24 जून 2026,

बुधवार

Patrika Logo
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

‘जिस शव को पिता का समझकर जलाया, वो निकला दूसरे का’, गुना ट्रिपल मर्डर केस में पुलिस का ब्लंडर

Guna triple murder case- सात घंटे में गुना ट्रिपल मर्डर खुलासे का दावा करने वाली पुलिस से लाशों की पहचान और जांच में दो ब्लंडर मिस्टेक कर दिए।
2 min read
Google source verification

गुना

image

Akash Dewani

Jun 24, 2026

Guna triple murder case

Guna triple murder case- गुना ट्रिपल मर्डर केस में पुलिस ने किए दो ब्लंडर (फोटो सोर्स- Patrika)

Guna triple murder case- मध्य प्रदेश के गुना जिले के म्याना के सनसनीखेज ट्रिपल मर्डर केस में तीनों आरोपियों को जेल भेजने के बाद अब पुलिस की कार्यप्रणाली और हड़बड़ी पर गंभीर सवाल खड़े हो गए है। महज 7 घंटे में अंधे कत्ल का खुलासा करने का ढिंढोरा पीटने वाली पुलिस ने तफ्तीश में दो ऐसी गंभीर लापरवाहियां की, जिसने कानून व्यवस्था की साख को बट्टा लगा दिया है। इधर यह भी सामने आया कि हत्या की जड़ प्लॉट की रजिस्ट्री बनी। इसी के पैसो को लेनदेन को लेकर विवाद बढ़ा और आरोपियों ने वारदात को अंजाम दे दिया।

प्लॉट की रजिस्ट्री बनी हत्या की वजह, लोकेशन से पकड़े गए

गिंदाबाई के परिजनों के मुताबिक, पुलिस जिस कहानी को अवैध संबंधों से जोड़ रही थी, उसकी असली वजह प्लॉट का विवाद है। 18 जून को ही ओमप्रकाश के हाईवे किनारे वाले प्लॉट की रजिस्ट्री गिंदाबाई की बहन के नाम हुई थी। इसी के पैसों के लेन-देन को लेकर विवाद बढ़ा और इस तिहरे हत्याकांड को अंजाम दिया गया। साइबर टीम को आरोपियों की मोबाइल लोकेशन और कॉल डिटेल से सुराग मिला, जिसके बाद सुरेन्द्र जाटव, सीताराम जाटव और गनेशराम जाटव को जेल भेजा गया है। हालांकि, मुख्य आरोपी सीताराम के भाई राजकुमार का दावा है कि उसका भाई निर्दोष है और पुलिस ने केस बंद करने के चक्कर में उसे फंसाया है।

बिना पुख्ता जांच के सौंप दी किसी और की लाश

21 जून को म्याना के एक खेत वाले मकान से पहली लाश बरामद हुई थी। पुलिस ने बिना किसी वैज्ञानिक जांच या कड़े वेरिफिकेशन के, ओमप्रकाश शर्मा के भतीजे के दावे पर शव उन्हें सौंप दिया। परिजनों ने उसे ओमप्रकाश मानकर उसका अंतिम संस्कार भी कर दिया। अगले दिन जब उसी मकान के दूसरे कमरे से दो और लाशें मिलीं, तब असली सच सामने आया। ओमप्रकाश के बेटे ने बनियान देखकर अपनी पिता की लाश पहचानी। जब पुलिस ने उसे पहले दिन की लाश का फोटो दिखाया तो उसने साफ कह दिया कि यह उसके पिता नहीं हैं। तब जाकर पुलिस के होश उड़े कि पहले दिन जिसका अंतिम संस्कार हुआ. वह असल में रामकृष्ण जाटव की लाश थी। इस लापरवाही के बाद रामकृष्ण के गुस्से से आगबबूला परिजनों ने अस्थियां लेने तक से इनकार कर दिया। बाद में पुलिस की समझाइश पर वे माने।

ताला बंद कमरा देखने की जहमत नहीं उठाई

पुलिस की दूसरी सबसे बड़ी नाकामी मौके की जांच (क्राइम सीन इन्वेस्टीगेशन) में सामने आई। पहले दिन जब पुलिस को मकान के एक कमरे में शव मिला, तो उसने पास ही ताला बंद दूसरे कमरे को खोलकर देखने की जरूरत ही नहीं समझी। पुलिस टीम बिना पूरा परिसर खंगाले लौट आई। दूसरे दिन जब उस बंद कमरे को खोला गया, तो वहां से दो और लाशें (ओमप्रकाश और गिंदाबाई) बरामद हुईं। अगर पहले दिन ही पुलिस ने पूरी तत्परता से जांच की होती. तो तीनों शव एक साथ मिल जाते और शिनाख्त का इतना बड़ा तमाशा नहीं बनता।