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अगले साल बाजार में आएंगे भारतीय साइज के जूते, खत्म हो जाएगा खराब फुटवियर का दौर

पैरों की शोभा : उद्योग में सख्ती से बीआइएस मानक लागू करने की तैयारी

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नई दिल्ली. देश के फुटवियर उद्योग को 2025 में बदलने की तैयारी है। उद्योग इंडियन साइज सिस्टम अपनाने जा रहा है। इससे बाजार में भारतीय माप के जूते मिलेंगे। साथ ही घटिया क्वॉलिटी के जूते-चप्पलों का दौर खत्म हो जाएगा, क्योंकि फुटवियर उद्योग में बीआइएस (ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टेंडर्ड) मानक सख्ती से लागू करने की तैयारी है।

भारत में अभी बिक रहे जूते ब्रिटेन की निर्धारित साइज वाले हैं। जूतों के बाजार में साइज के लिए भारतीय मानक प्रणाली नहीं थी। अब देश की मानक प्रणाली से जूतों का साइज तय किया जाएगा। भारतीय फुटवियर कम्पोनेंट मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष संजय गुप्ता के मुताबिक कई साल से इस पर काम चल रहा था। अब कंपनियां भारतीय साइज के जूते बनाने को तैयार है। अगले साल भारतीय साइज के जूते बाजार में आ जाएंगे। गुणवत्ता नियंत्रण आदेश (क्यूसीओ) से गुणवत्तापूर्ण फुटवियर उत्पादों का उत्पादन सुनिश्चित हो सकेगा और खराब गुणवत्ता वाले उत्पादों के आयात पर लगाम लगेगी। इन मानकों में फुटवियर बनाने में इस्तेमाल होने वाले चमड़े, पीवीसी और रबड़ जैसे कच्चे माल के अलावा सोल एवं हील के बारे में भी निर्देश दिए गए हैं। मानक रबड़ गम बूट, पीवीसी सैंडल, रबड़ हवाई चप्पल, स्पोट्र्स शूज और दंगा-रोधी जूते जैसे उत्पादों पर लागू होंगे।

हमारे पैर ज्यादा चौड़े

भारतीय लोगों के पैर यूरोप या अमरीका के लोगों के मुकाबले ज्यादा चौड़े हैं। विदेशी साइज के जूते भारतीयों के पैर में पूरी तरह फिट नहीं आते। कई भारतीय खराब फिटिंग वाले या बड़े आकार के जूते पहनते हैं। इससे उन्हें असुविधा होती है। चोट लगने के साथ पैरों के स्वास्थ्य से समझौता करना पड़ता है।

बढ़ोतरी का लक्ष्य

भारतीय फुटवियर बाजार फिलहाल 1800 करोड़ डॉलर का है। इसे 2030 तक 2600 करोड़ डॉलर तक बढ़ाने का लक्ष्य है। चमड़ा क्षेत्र को 3000 करोड़ डॉलर से बढ़ाकर 5000 करोड़ डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य है। भारत से 600 करोड़ डॉलर के फुटवियर निर्यात किए जाते हैं।