
JP: सम्पूर्ण क्रांति और जेपी
जय प्रकाश नारायण (जेपी) की जयंती पर विशेष आलेख
सम्पूर्ण क्रांति और जेपी
लोकनायक जयप्रकाश नारायण (जेपी) की ओर से 70 के दशक के दौरान चलाया गया सम्पूर्ण-क्रांति आंदोलन इस देश के गौरवशाली इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। मेरे परिवार की दो पीढिय़ां जेपी और उनकी समाजवादी राजनीति से जुड़ी रहीं। स्वतंत्रता सेनानी मेरे दादा रामेश्वर प्रसाद वर्मा बिहार पुलिस सेवा में रहते हुए जेपी और उनके निकट राजनीतिक सहयोगियों की अंग्रेजी सरकार के खिलाफ़ मदद करते रहे। पिता अरुण भोले अपनी किशोरावस्था में जेपी के निकट सम्पर्क में आए। किशोरावस्था से ही जेपी के प्रति आकर्षण और उनके प्रभाव का उन्होंने अपनी बहुचर्चित पहली पुस्तक ‘राजनीति मेरी प्रेयसी’ में बखूबी उल्लेख किया है। जब 1974 में पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान से जेपी ने सम्पूर्ण क्रांंति का बिगुल बजाया तो उनके अग्रणी सेनानियों में पिताजी भी शामिल थे।
मैं तब कोई दस-ग्यारह साल का था, राजनीति नहीं समझता था। लेकिन आंदोलन के तूफ़ानी दिनों की याद मेरे मन में आज भी गहरे रूप में अंकित है। ‘सम्पूर्ण क्रांति अब नारा है, भावी इतिहास तुम्हारा है’, ‘जय प्रकाश का बिगुल बजा है जाग उठी तरुणायी है’ जैसे नारों से पटना शहर की दीवारेंं पटी होती थीं। इमरजेंसी की घोषणा, सायरन बजाती पुलिस की गाडिय़ां, छात्र संघर्ष समिति और पुलिस के बीच आए दिन होने वाली झड़पें, कफ्र्यू का सन्नाटा-उक्त सारी बातें बखूबी याद हैं। इन सभी ने मिलकर जेपी का जो आभामंडल तैयार किया उसे भूलना मुश्किल है। ७२ साल की उम्र में देश की राजनीतिक चेतना को झकझोर कर उन्होंने जिस देशव्यापी आंदोलन का नेतृत्व किया वो अपने आप में एक मिसाल है। उनके निकट सहयोगी और महान समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया भी अक्सर ये कहते थे कि इस देश को यदि झकझोर कर जगा देने की ताक़त किसी में है तो वो सिर्फ़ जय प्रकाश में है। जेपी एक ऐसी शख्सियत थे जो स्वयं चुनावी राजनीति से दूर रहकर देश की विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं को जोड़ सकते थे।
जेपी के ‘सम्पूर्ण क्रांति’ का आकर्षण निश्चय ही बहुत गहरा था। आंदोलन का तात्कालिक उद्देश्य तो वर्तमान कांग्रेसी सरकार को उखाड़ फेंकना था लेकिन दूरगामी लक्ष्य पूरी सामाजिक व्यवस्था में एक आमूल-चूल परिवर्तन लाना था। सम्पूर्ण क्रांति की उनकी धारणा बहुत व्यापक थी। इसे सिर्फ़ राजनीतिक माध्यम से हासिल नहीं किया जा सकता था। वजह - इसमें राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक, शैक्षणिक व आध्यात्मिक सभी स्तर पर क्रांति लाने की बात थी। उनके इस मौलिक विचार की जड़ में कहीं न कहीं उनकी अपनी समाजवादी प्रतिबद्धता अवश्य थी जिसमें एक समतामूलक, गऱीबी और शोषण से मुक्त समाज के निर्माण की सोच थी। इसमें शक नहीं कि जेपी अपने पहले उद्देश्य को हासिल करने में पूर्णत: सफल रहे। उनके आंदोलन के बाद देश में कांग्रेस की जडें़ जो हिली वह फिर कभी मज़बूत नहीं हो सकी। लेकिन क्या सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन अपने दूरगामी लक्ष्यों को कभी हासिल कर सका? यह प्रश्न तब और भी सार्थक हो जाता है जब हम इस आंदोलन से उपजी पार्टियों की तरफ़ देखते हैं। क्या जेपी अधिनायकवाद को जातिवाद और परिवारवाद से बदलना चाहते थे? आज उस महान लोकनायक की जयंती पर उनकी सम्पूर्ण क्रांति से उपजे उनके अनुयायियों को इस प्रश्न का उत्तर ढूंढना चाहिए?
प्रो. डॉ. मिहिर भोले,
वरिष्ठ शिक्षाविद, प्रिङ्क्षसपल फैकल्टी, एनआईडी
Published on:
10 Oct 2022 10:57 pm
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