
न्यूयॉर्क. वैज्ञानिकों की अंतरराष्ट्रीय टीम ने नासा और जर्मन उपग्रहों से मिले आंकड़ों के विश्लेषण में पाया है कि पृथ्वी पर मीठे पानी की मात्रा मई 2014 में तेजी से घटने लगी थी। तब से यह लगातार निम्न स्तर पर बनी हुई है। ‘सर्वेज इन जियोफिजिक्स’ जर्नल में छपे शोध के मुताबिक मीठे पानी की मात्रा में यह वैश्विक बदलाव इसका संकेत हो सकता है कि पृथ्वी के महाद्वीप लम्बे शुष्क दौर में प्रवेश कर रहे हैं।
शोध रिपोर्ट के मुताबिक 2015 से 2023 तक पृथ्वी पर मीठे पानी की मात्रा (इसमें झीलें, नदियां और अन्य भूजल स्रोत शामिल हैं) 2002 से 2014 तक के औसत के मुकाबले 1,200 क्यूबिक किलोमीटर कम थी। नासा के जलविज्ञानी और अध्ययन के सह-लेखक मैथ्यू रोडेल का कहना है कि यह कमी अमरीका की एरी झील के आयतन का ढाई गुना कम होने के बराबर है। इस कमी से समुदायों और कृषि पर दबाव पड़ सकता है। इससे अकाल, संघर्ष, गरीबी और बीमारियां बढऩे का खतरा है।
ज्यादा बारिश पर भी जमीन में पानी नहीं
ग्लोबल वार्मिंग के कारण वायुमंडल में ज्यादा जल वाष्प जमा हो जाती है। इससे मौसम की चरम घटनाएं होती हैं। नासा के मौसम विज्ञानी माइकल बोसिलोविच ने बताया कि लंबे समय तक सूखा पडऩे से भारी बारिश के बावजूद मिट्टी ज्यादा पानी नहीं सोख नहीं पाती। पानी जमीन में रिसने के बजाय बह जाता है।
कमी के चक्र के पीछे
शोध में बताया गया कि सूखे के दौरान सिंचित कृषि के विस्तार के साथ शहर और खेत भूजल पर ज्यादा निर्भर हो जाते हैं। इससे पानी की आपूर्ति में कमी का चक्र बनता है। मीठे पानी के भंडार कम हो जाते हैं। बारिश और बर्फ उन्हें फिर से भरने में विफल रहती है। रिपोर्ट के मुताबिक 2015-2016 में अल नीनो कम सक्रिय होने के बावजूद वैश्विक मीठे पानी के स्तर में सुधार नहीं हुआ।
Published on:
19 Nov 2024 01:18 am
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