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नई दिल्ली. देश में पहली बार दुर्लभ रक्त समूह वाले मरीजों के लिए राष्ट्रीय स्तर की 'रेयर ब्लड डोनर रजिस्ट्रीÓ तैयार की गई है। यह पहल इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आइसीएमआर) के तहत नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ इम्यूनोहेमेटोलॉजी (एनआइआइएच), मुंबई की तरफ से की गई है। इसका मुख्य उद्देश्य ऐसे मरीजों को समय पर रक्त उपलब्ध कराना है जिन्हें बार-बार रक्त चढ़ाने की जरूरत पड़ती है। इससे थैलेसीमिया और सिकल सेल बीमारी से जूझ रहे मरीजों को विशेष राहत मिल सकेगी।'रेयर ब्लड डोनर रजिस्ट्रीÓ एक ऑनलाइन पोर्टल है, इस पर दुर्लभ रक्त समूह वाले दाताओं की पूरी जानकारी दर्ज है। अब इसे भारत सरकार के ई-रक्तकोष प्लेटफॉर्म से जोड़ा जा रहा है, जिससे सभी ब्लड बैंकों का डेटा एक साथ जुड़ सके। इससे मरीजों और डॉक्टरों को पोर्टल के माध्यम से जरूरत के समय पर रेयर ब्लड की जानकारी और संपर्क तुरंत मिल सकेगा।
इसलिए होती है खून की जरूरत
1.5 लाख थैलेसीमिया के मरीज।
1200 से ज्यादा रोज होते हैं सड़क हादसे।
6 करोड़ से अधिक हर साल सर्जरी।
24 करोड़ ऑपरेशन हर साल होते हैं।
1 करोड़ से अधिक गर्भ से जुड़ी जटिलताओं के लिए रक्त की जरूरत।
रेयर ब्लड ढूंढने में दिक्कत
मानवों में कुछ दुर्लभ रक्त समूह होते हैं। ये सामान्य रक्तदाताओं में 1:1000 या उससे भी कम पाए जाते हैं। ऐसे मरीजों को खून देना कई बार स्थानीय ब्लड बैंक के लिए संभव नहीं होता, और राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रक्त की खोज करनी पड़ती है। देश में फिलहाल 4000 से अधिक ब्लड बैंक हैं।
कैसे बनी रजिस्ट्री?
आइसीएमआर-एनआइआइएच ने 2019 में एक प्रोजेक्ट शुरू किया, जिसमें भारत के चार हिस्सों से 4000 नियमित 'ओÓ गु्रप रक्तदाताओं की जांच की गई। इसमें केईएम अस्पताल (मुंबई), पीजीआइएमआर (चंडीगढ़), एमसीएच (कोलकाता) और जेआइपीएमइआर (पुडुचेरी) केंद्र थे। इस अध्ययन में 600 से ज्यादा दाता ऐसे मिले जिनमें सामान्य एंटीजन नहीं थे। वहीं 250 बहुत दुर्लभ ब्लड गु्रप वाले दाता मिले। इस समूह में 170 'बॉम्बे ब्लड गु्रपÓ वाले दाता शामिल किए गए। यह भारत में सबसे ज्यादा मांगा जाने वाला रेयर ब्लड गु्रप है।
Published on:
22 Jun 2025 12:05 am
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