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53 लोगों की मौत, 40 आरोपी… हत्या का दोषी सिर्फ एक, दिल्ली दंगों पर 6 साल बाद आया फैसला

Delhi riots: सीएए को लेकर दिल्ली में हुए दंगों पर अदालत का फैसला छह साल बाद आया है। इस हिंसा में 53 लोगों की मौत हुई थी और 40 आरोपियों पर मुकदमा चला, लेकिन अब तक केवल एक आरोपी को गैर-इरादतन हत्या में दोषी ठहराया गया है। दंगों से जुड़े करीब 53 आपराधिक मामलों में से सिर्फ 11 मामलों में ही सजा हो सकी है।

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Important decision after 6 years of Delhi riots

Delhi riots: सीएए को लेकर दिल्ली में हुए दंगों पर अदालत का फैसला छह साल बाद आ गया है। इस दंगे में कुल 53 लोगों की मौत हुई थी और 40 लोगों को आरोपी बनाया गया था। मामले की लंबी सुनवाई के बाद अब फैसला सुनाया गया है, जिसमें केवल एक आरोपी को दोषी ठहराया गया है। हालांकि, उसे भी गैर-इरादतन हत्या के मामले में ही दोषी माना गया है। इस हिंसा के बाद से साल 2025 तक गैर-कानूनी तरीके से इकट्ठा होना, हथियारों के साथ दंगा करना, विस्फोटक पदार्थों का इस्तेमाल, इस प्रकार के कई घटनाओं में लगभग 53 अपराधिका मामले दर्ज किए गए थे, लेकिन इनमें से केवल 11 केस में ही आरोपियों को सजा हुई है।

TOI की रिपोर्ट के अनुसार, 53 मामलों में अब तक 40 से अधिक लोगों को दोषी ठहराया जा चुका है, जबकि 100 से ज्यादा आरोपियों को बरी कर दिया गया है। इनमें से करीब 75 लोगों को सबूतों के अभाव में दोषमुक्त किया गया। दंगों के सिलसिले में कुल 758 मामले दर्ज किए गए थे, जिनमें 53 आपराधिक (criminal) केस शामिल हैं। इन मामलों की सुनवाई के दौरान कई बार जज बदले गए, और अलग-अलग चरणों में अदालतों ने जांच की गुणवत्ता, सबूतों की मजबूती और पुलिस की भूमिका पर कड़ी टिप्पणियां कीं। लंबे समय तक चले इन मुकदमों ने न केवल न्यायिक प्रक्रिया की जटिलताओं को उजागर किया, बल्कि यह भी दिखाया कि पर्याप्त और ठोस सबूतों के बिना दोष सिद्ध करना कितना चुनौतीपूर्ण होता है।

जजों के बदलने से प्रभावित हुए मामले

कड़कड़डूमा कोर्ट कॉम्प्लेक्स में स्थित नॉर्थ ईस्ट डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में दिल्ली दंगों से जुड़े मुख्य मामलों की सुनवाई चलती रही, जहां समय-समय पर कई जजों ने इन केसों को सुना। इनमें जज विनोद यादव, वीरेंद्र भट्ट, पुलस्त्य प्रमाचला और वर्तमान में जज परवीन सिंह के नाम प्रमुख हैं। इसी कॉम्प्लेक्स में एक अलग स्पेशल कोर्ट भी है, जो हाई-प्रोफाइल मामलों की सुनवाई कर रहा है। इन मामलों में स्टूडेंट एक्टिविस्ट उमर खालिद, शरजील इमाम और आम आदमी पार्टी के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन आरोपी हैं, जिन पर एंटी-टेरर कानून यूएपीए के तहत गंभीर आरोप लगाए गए हैं। इन मामलों में भी जजों के बार-बार ट्रांसफर होने के कारण अदालत में दलीलें दोहरानी पड़ीं और रिकॉर्ड फिर से खंगालने पड़े, जिससे मुकदमे की प्रक्रिया शुरू होने और आगे बढ़ने में काफी देरी हुई।

6 साल पहले हुआ था दंगा

गौरतलब है कि 23 से 26 फरवरी 2020 के बीच उत्तर-पूर्वी दिल्ली के इलाकों में CAA को लेकर हिंसा भड़क गई थी। इस हिंसा की चपेट में आने से 53 लोगों की जान चली गई। आपको बता दें कि इसकी शुरुआत जाफराबाद और मौजपुर में कानून के समर्थकों और विरोधियों के बीच सड़क जाम को लेकर हुई झड़प से हुई, जिसने जल्द ही एक बड़े सांप्रदायिक दंगे का रूप ले लिया। उस समय अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत के दौरे पर थे, और हिंसा की मुख्य वजह प्रदर्शनकारियों द्वारा सड़कें खाली करने और नेताओं के भड़काऊ बयानों से उपजा तनाव माना जाता है।