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यादें आपातकाल की… और मजिस्ट्रेट की मेज पर मारा गया मुक्का

संघ का कार्य समाज को जागृत करने का है। यह कार्य आपातकाल में भी निर्बाध जारी रहा। बदले हालात में नए स्वरूप में शाखाएं लग रही थीं। अब शाखा का नामकरण क्लब हो गया था। फुटबॉल, वालीबॉल व अन्य खेलों के लिए स्वयंसेवक व अन्य लोग सुबह-शाम एकत्र होते थे।
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भारत

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Opinion Desk

Jun 24, 2026

DemocracyMatters

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राजेंद्र प्रसाद राज, वरिष्ठ पत्रकार एवं लोकतंत्र सेनानी

देश में 25 जून 1975 को आपातकाल लगाकर लोकतंत्र को खत्म करने की कोशिश की गई थी। यह ऐसा दौर था, जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा राजनीतिक गतिविधियों पर व्यापक प्रतिबंध लगा दिए गए थे। विपक्षी नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को जेलों में ठूंस दिया गया। प्रेस पर सेंसरशिप लगा दी गई। जबरन नसबंदी और लगान वसूली का दमन चक्र चलाया गया। लोकतांत्रिक संस्थाओं और संवैधानिक मूल्यों पर गंभीर संकट उत्पन्न हो गया। आपातकाल के विरुद्ध हुए संघर्ष और उसके पश्चात जनता की प्रतिक्रिया ने सिद्ध कर दिया कि भारतीय समाज लोकतंत्र और संविधान के प्रति गहरी आस्था रखता है। वह लोकतंत्र को ठेंगा दिखाने वालों के खिलाफ मजबूती से खड़ा होने में संकोच नहीं करता।
आपातकाल का राजनीतिक दलों के साथ ही सामाजिक संगठनों के कार्यकर्ताओं तथा आम नागरिकों ने अपने-अपने स्तर पर विरोध दर्ज किया। यद्यपि सरकारी नियंत्रण और दमन के कारण खुला विरोध सीमित था। फिर भी, भूमिगत आंदोलन, जन जागरण अभियानों और वैचारिक प्रतिरोध के माध्यम से लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के प्रयास जारी रहे। लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में प्रारंभ हुआ जन आंदोलन लोकतंत्र की पुनस्र्थापना का प्रेरणा स्रोत बना।


संघ का कार्य समाज को जागृत करना
करीब पांच दशक पुराना यह घटनाक्रम निरंकुश शासन की याद दिलाता है। तब, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगने से शाखाएं लगना बंद हो गया था। इसके बावजूद संघ चुप नहीं बैठा। संघ का कार्य समाज को जागृत करने का है। यह कार्य आपातकाल में भी निर्बाध जारी रहा। बदले हालात में नए स्वरूप में शाखाएं लग रही थीं। अब शाखा का नामकरण क्लब हो गया था। फुटबॉल, वालीबॉल व अन्य खेलों के लिए स्वयंसेवक व अन्य लोग सुबह-शाम एकत्र होते थे। ऐसी ही एक शाम को भरतपुर शहर के किला स्थित मथुरा गेट स्कूल के मैदान पर कुछ किशोर और युवा वॉलीबॉल खेल रहे थे। अचानक पुलिस की एक जीप आकर रुकी। पलक झपकते ही जोश और उत्साह से भरे खेल मैदान पर अफरातफरी मच गई। लोग डर कर भागने लगे। मैं कुछ समझ पाता, इससे पहले ही पुलिसकर्मियों ने मुझे पकड़ा और जीप में बिठा दिया। रास्ते में एक पुलिसकर्मी ने बताया की जेल से लौटे हर सत्याग्रही पर पुलिस की पैनी नजर है। उस दिन शहर में सत्याग्रहियों की धरपकड़ की गई। पर पुलिस केवल मुझे और सेवा दास हरिजन को ही पकड़ पाई। आखिर पुलिस सत्याग्रहियों को क्यों पकडऩा चाहती थी? दरअसल, उन दिनों शहर में अफवाह फैली हुई थी कि स्कूलों में विद्यार्थियों को लगाए जा रहे टीकों में जहर है। इससे बच्चे मर रहे हैं। पुलिस अफवाह फैलाने वालों की तलाश कर रही थी। असली दोषी नहीं मिलने पर सत्याग्रहियों को बलि का बकरा बनाया गया। सत्याग्रहियों का दोष था कि उन्होंने तत्कालीन सरकार की तानाशाही प्रवृत्तियों को उजागर किया था।


मन में चल रहे थे कई सवाल
लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने नारा दिया था, 'सच कहना अगर बगावत है तो समझो हम भी बागी हैं'। इस नारे को साथ लेकर आमजन को जगाने का काम किया जा रहा था। अफवाहों का हमसे कोई संबंध नहीं था। मैं द्वितीय वर्ष का छात्र था। मैं ना तो किसी दवा कंपनी से जुड़ा हुआ था और ना ही देशविरोधी गतिविधियों में संलग्न था। इसके बावजूद पुलिस ने मुझे क्यों पकड़ लिया, इसी तरह के सवाल मन में चल रहे थे। तभी नजदीक आकर किसी ने कहा, ‘चाय-नाश्ता मंगाना हो, तो बता देना। तुम्हारे पैसे जमा हो गए हैं।’ अपने हाव-भाव से उसने यह बताया कि वह बाहर चाय की दुकान से आया है। बिना सोचे-विचारे कि पैसे किसने जमा कराए हैं, चाय और बिस्किट मंगवा लिए। अब सोचता हूं, वह कौन सा मेकैनिज्म था, जिससे कोतवाली में स्वयंसेवक के पहुंचते ही उसकी सुध ले ली गई। यह व्यवस्था राष्ट्रभक्त सामाजिक बंधुओं ने किस तरह की होगी? जबकि पूरे देश में भय और आंतक का वातावरण था। किसी भी व्यक्ति को किसी भी आरोप में गिरफ्तार किया जा सकता था। जैसे हमें गिरफ्तार किया गया था। तब शासन के किसी आदेश के खिलाफ किसी भी अदालत में ना अपील की जा सकती थी, ना ही कोई दलील दी जा सकती थी। इसलिए तब यह कहावत प्रचलित थी, ‘ना अपील, ना दलील और ना वकील।’ यह स्थिति अंग्रेजों के शासन से भी बदतर थी। गुलामी के दौर में भी अंग्रेजों के खिलाफ चाहे सीमित दायरे में ही सही धरना, प्रदर्शन, सत्याग्रह, सभाएं और भाषण की आजादी थी। आजादी के मतवाले अखबार भी छापते थे।


दीपावली से पहले हुए रिहा
आपातकाल में सरकार की अनुमति से ही अखबार में कोई समाचार प्रकाशित होता था। सभाएं और भाषण करना तो दूर, भारत माता की जय का नारा भी इंदिरा गांधी विरोधी माना जाता था। तब ‘इंदिरा ही इंडिया है और इंडिया ही इंदिरा है’, की अवधारणा थोपी जा रही थी। अब यह सब सोचकर रोमांचित होता हूं कि उस भयावह वातावरण के बावजूद राष्ट्रभक्तों ने हर जोखिम में अदम्य साहस का परिचय दिया था। करीब एक घंटे के बाद ही हमें सिटी मजिस्ट्रेट के घर ले जाया गया। शायद, वे घर पर नहीं थे। पुलिसकर्मियों के साथ हम उनके बगीचे में इंतजार करने लगे। शाम की लालिमा अब धुंधलके में तब्दील हो रही थी। तभी बताया गया कि मजिस्ट्रेट साहब आ गए हैं। हमको उनके ऑफिसनुमा कमरे में पेश किया गया। हमें देखते ही मजिस्ट्रेट साहब भाषण देने लगे। वे बोलते रहे, हम सुनते रहे। उनके भाषण का सार था कि तुम जैसे बच्चों के नारे लगाने से क्या इंदिरा गांधी आपातकाल समाप्त कर देगी। उनके भाषण से मैं उद्वेलित हो रहा था। पता नहीं, कहां से किसी हुतात्मा की हुंकार मन में हिलोरे लेने लगी। अंदर का दावा फूट पड़ा। जोश में होश खोते हुए मैं जोर से उनकी मेज पर मुक्का मारते हुए बोला,‘जब आप जैसे बड़े लोग कुछ नहीं करेंगे, तो हम जैसे छोटे बच्चों को ही आगे आना पड़ेगा।’ मेरा यह कहना था कि उनका गुस्सा और बढ़ गया। उन्होंने आव देखा ना ताव और तुरन्त हमें जेल भेजने के आदेश कर दिए। रात के अंधेरे से पहले हम सेवर जेल में थे। बाद में दीपावली पर मुझे रिहा कर दिया गया। आज भी मुझे यह घटना याद आती है, तो चेहरे पर गर्वीली मुस्कान फैल जाती है। आखिर इस निरंकुश शासन का 21 मार्च 1977 को अंत हो गया और हर वर्ग ने राहत की सांस ली। यह घटना आज भी हमें लोकतांत्रिक संस्थाओं, नागरिक अधिकारों और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के प्रति सजग रहने की प्रेरणा देती है।