुल गांधी और पार्टी आलाकमान संगठन को यथास्थिति से निकालकर फिर उसी शैली में ले जाना चाहते हैं, जिसकी पहचान कभी इंदिरा गांधी और बाद में राजीव गांधी के दौर में बन गई थी।
पार्टी के भीतर इसे काम करने वालों को मौका वाला मॉडल कहा जा रहा है। जहां वरिष्ठता या गुटीय दबाव से ज्यादा महत्व राजनीतिक उपयोगिता, नेतृत्व के प्रति भरोसे और चुनावी लड़ाई लड़ने की क्षमता को दिया जाता है।
करीब 25 साल में सोनिया गांधी से लेकर राहुल गांधी और अब मल्लिकार्जुन खरगे के सियासी युग में कांग्रेस ने अपने स्थापित मुख्यमंत्री को हटाने का जोखिम दूसरी बार लिया है। इससे पहले 2004 में केरल में ए के एंटोनी को इसी तरह मुख्यमंत्री पद से हटाया गया था। वहीं पंजाब में तत्कालीन मुख्यमंत्री अमरिन्दर सिंह को हटाकर उनकी जगह चरणजीत चन्नी को मुख्यमंत्री बनाया गया था, लेकिन पंजाब में जबरदस्त गुटबाजी और मुख्यमंत्री का विरोध था। जबकि कर्नाटक में फिलहाल इस तरह की कड़वाहट देखने को नही मिली है।
सूत्रों ने बताया कि भाजपा से मुकाबला करने के लिए कांग्रेस नेतृत्व पर खास ध्यान दे रही है। महज एक दो नेताओं की बजाय नई लीडरशिप विकसित करने पर पार्टी का जोर है। आने वाले कुछ महीनों में पंजाब, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों को लेकर पार्टी बड़े फैसले कर सकती है।
राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में 2018 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने जीत हासिल की थी, लेकिन वरिष्ठ नेताओं के सामने कांग्रेस आलाकमान सख्त फैसला नहीं ले सका। ऐसे में मध्यप्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया की बगावत के चलते कांग्रेस सरकार गिर गई। जबकि राजस्थान और छत्तीसगढ़ में पूरे पांच साल कांग्रेस को सरकार चलाने में दिक्कत का सामना करना पड़ा था।
इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के दौर में राज्यों में कांग्रेस के पांच साल के कार्यकाल में दो से चार बार तक मुख्यमंत्री बदल दिए जाते थे। इसके चलते एंटी इंकबंसी का खतरा कम हो जाता था। * सोनिया दौर में स्थिरता, लेकिन ठहराव भी सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने राष्ट्रीय राजनीति में वापसी की और लंबे समय तक सत्ता में रही। लेकिन इस दौर में नेतृत्व प्रबंधन का तरीका अलग था। भरोसेमंद और स्थापित नेताओं पर लंबी निर्भरता बढ़ती गई। असम में तरुण गोगोई और दिल्ली में शीला दीक्षित को करीब 15 साल मुख्यमंत्री पद पर रखा। जबकि राजस्थान में अशोक गहलोत, हरियाणा में भूपेंद्र हुड्डा लंबे समय तक कांग्रेस का केंद्रीय चेहरा बने रहे। इन नेताओं ने अपने-अपने राज्यों में मजबूत प्रशासनिक और राजनीतिक ढांचा जरूर बनाया, लेकिन कांग्रेस धीरे-धीरे नए नेतृत्व निर्माण की प्रक्रिया खोती चली गई।
कई राज्यों में संगठन कुछ नेताओं तक सीमित होकर रह गया। सत्ता खत्म होने के बाद वहां कांग्रेस तेजी से कमजोर पड़ती चली गई।
Updated on:
29 May 2026, 10:22 AM IST
Published on:
29 May 2026, 10:22 AM IST
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