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क्या सरकार एमिशन टैक्स लागू करने की तैयारी में है? जेएनयू की प्रोफेसर ने प्रदूषण उत्सर्जन कर का किया समर्थन

Emission Tax: प्रोफेसर बंसल ने बताया कि किसी क्षेत्र में वायु प्रदूषण का स्तर सिर्फ कारखानों या गाड़ियों की वजह से नहीं होता, बल्कि इसके पीछे मौसम और जमीन की बनावट भी बड़ी भूमिका निभाती है।

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दिल्ली में बढ़ा प्रदूषण (Photo-IANS)

हाल के वर्षों में देश के बड़े हिस्से में वायु प्रदूषण एक गंभीर समस्या बनकर उभरा है। खासकर उत्तर भारत में हालात ज्यादा खराब हैं। देश की राजधानी दिल्ली में तो कड़ाके की ठंड और घने कोहरे के बीच हवा की गुणवत्ता (Air Quality) लगातार खतरनाक बनी हुई है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के अनुसार, सोमवार सुबह 7 बजे दिल्ली का औसत वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) 293 दर्ज किया गया, जो 'खराब' श्रेणी में आता है।  

इस बीच, दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) की अर्थशास्त्र प्रोफेसर संगीता बंसल (JNU Professor Sangeeta Bansal) ने एक अहम बात कही है। उन्होंने बताया कि इंडो-गंगा का मैदान एक तरह से घाटी प्रभाव (वैली इफेक्ट) से ग्रस्त है, जिसकी वजह से यहां पैदा होने वाला प्रदूषण फैल नहीं पाता और लंबे समय तक हवा में ही थमा रहता है।  

प्रोफेसर बंसल शनिवार को अहमदाबाद विश्वविद्यालय (Ahmedabad University) में आयोजित 7वें वार्षिक आर्थिक सम्मेलन में बोल रही थीं। उन्होंने अपने शोध प्रस्तुतीकरण में कहा कि किसी क्षेत्र में वायु प्रदूषण का स्तर सिर्फ कारखानों या गाड़ियों की वजह से नहीं होता, बल्कि इसके पीछे मौसम और जमीन की बनावट भी बड़ी भूमिका निभाती है।

उन्होंने समझाया कि इंडो-गंगा का मैदान भौगोलिक रूप से एक धंसा हुआ क्षेत्र है। इसके एक तरफ हिमालय की ऊंची पर्वत श्रृंखलाएं हैं और दूसरी तरफ दक्कन का पठार। इस कारण यहां की हवा फंस जाती है। जब कारखानों, वाहनों या अन्य स्रोतों से प्रदूषण पैदा होता है, तो वह बाहर निकलकर फैल नहीं पाता। नतीजा यह होता है कि प्रदूषक कण हवा में जमा होते जाते हैं और सांस लेना मुश्किल हो जाता है।

प्रोफेसर बंसल ने कहा कि भारत में अभी तक उत्सर्जन पर कोई सीधा कर यानी एमिशन टैक्स नहीं है। उन्होंने सुझाव दिया कि प्रदूषण कम करने के लिए सरकार को अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग तरह के कर लगाने चाहिए। खासकर इंडो-गंगा के मैदान जैसे ज्यादा संवेदनशील इलाकों में उत्सर्जन पर ज्यादा टैक्स लगाया जाना चाहिए।

उनका कहना था कि अगर ज्यादा प्रदूषित क्षेत्रों में उद्योग चलाना महंगा होगा, तो कंपनियां स्वाभाविक रूप से कम संवेदनशील इलाकों में अपने कारखाने लगाने के बारे में सोचेंगी। इससे प्रदूषण का दबाव एक ही जगह पर नहीं पड़ेगा और कुल मिलाकर उत्सर्जन में कमी आएगी। नीति इस तरह बनाई जानी चाहिए कि कंपनियां नए प्लांट लगाने से पहले यह सोचें कि कहीं वे ऐसे इलाके में तो नहीं जा रही हैं, जहां प्रदूषण से लोगों को ज्यादा नुकसान होता है।

उन्होंने यह भी कहा कि बहुत से नीति निर्माता यह मानने को तैयार नहीं होते कि पीएम 2.5 जैसे सूक्ष्म प्रदूषक कणों में थोड़ी-सी कमी से भी बड़ा फायदा हो सकता है। लेकिन उनके शोध के अनुसार, ज्यादा प्रदूषित क्षेत्रों में थोड़ी सी सुधार भी लोगों के स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता में बड़ा बदलाव ला सकती है। इंडो-गंगा का मैदान इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।

प्रोफेसर बंसल ने बताया कि भारत में वायु प्रदूषण के कई स्रोत हैं। इनमें वाहन, कोयला आधारित बिजली संयंत्र, औद्योगिक इकाइयां, सड़कों और निर्माण से उठने वाली धूल और घरों में इस्तेमाल होने वाला जैव ईंधन शामिल है। अगर इन सभी स्रोतों से प्रदूषण घटाने के उपाय किए जाएं, तो कुछ खर्च जरूर आएगा, लेकिन इसके बदले स्वास्थ्य से जुड़े फायदे कहीं ज्यादा होंगे।

उन्होंने जोर देकर कहा कि वायु प्रदूषण को केवल पर्यावरण की समस्या मानकर नहीं देखा जाना चाहिए। इसे स्वास्थ्य नीति का अहम हिस्सा बनाना होगा। जब हम वायु प्रदूषण कम करने के लक्ष्य तय करें, तो उन्हें स्वास्थ्य नीति के साथ जोड़कर देखना चाहिए, न कि सिर्फ पर्यावरण नीति तक सीमित रखना चाहिए।

अंत में उन्होंने बताया कि उत्तर भारत, खासकर दिल्ली और आसपास के इलाकों में, अक्टूबर से जनवरी के बीच प्रदूषण का स्तर सबसे ज्यादा होता है। इन महीनों में उत्तर और दक्षिण भारत के बीच हवा की गुणवत्ता का अंतर भी सबसे ज्यादा नजर आता है। आमतौर पर दक्षिण भारत में प्रदूषण का स्तर उत्तर की तुलना में कम रहता है।