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त्योहार: 13 को रात 11 बजे के बाद होगा होलिका दहन, फूलों की होली रहेगी आकर्षण

7 मार्च से शुरू होगा होलाष्टक पन्ना. होली से आठ दिन पहले होलाष्टक 7 मार्च से लग रहे हैं। होलाष्टक के दौरान शुभ कार्यों पर विराम लग जाता है। मान्यता है कि इन आठ दिनों में ग्रह अपना स्थान बदलते हैं, इसलिए मांगलिक कार्य करना ठीक नहीं माना जाता है। इस बार होलिका दहन 13 […]

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13 को रात 11 बजे के बाद होगा होलिका दहन

13 को रात 11 बजे के बाद होगा होलिका दहन

7 मार्च से शुरू होगा होलाष्टक

पन्ना. होली से आठ दिन पहले होलाष्टक 7 मार्च से लग रहे हैं। होलाष्टक के दौरान शुभ कार्यों पर विराम लग जाता है। मान्यता है कि इन आठ दिनों में ग्रह अपना स्थान बदलते हैं, इसलिए मांगलिक कार्य करना ठीक नहीं माना जाता है। इस बार होलिका दहन 13 मार्च को किया जाएगा। होलिका दहन का मुहूर्त रात 11.02 बजे से रहेगा। सुबह 10.26 से रात 11.02 बजे तक भद्रा योग रहेगा। जिस काल में होलिका दहन नहीं किया जाता है। 14 मार्च को रंगों की होली खेली जाएगी। जमकर रंग-गुलाल उड़ेगा।
मांगलिक और शुभ काम इस दौरान नहीं होंगे
मुकेश शर्मा ने बताया कि फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से होलाष्टक मानाजाता है। होलाष्टक के आठ दिनों में नकारात्मक ऊर्जा रहती है। सभी मांगलिक और शुभ काम रुक जाते हैं। माना जाता है कि होलाष्टक के दौरान किए गए कामकाज का शुभ फल नहीं मिलता है। इस दौरान सभी प्रकार की शुभ कार्य रुक जाते हैं। यह तक कि लोग न तो रिश्ता तय करते हैं और न ही किसी प्रकार की चर्चा होती है। आठ दिनों में धर्म-कर्म-दान पुण्य कार्य करना श्रेष्ठ माना जाता है।
नृङ्क्षसह पाठ होता है फलदायी
पं मुकेश ने बताया, होलाष्टक के दिनों में भगवान विष्णु के साथ नृङ्क्षसह स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। आराध्य देव की विधि-विधान से पूजा करना भी फलदायी माना गया है। यदि कोई समस्या है तो इस दौरान भगवान सूर्य की आराधना को श्रेष्ठ माना गया है। भगवान सूर्य को लाल फूल और कुमकुम अर्पित करने से लाभ मिलता है। चंद्रमा के लिए अबीर, मंगल के लिए लाल चंदन, बुध के लिए हरे फल एवं मेहंदी, बृहस्पति के लिए केसर, हल्दी युक्त दूध, शुक्र ग्रह की शांति के लिए सफेद चंदन, माखन और मिश्री, शनि के लिए काले तिल, राहु-केतु के लिए पंचगव्य अर्पित करना चाहिए।
लकड़ी बचाने गोबर के उपलों से दहन
शहर में होलिका की प्रतिमा लकडिय़ों के साथ जलाई जाती है। गोबर के कंडे-गोकाष्ट जलाने का चलन भी तेजी से बढ़ा है। इसबार शहर समेत आसपास के क्षेत्रों में कई स्थानों पर ईको-फ्रेंडली प्रतिमाएं स्थापित कर दहन किया जाता है। लकड़ी बचाने के लिए गोबर के उपलों का उपयोग किया जाएगा। होलिका जलने के बाद उसमें चने या गेहूं की बाली को पकाकर प्रसाद स्वरूप ग्रहण करने से स्वास्थ्य अनुकूल, दीर्घायु व एश्वर्य में वृद्धि होती है। होलिका दहन की भस्म को भी पवित्र माना गया है। पर्व को भक्त प्रहलाद एवं होलिका की प्रतिमाओं को आकार द रहे हैं।
मंदिर में खेलेंगे फूलों की होली
पंचमी पर भगवान जुगल किशोर मंदिर परिसर में फूल और गुलाल की होली खेली जाएगी। आयोजन समिति पहले ही तैयारी शुरु कर देती है। साथ ही फाग गायन भी होगा। श्रद्धालु भक्ति, श्रद्धा के साथ होलीकोत्सव के रंग में सराबोर होंगे। वहीं प्राणनाथ मंदिर में होली के दिन से ही केशर युक्त जल और गुलाल से होली खेले जाने की परंपरा है। होलिकोत्सव के दौरान शहर के मंदिर लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र होते हैं।
सखी भेष में सजेंगे भगवान जुगल किशोर
होलिकोत्सव पर्व भगवान जुगल किशोर मंदिर में भी धूमधाम से मनाया जाएगा। पांच दिनी होली उत्सव के तीसरे दिन दूज को भगवान जुगल किशोर सखी का भेष धारण करेंगे। श्रद्धालुओं को भगवान सखी के रूप में ही दर्शन देंगे।