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अंतर्मुखीः यह है हमारी संस्कृति

सच तो यह है कि हमारी अपनी नकारात्मक सोच ही हमें अपनी संस्कृति से दूर लेकर जा रही है

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Sunil Sharma

Sep 12, 2017

param pujya

Muni Pujya Sagar Maharaj

अपनी कमजोरी को छिपाने के चक्कर में हम दूसरे देश की संस्कृति या कहें कि उनके रहन-सहन,खान-पान और बोल-चाल को भला-बुरा कहना प्रारंभ कर देते हैं और वह भी उस समय, जब इनसे हमें और हमारे अपनों को दुख पहुंचा हो। कड़वे शब्दों में कहें तो हम कह सकते हैं कि अपनी संस्कृति का ज्ञान नहीं होने से हमने अन्य देशों की संस्कृति को अपने जीवन मे जगह दे दी है। यह हमारी कमजोरी है कि हम अपनी संस्कृति को पहचान नहीं पाए या यूं कहें कि हम उसे अपने जीवन में स्थान नहीं दे पाए। इसका कारण भी आईने की तरह साफ है कि हम अपनी संस्कृति को धरोहर के रूप में अपने बच्चों को हस्तांतरित नहीं कर पा रहे हैं और यही वजह है कि यह हमारी जीवनचर्या से धीरे-धीरे लुप्त होते जा रही है।

हमारी संस्कृति अब इतिहास बन कर खोज का विषय बनती जा रही है। एक सत्य यह भी है कि आज तक अधिकतर ऐतिहासिक खोजें हमारी संस्कृति पर ही हुई है। पश्चिम के लोगों ने अपने देश की संस्कृति का प्रचार-प्रसार कर इसे जन-जन तक इस तरह पहुंचा दिया कि यह अब सामान्य मनुष्य की दिनचर्या का हिस्सा बन गई है। जैसे बोल-चाल में गुड मॉर्निंग, खाने में ब्रेड और पहनने में नाइट सूट। इस दिनचर्या की वजह से हमारी काया (शरीर), वचन और मन को अपवित्र होता जा रहा है। आप सोचें कि वास्तव में इसका दोषी कौन है? हम अपने दोषों और कमजोरियों को छिपाने के लिए पाश्चात्य संस्कृति की अच्छा कह हे हैं।

क्या हमें और आपको यह कहने का अधिकार है? क्या ऐसा कर हम अपनी नकारात्मक सोच का परिचय तो नहीं दे रहे? सच तो यह है कि हमारी अपनी नकारात्मक सोच ही हमें अपनी संस्कृति से दूर लेकर जा रही है और यह भी तय है कि हम अब भी अपनी संस्कृति के प्रचार-प्रचार और उसके सरंक्षण के लिए नहीं जागे तो आने वाले समय में हमारे अपने परिवार, समाज और देश का नाम तक नहीं रहेगा, वह मात्र खोज का विषय बन कर रह जाएगा। जितना समय हम पाश्चात्य संस्कृति को भला-बुरा कहने में लगाते हैं, उतना समय अपनी संस्कृति को परिवार, समाज और देश में पहुंचाने में लगाएं तो आज भी हम अपनी संस्कृति आने वाली पीढ़ी को दे सकेंगे। नकारात्मक सोच को छोड़ सकारात्मक सोच के साथ आगे बढऩे से सफलता अवश्य मिलेगी।

यह एक बड़ा सत्य है कि हमें अपनी संस्कृति का ज्ञान हो जाए तो हमें पाश्चात्य संस्कृति को छोडऩे में एक पल भी नहीं लगेगा। हमें अपनी संस्कृति को जानने के लिए सबसे हमारे अपने खान-पान, सहन-सहन को जानना होगा। हमें जानना होगा कि आपसी संवाद के लिए हाय-हैलो की बजाय हमें किन शब्दों का उपयोग करना चाहिए। यह सब भारतीय संस्कृति के भवन की नींव के समान है ।

मुनि पूज्य सागर

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