
नई दिल्ली। देश की चुनावी व्यवस्था को सुधारने और कालेधन के इस्तेमाल पर अंकुश लगाने के लिए राजनीतिक दलों और प्रत्याशियों को चुनाव लड़ने के लिए सरकारी कोष से धन मिलना चाहिए या नहीं ? इस मुद्दे पर अब तक एक राय नहीं बन सकी है। स्टेट फंडिग देश में अबूझ सवाल बनी है। बहस इतनी हो चुकी है कि यह मुद्दा विवादास्पद करार हो चुका है। अतीत में कई बार बनीं समितियों ने बहुत सावधानी के साथ स्टेट फंडिंग लागू करने की सिफारिश जरूर की, लेकिन राजनीतिक दलों को धनराशि किस पैमाने पर दिया जाए, इसको लेकर आम सहमति नहीं बन सकी। यूं तो दुनिया के कुछ देशों में आंशिक रूप से इस व्यवस्था पर अमल करने की कोशिश हुई, लेकिन 100 प्रतिशत स्टेट फंडिंग किसी भी देश में नहीं है। सरकार चुनाव सुधारों से जुड़े इस अहम मुद्दे पर विधि आयोग से सुझाव मांगा चुकी है। आयोग पूर्व में इस बारे में अपना परामर्श-पत्र तैयार करने के साथ सभी मान्यताप्राप्त दलों की राय भी ले चुका है।
राजनीतिक दल दे चुके हैं ये सुझाव
चुनाव लड़ने के लिए स्टेट फंडिंग को लेकर आयोग को कई राजनीतिक दल पूर्व में चुनाव दे चुके हैं। इसमें कई सुझाव देते हुए कहा गया था कि राजनीति में योग्य लोगों को प्रोत्साहित करने के लिए स्टेट फंडिंग होनी चाहिए। चुनाव के दौरान सरकारी स्तर से डीजल, पेट्रोल, प्रिंटिंग, संचार उपकरण, लाउडस्पीकर जैसी चुनाव प्रचार में सहायक सामग्रियों को उपलब्ध कराने के साथ ही पोलिंग एजेंटों के लिए भत्ते और भोजन की व्यवस्था का भी सुझाव दिया। साथ ही यह भी सुझाव दिया गया कि आरक्षित सीटों पर चुनाव लड़ने वाले कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि के प्रत्याशियों को राजकोष से अतिरिक्त धन मिले। जिससे वे चुनाव प्रचार में अन्य प्रत्याशियों से न पिछड़े।
क्या है स्टेट फंडिंग और इसके पीछे का तर्क
स्टेट फंडिंग का मतलब, चुनावों के दौरान सभी राजनीतिक दलों को सरकार की ओर से धन उपलब्ध कराए जाने से है। सरकारी कोष से चुनाव लड़ने के लिए धन प्राप्त होने के बाद राजनीतिक दल या उम्मीदवार को अन्य सोर्स से प्राप्त धन और संसाधनों का प्रयोग करने की मनाही होगी। मकसद है कि इससे राजनीतिक दलों को चुनाव खर्च के लिए भ्रष्ट तरीके से धन जुटाने की नौबत नहीं आयेगी। कॉरपोरेट और काले धन पर भी दलों की निर्भरता कम होगी।
क्यों उठ रही मांग
देश में चुनावों के दौरान हजारों करोड़ खर्च होता है। चुनाव महंगा होता जा रहा है। आयोग से तय सीमा से कई गुना अधिक प्रत्याशी खर्च करते हैं। जबकि कागजों में निर्धारित धनराशि ही दिखाई जाती है। चुनाव में अघोषित खर्च धनराशि में एक बड़ा हिस्सा कालेधन का भी होता है। चुनाव में कालेधन के इस्तेमाल से सभी उम्मीदवारों को समान प्लेटफार्म नहीं मिल सकता। इससे भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है।
राह में रोड़े कम नहीं
राज्य वित्तपोषित चुनाव व्यवस्था को धरातल पर उतारने की राह में रोड़े भी बहुत हैं। सबसे बड़ा सवाल है कि सरकारी कोष से किस राजनीतिक दल या प्रत्याशी को कितना फंड प्रदान किया जाए। गंभीर और अगंभीर प्रत्याशियों में कैसे अंतर किया जाए। क्योंकि सरकारी फंडिग की चाह में निर्दल प्रत्याशियों की संख्या में इजाफा हो सकता है। इससे देश में राजनीतिक दलों के पंजीकरण की रफ्तार बढ़ जाएगी, क्योंकि सबका लक्ष्य चुनाव लड़ने से ज्यादा सरकारी धन हासिल करने पर होगा। अगर सिर्फ राजनीतिक दलों को धनराशि मिलेगी तो वे निर्दलीय प्रत्याशियों के साथ अन्याय होगा, जो गंभीरता से चुनाव मैदान में उतरते हैं। एक सवाल यह भी खड़ा होता है कि सभी राजनीतिक दलों को एक समान रूप से धनराशि मिले या उनके पिछले चुनाव के प्रदर्शन के आधार पर।
कैसे लागू हो स्टेट फंडिंग
जानकारों का मानना है कि स्टेट फंडिंग के लिए उचित पैमाना बनाना जरूरी है। सबको रेवड़ी की तरह समान रूप से सरकारी कोष से धनराशि देना उचित नहीं है। राजनीतिक दलों के प्राप्त मतों के आधार पर फंडिंग की व्यवस्था ज्यादा न्यायसंगत होगी। राजनीतिक दल या उम्मीदवार को जितने मत प्राप्त हुए हैं, उनके आधार पर फंडिंग की जानी चाहिये। प्रति वोट धनराशि का मानक बनाया जा सकता है।
स्टेट फंडिंग पर आयोगों ने क्या कहा
इंद्रजीत गुप्ता समिति (1998): इस समिति ने चुनाव में राजनीतिक दलों और प्रत्याशियों को सरकारी धनराशि दिए जाने की वकालत की। समिति ने संवैधानिक, विधिक और सार्वजनिक हित कारणों से राज्य वित्तपोषण का समर्थन किया। समिति ने कहा कि स्टेट फंडिंग से सीमित वित्तीय संसाधनों वाले राजनीतिक दलों के लिए निष्पक्ष और एकसमान अवसर प्रदान होंगे।
भारतीय विधि आयोग: 1999 में भारतीय विधि आयोग ने इस शर्त के साथ स्टेट फंडिंग की सिफारिश की। आयोग ने कहा कि अगर राजनीतिक दल अन्य स्रोतों से धन नहीं लेते हैं तो स्टेट फंडिंग की सुविधा लागू करना अच्छा कदम हो सकता है। आयोग ने सुविधा लागू करने से पहले राजनीतिक दलों के लिये एक रेगुलेशन बॉडी बनाने पर जोर भी दिया।
वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2008): आयोग ने चुनाव में कालेधन के इस्तेमाल पर अंकुश लगाने किए आंशिक राज्य वित्तपोषण की सिफारिश की।
राष्ट्रीय संविधान कार्यकरण समीक्षा आयोग (2001): इस आयोग ने स्टेट फंडिंग को लागू करने से पहले विधि आयोग की सिफारिश से सहमति जताते हुए राजनीतिक दलों के लिये एक सुदृढ़ नियामक ढांचे को लागू करने पर जोर दिया।
भारत में अभी सिर्फ अप्रत्यक्ष वित्त पोषण
चुनाव के लिए स्टेट फंडिग दो तरह की होती है। प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष वित्त पोषण का तरीका है। भारत में फिलहाल अप्रत्यक्ष वित्त पोषण होता है। आइए जानते हैं, दोनों तरीकों में क्या अंतर है।
प्रत्यक्ष वित्तपोषण: इस विधि में सरकारी कोष से राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों को उनके चुनाव अभियानों के लिए प्रत्यक्ष मौद्रिक सहायता उपलब्ध होती है।
अप्रत्यक्ष वित्तपोषण: राजनीतिक दलों को सब्सिडी, टैक्स में छूट, कार्यालय के लिए भवन या जमीन, सार्वजनिक स्थलों का उपयोग, सुरक्षा आदि सुविधाएं अप्रत्यक्ष वित्त पोषण में आती हैं। भारत में राजनीतिक दलों को फिलहाल अप्रत्यक्ष वित्त पोषण का लाभ ही मिल रहा है।
Published on:
06 Feb 2024 03:30 pm
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