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देवगढ़ का अधूरा सपना: 41 करोड़ के ‘स्वास्थ्य मंदिर’ को ज़मीन के झमेले ने रोक दिया

पिछले साल जब राज्य सरकार ने बजट भाषण में देवगढ़ को उप जिला चिकित्सालय (सब-डिवीजनल हॉस्पिटल) देने की घोषणा की थी

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Deogarh Health News

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राजसमंद. पिछले साल जब राज्य सरकार ने बजट भाषण में देवगढ़ को उप जिला चिकित्सालय (सब-डिवीजनल हॉस्पिटल) देने की घोषणा की थी, तो नगर से लेकर सुदूर गाँवों तक हर किसी ने राहत की साँस ली थी। चारों तरफ चर्चा थी कि अब छोटी-बड़ी बीमारी के इलाज के लिए लोगों को 60–80 किलोमीटर दूर भीलवाड़ा या उदयपुर नहीं भागना पड़ेगा। तीन मंजिला, आधुनिक सुविधाओं से लैस इस अस्पताल के बनने से आमजन की दिक्कतें काफी हद तक कम होनी थी। लेकिन यह सपना ‘फाइलों और कागजों’ के पुलिंदों में उलझकर रह गया-वजह वही पुरानी, ज़मीन का पेंच।

घोषणा से उम्मीद, कागज से निराशा

41 करोड़ रुपये के बजट से बनने वाला यह उप जिला चिकित्सालय स्थानीय लोगों के लिए ‘स्वास्थ्यमंदिर’ से कम नहीं था। लेकिन जिस तरह का पेच इसके निर्माण को लेकर फंसा है, वह इस बात की तस्दीक करता है कि सरकारी घोषणाएँ सिर्फ बोलने से पूरी नहीं होतीं, जमीन पर उतारने के लिए जमीनी हकीकत भी देखनी पड़ती है। 22 जुलाई 2024 को सीएचसी प्रभारी ने नगर पालिका को पत्र भेजा कि नए अस्पताल भवन के लिए चार बीघा ज़मीन तुरंत उपलब्ध कराई जाए। नगर पालिका ने भी इस मांग को गंभीरता से लिया। नगर के नक्शे पलटे गए, पुराने रिकॉर्ड खंगाले गए, लेकिन पालिका के नाम कोई खाली ज़मीन अस्पताल के आसपास नहीं मिली। इसके बाद सरकारी दफ्तरों के चक्कर शुरू हो गए-कहीं से जवाब आया, कहीं से भरोसा मिला, कहीं से टालमटोल भरी भाषा में पत्राचार चलता रहा। नतीजा वही-फाइलें इधर से उधर, अधिकारी आते-जाते, तारीखें बदलती रहीं पर अस्पताल वहीं खड़ा-मतलब कागजों में।

आश्रम की ज़मीन बनी नई उम्मीद की किरण

जब नगर पालिका को कोई सरकारी भूखंड नहीं मिला तो नज़र अस्पताल के पास ही स्थित महावीर ब्रह्मचारी आश्रम की ज़मीन पर गई। सार्वजनिक हित में यह भूखंड सबसे उपयुक्त माना गया। पालिका ने 6 जून को आश्रम अध्यक्ष ईश्वरलाल श्रीमाल को पत्र लिखा। आश्रम प्रशासन ने भी बातचीत को लेकर सकारात्मक रुख दिखाया। इसके बाद 11 जून को पालिकाध्यक्ष शोभालाल रैगर की अगुवाई में समिति गठित की गई, जिसमें नेता प्रतिपक्ष, पार्षद और पालिका अधिकारी शामिल किए गए। 18 जून को पालिका समिति और आश्रम प्रतिनिधियों के बीच बैठक भी हुई। पालिका ने आश्रम प्रशासन को प्रस्ताव दिया कि बदले में नगर के प्रमुख मार्गों पर स्थित कीमती ज़मीन आश्रम को दी जा सकती है। यह प्रस्ताव सुनकर आश्रम ने तुरंत हाँ नहीं कहा, बल्कि ‘विचार’ के लिए समय मांग लिया।

पत्रों की राजनीति: जवाब, सवाल और फिर जवाब

इस ‘विचारकाल’ में उम्मीद थी कि जल्द कोई सकारात्मक जवाब मिलेगा। लेकिन हुआ उल्टा। 30 जून को पालिका ने फिर पत्र भेजा। उत्तर मिला, लेकिन ठोस निर्णय के बजाय ‘अभी विचार चल रहा है’ वाला जवाब आया। फिर 11 जुलाई को पालिकाध्यक्ष ने दोबारा पत्र लिखा तो इस बार शर्तों की लंबी फेहरिस्त वाला जवाब भेज दिया गया। लेकिन ज़मीन हस्तांतरण को लेकर कोई साफ सहमति नहीं बनी।

अब आखिरी प्रयास: बोर्ड बैठक का ऐलान

अब इस ज़मीन विवाद को सुलझाने के लिए गुरुवार को पालिका समिति की फिर से बैठक हुई। तय हुआ कि अब बोर्ड की बैठक बुलाकर अंतिम निर्णय लिया जाएगा। पालिकाध्यक्ष शोभालाल रैगर ने साफ कहा कि देवगढ़ की जनता को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा देना ही प्राथमिकता है और इसके लिए हर संभव प्रयास किए जाएंगे। इस बैठक में पालिकाध्यक्ष रैगर के साथ अधिशासी अधिकारी विजेश मंत्री, उपाध्यक्ष प्रदीपसिंह चौहान, नेता प्रतिपक्ष नारायण सिंह सोलंकी, पार्षद अर्जुन गुर्जर, नरेश पानेरी और इकबाल मोहम्मद भी मौजूद रहे।

देवगढ़ की जनता को क्या मिलेगा?

देवगढ़ की जनता अब उम्मीद लगाए बैठी है कि बोर्ड बैठक से कोई ठोस फैसला निकलेगा और जल्द से जल्द अस्पताल भवन का निर्माण शुरू होगा। क्योंकि बिना ज़मीन के न तो टेंडर निकलेगा, न ठेका मिलेगा और न ही मशीनरी आएगी। लोगों को डर है कि कहीं यह बहुप्रतीक्षित स्वास्थ्य परियोजना भी दूसरे कई सरकारी प्रोजेक्ट्स की तरह सिर्फ घोषणाओं में दबी न रह जाए।

सरकारी स्वास्थ्य ढांचे की असलियत

यह पूरा मामला सिर्फ देवगढ़ का नहीं, बल्कि प्रदेश के कई कस्बों और तहसील स्तर के इलाकों की हकीकत भी है। बजट घोषणाओं में नए अस्पताल, नए भवन, नई सुविधाएँ तो घोषित हो जाती हैं, लेकिन ज़मीन, कब्जा, आवंटन, कब्जा-ग्रहण प्रमाण पत्र, एनओसी जैसे पेंच उन्हें सालों तक खींचते रहते हैं। इस बीच स्थानीय जनता मजबूर होकर या तो प्राइवेट अस्पतालों में मोटी रकम खर्च करती है या फिर 50–100 किलोमीटर दूर शहरों के अस्पतालों के चक्कर काटती है।

अब उम्मीद सिर्फ राजनीतिक इच्छाशक्ति पर

देवगढ़ के लोगों को अब सिर्फ एक ही उम्मीद है। पालिका, प्रशासन और आश्रम प्रशासन में कोई ठोस सहमति बने और सभी पक्ष आपसी सहमति से भूमि विवाद का स्थायी हल निकालें। ताकि 41 करोड़ का यह ‘स्वास्थ्यमंदिर’ सचमुच हकीकत बन सके और क्षेत्र की हजारों की आबादी को राहत मिले।