
म्यांमार के छात्र ने दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। फोटो सोर्स-ANI
Delhi University admission: क्या कोई विदेशी छात्र बिना पासपोर्ट के दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU) में एडमिशन पा सकता है? नियमों की मानें तो जवाब 'ना' होगा, लेकिन इस समय दिल्ली हाई कोर्ट में एक ऐसा अनोखा मामला पहुंचा है जिसने इस नियम को ही कटघरे में खड़ा कर दिया है। म्यांमार से भागकर भारत आए एक शरणार्थी छात्र ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के उस कड़े नियम को अदालत में चुनौती दे दी है, जिसके तहत विदेशी छात्रों के लिए एडमिशन के वक्त अपना पासपोर्ट दिखाना अनिवार्य (जरूरी) होता है।
दरअसल, हेनरी हटू आंग लिन नाम का एक छात्र अपने परिवार के साथ म्यांमार में चल रही राजनीतिक उथल-पुथल, हिंसा और प्रताड़ना के डर से साल 2022 में भागकर भारत आया था। तब से वह और उसका परिवार संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायोग (UNHCR) के संरक्षण में भारत में रह रहा है। हेनरी ने अपनी स्कूली शिक्षा भी भारत से ही पूरी की है। उसने मिजोरम बोर्ड से 10वीं और मेघालय बोर्ड से साइंस स्ट्रीम में 12वीं की परीक्षा पास की है।
पढ़ाई में अच्छे हेनरी ने साल 2026-27 के सत्र के लिए दिल्ली यूनिवर्सिटी के फॉरेन स्टूडेंट्स रजिस्ट्री (FSR) के तहत ग्रेजुएशन (UG) कोर्स में एडमिशन के लिए अप्लाई किया था। लेकिन यूनिवर्सिटी ने उसका आवेदन यह कहकर अधूरा छोड़ दिया कि उसने अपना पासपोर्ट जमा नहीं किया है। हेनरी ने यूनिवर्सिटी से गुहार लगाई कि पासपोर्ट की जगह उसके UNHCR के शरणार्थी दस्तावेजों को मान लिया जाए, लेकिन जब DU प्रशासन ने उसकी एक न सुनी, तो उसे मजबूरन हाई कोर्ट की शरण लेनी पड़ी।
वरिष्ठ वकील अशोक अग्रवाल और एडवोकेट कुमार उत्कर्ष के जरिए दायर इस याचिका में मजबूत कानूनी तर्क दिए गए हैं। याचिका में कहा गया है कि दिल्ली यूनिवर्सिटी का यह नियम शरणार्थियों के साथ नाइंसाफी है। एक शरणार्थी भला उस देश की सरकार के पास पासपोर्ट बनवाने कैसे जा सकता है, जहां से वह अपनी जान बचाकर भागा है? कानून का एक बुनियादी नियम है कि 'कानून किसी को भी ऐसा काम करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता जो असंभव हो।'
याचिका में यह भी सवाल उठाया गया है कि DU के अपने एडमिशन बुलेटिन में एक तरफ तो 'UNHCR शरणार्थी सर्टिफिकेट' को जरूरी दस्तावेजों की लिस्ट में शामिल किया गया है, लेकिन दूसरी तरफ पासपोर्ट भी मांगा जा रहा है। यह नियम अपने आप में ही विरोधाभासी है।
छात्र ने अदालत को बताया कि DU के नियम के मुताबिक तिब्बत के नागरिकों को बिना पासपोर्ट के सिर्फ रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट के आधार पर एडमिशन की छूट मिलती है। ऐसे में म्यांमार के UNHCR प्रमाणित शरणार्थियों को यह छूट न देना समानता के अधिकार का उल्लंघन है। अब देखना यह होगा कि दिल्ली हाई कोर्ट इस पूरे मामले पर क्या रुख अपनाता है, क्योंकि इस फैसले का असर भारत में रह रहे कई अन्य शरणार्थी छात्रों के भविष्य पर भी पड़ सकता है।
Updated on:
08 Jul 2026 08:08 pm
Published on:
08 Jul 2026 08:08 pm
