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दमोह के बांदकपुर स्थित जागेश्वरनाथ मंदिर के बारे में जानिए

जागेश्वरनाथ की महिमा: तेरहवें ज्योतिर्लिंग के रूप में है मान्यता, साल दर साल बढ़ रही भक्तों की भीड़ - भक्तों की मन्नत हो रही पूरी, ३१३ साल पहले शिवलिंग के स्वयं प्रगट होने की मान्यता

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दमोह

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Samved Jain

Aug 10, 2024

Jageshwar Nath Temple Bandakpur damoh

Jageshwar Nath Temple Bandakpur damoh

दमोह. भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंग की जानकारी देश और दुनिया को हैं। हर भक्त की भोलेनाथ के इन दरबार में पहुंचकर दर्शनलाभ, अभिषेक की आकांक्षा होती है। लेकिन जब तेरहवें की बात आती है तो लोगों की मुंह पर एक ही नाम होता है और वह है दमोह जिले में स्थित बांदकपुर धाम। यहां विराजित जागेश्वरनाथ के दर्शन तेरहवें ज्योतिर्लिंग के रूप में भक्त करते है। जिनके चमत्कार की कहानी यहां पीढिय़ों से पहुंचने वाले भक्त बयां करते हैं। देश भर में भक्तों का यहां हर ज्योतिर्लिंग की तरह जमावड़ा लगता है। ऐसी मान्यता है यहां भोलेबाबा के दर्शन मात्र से वर्षों के पाप मिट जाते हैं। भगवान के चमत्कारों से तो हर भक्त वाफिक हैं।
यहां की विशेषता है महाशिवरात्रि पर भगवान भोलेनाथ और माता.पार्वती के मंदिर पर लगे झंडे अपने आप ही आपस में मिल जाते है। इसके लिए मान्यता है कि अगर सवा लाख कांवर यहां पहुंचते है तभी ऐसा होता है। मंदिर कमेटी के लोगों के अनुसार इस बार भी यह चमत्कार को नमस्कार करने का मौका लोगों को मिलेगा। सावन माह में बांदकपुर में लाखों लोग प्रभु दर्शन को पहुंच रहे है। इसके लिए पुलिस प्रशासन द्वारा भी तगड़ी सुरक्षा व्यवस्था यहां रखी गई है।

युग परिवर्तन से ध्वस्त हुआ था तीर्थ
बांकदपुरी जागेश्वर रहस्य के रचियता कवि भैरव प्रसाद बाजपेयी ने भी अपने जागेश्वर रहस्य में लिखा है कि युग परिवर्तन से यह तीर्थ क्षेत्र ध्वस्त हो गया और यह आज से ३१३ वर्ष पूर्व सन् 1711 में पुन: भगवान स्वयं जागेश्वरनाथ प्रगट हुए। भगवान जागेश्वर नाथ के स्वयं प्रगट होने के विषय में बांदकपुरी जागेश्वर रहस्य में लिखा गया है।

इन रहस्यों का भी है उल्लेख
अठारहवीं शताब्दी के अंत में एक दिन सुबह से इंदिरा नाम की कन्या जो बालक बालिकाओं के साथ मकर संक्रांति के समय देव पूजन के लिए आई थी। भक्तों की भीड़ के धक्कों के लगने या फिसलने के कारण वह बावली में डूबकर मर गई। कथानुसार व भैरव प्रसाद बाजपेयी द्वारा लिखित श्री बांदकपुरी जागेश्वर रहस्य के अनुसार मंदिर के पुजारियों ने उस मृत बालिका के शरीर को भगवान जागेश्वर नाथ महादेव जी की मूर्ति के समक्ष रखकर महादेव की स्तुति करते हुए कन्या को जीवन दान देने की प्रार्थना की गई। प्रार्थना के फलस्वरूप कन्या जीवित हो उठी।

भूकंप के कलश के त्रिशूल से निकली भी जलधारा
बताते है कि 15 जनवरी 1938 दिन सोमवार की दोपहर 2 बजे भूकंप के निकल जाने के अनंतर ही महादेव के मंदिर में विशाल स्वर्ण कलश के त्रिशूल भाग के ऊपरी कोण से आधी इंच मोटी जल धारा लगभग 15 मिनट तक अनवरत रूपेण निकलती रही। मकर संक्रांति और सोमवती अमावस्या को मेला काल में उपस्थित जनसमूह ने इस चमत्कारिक घटना को प्रत्यक्ष रूप से देखा।

मलबे के नीचे से सुरक्षित निकला था बालक
15 अगस्त 1944 को सुबह 11 बजे श्रीमंदिर धर्मशाला की दूसरी मंजिल का ऊपरी भाग अकस्मात गिर गया। मंजिल के नीचे 12 वर्षीय बाल मूलचंद चढ़ार खड़ा था। अत: यह बालक भवन के हजारों मन वजनी मलमे के नीचे दब गया। विशेष सावधानी और परिश्रम से बालक के ऊपर का मलमा दूर किया गया। इस दौरान बालक के लिए जीवन दान की कामना जागेश्वरनाथ से मौजूद जनों द्वारा की गई। चमत्कार यह हुआ कि बालक सकुशल और जीवित निकला। उसके शरीर में कुछ साधारण चोट आई थीं।