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अमरीका बनाम ब्रिक्स: डॉलर को लेकर ट्रंप क्यों हैं बेचैन?

एक्सप्लेन ब्रिक्स समूह के बढ़ते प्रभाव और अमरीकी डॉलर को चुनौती देने की संभावनाओं ने अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की चिंताओं को बढ़ा दिया है। हाल ही में ट्रंप ने ब्रिक्स देशों को 10% अतिरिक्त टैरिफ की धमकी दी और कहा कि डॉलर को हटाने की किसी भी कोशिश को अमरीका युद्ध जैसी स्थिति मानेगा। […]

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जयपुर

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Nitin Kumar

Jul 10, 2025

Donald Trump (Photo- ANI)

एक्सप्लेन

ब्रिक्स समूह के बढ़ते प्रभाव और अमरीकी डॉलर को चुनौती देने की संभावनाओं ने अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की चिंताओं को बढ़ा दिया है। हाल ही में ट्रंप ने ब्रिक्स देशों को 10% अतिरिक्त टैरिफ की धमकी दी और कहा कि डॉलर को हटाने की किसी भी कोशिश को अमरीका युद्ध जैसी स्थिति मानेगा। आखिर ट्रंप की यह नाराज़गी क्यों है? क्या सच में डॉलर की बादशाहत को खतरा है? आइए जानते हैं कुछ अहम सवालों के जवाब...

ट्रंप ब्रिक्स को अमरीका विरोधी क्यों बता रहे?

ट्रंप का आरोप है कि ब्रिक्स समूह का गठन ही इस मकसद से हुआ है कि अमरीकी डॉलर को कमजोर किया जाए और किसी अन्य देश की मुद्रा को वैश्विक मानक बना दिया जाए। उनका कहना है कि यह अमरीका की आर्थिक शक्ति को कमजोर करने की साजिश है। दरअसल, दशकों से डॉलर दुनिया की प्रमुख रिजर्व करेंसी है, जिससे अमरीका को कम ब्याज दरों पर कर्ज लेने और वैश्विक वित्तीय प्रणाली पर नियंत्रण बनाए रखने की ताकत मिलती है। ट्रंप का मानना है कि डॉलर की जगह कोई और लेता है तो यह अमरीका के लिए ‘विश्व युद्ध’ जैसा झटका होगा।

ब्रिक्स से ट्रंप को खतरा क्यों लग रहा है?

रूसी राष्ट्रपति की उस अपील से ट्रंप नाराज हैं जिसमें ब्रिक्स देशों के बीच 'स्वतंत्र निपटान प्रणाली' यानी बिना डॉलर के लेन-देन की बात की गई है। यदि ब्रिक्स देशों ने डॉलर छोड़कर स्थानीय मुद्राओं में व्यापार शुरू किया, तो डॉलर की मांग घटेगी और उसका मूल्य गिरेगा। इससे अमरीकी प्रतिबंधों की प्रभावशीलता कमजोर होगी, जो अमरीका की विदेश नीति का प्रमुख हथियार है।

क्या है ब्रिक्स का मत और असर?

ब्रिक्स का कहना है कि उनका उद्देश्य डॉलर को हटाना नहीं, बल्कि विकल्पों को बढ़ाना है। भारत ने भी साफ किया है कि वह 'डि-डॉलराइजेशन' नहीं कर रहा, बल्कि जोखिम कम करने के उपाय खोज रहा है। लेकिन ट्रंप की 10% टैरिफ की धमकी वैश्विक व्यापार में अस्थिरता बढ़ा सकती है। यह संघर्ष अब मुद्रा का नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन का संकेत बन गया है।

रिपोर्टः नितिन मित्तल