17 जनवरी 2026,

शनिवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

भीतर की रागात्मक चेतना आदमी को ले जा सकती है पतन की ओर : आचार्य महाश्रमण

देशलपुर कंठी से 10 किमी का विहार कर पहुंचे सामागोगा गांधीधाम. जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के आचार्य महाश्रमण गुरुवार सुबह देशलपुर कंठी से 10 किलोमीटर का विहार कर कच्छ जिले की मुंद्रा तहसील के सामागोगा पहुंचे।सामागोगा िस्थत ओ पी जिन्दल विद्या निकेतन में लोगों ने आचार्य का स्वागत किया। प्रवचन में आचार्य ने कहा कि […]

less than 1 minute read
Google source verification

देशलपुर कंठी से 10 किमी का विहार कर पहुंचे सामागोगा

गांधीधाम. जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के आचार्य महाश्रमण गुरुवार सुबह देशलपुर कंठी से 10 किलोमीटर का विहार कर कच्छ जिले की मुंद्रा तहसील के सामागोगा पहुंचे।
सामागोगा िस्थत ओ पी जिन्दल विद्या निकेतन में लोगों ने आचार्य का स्वागत किया। प्रवचन में आचार्य ने कहा कि काम-विषय रूपी विष व शल्य से बचने का प्रयास करना चाहिए। काम शल्य के समान और विष के समान होते हैं। कामों की प्रार्थना करने वाले अकाम भी दुर्गति को प्राप्त हो जाते हैं। पांच इन्द्रियों के पांच विषय शब्द, रूप, रस, गंध और स्पर्श हैं। इनके प्रति आसक्ति है, कामना है, आकर्षण है, राग है तो ये विष की तरह विनाश करने वाले बन सकते हैं। भीतर की रागात्मक चेतना और लालसा आदमी को पतन की ओर ले जा सकती है। पदार्थों का साक्षात भोग करना और पतन को प्राप्त होना तो स्पष्ट है, किन्तु पदार्थों का सेवन नहीं करते हुए भी केवल उनकी कामना करने से भी आदमी पतन की दिशा में गति कर सकता है।
उन्होंने कहा कि अध्यात्म की साधना में इन्द्रिय विषयों के प्रति अनाकर्षण और संयम रखने को बहुत महत्व बताया गया है। साधु यह ध्यान रखे कि विरक्ति इतनी मजबूत हो जाए कि वापस विषयों की ओर जाने की स्थिति ही नहीं बने। आचार्य ने कहा कि अध्यात्म को समझने में विज्ञान का सपोर्ट या सहयोग ले सकते हैं। साधु को भीतर से भी काम-विषयों के आसक्ति से दूर रहते हुए काम-विषय रूपी शल्य और विष से बचने का प्रयास करना चाहिए।