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हमारे मंत्रियों-नेताओं के ‘दामन’ पर गुनाहों के बढ़ते ‘दाग’

डॉ. रमेश ठाकुर, स्वतंत्र पत्रकार, एवं स्तंभकार

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साफ-सुथरी सियासी व्यवस्था की परिकल्पनाओं के बीच सफेदपोशों पर पूर्व में लगे गंभीर आपराधिक मामलों में इजाफा दिखा है। इन नेताओं-मंत्रियों पर बलात्कार, हत्या, ब्लैकमेलिंग जैसे गंभीर केस दर्ज हैं। चुनाव सुधार क्षेत्र में काम करने वाली देश की अग्रणी संस्था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉम्र्स (एडीआर) ने अपनी ताजा रिपोर्ट में बिंदुवार जिक्र किया है कि किस दल के कौन-कौन नेता आपराधिक मुकदमों में फंसे हैं। कोई ऐसा दल नहीं है जिनके मंत्रियों या नेताओं पर गंभीर आपराधिक मामले दर्ज न हों?

रिपोर्ट में बताया है कि देशभर के 302 मंत्रियों में 174 पर गंभीर मामले इस वक्त कोर्ट में जारी हैं। मामले भी कोई छोटे-मोटे नहीं, एक से बढ़कर एक गंभीर। हत्या, बलात्कार, अवैध कब्जा, अपहरण जैसे कृत्य शामिल हैं। हिंदुस्तान में कुछ वर्षों से चुनाव सुधार और साफ-सुथरी छवि वाली राजनीतिक व्यवस्था को लेकर जो कागजी शोर मच रहा था, उसी पोल एडीआर की ताजा रिपोर्ट ने खोल दी है।

चाहे संसद हो या राज्यों की विधानसभाएं, दागियों की संख्या में 47 फीसदी की वृद्धि बताई गई है। यानी मोटे तौर पर जनप्रतिनिधियों की आधी संख्या दागियों से भर गई है। माननीयों पर दाग वाली नई सूचना निश्चित रूप से सोचने पर विवश करती है। 27 राज्यों, तीन यूटी प्रदेश और केंद्रीय मंत्रिमंडल के कुल 643 मंत्रियों के चुनाव के वक्त दिए शपथ पत्रों की एडीआर ने छानबीन की है। उसके बाद यह सच्चाई निकल कर सामने आई। आंकड़ों में 174 दागी मंत्रियों में जो शामिल हैं उनमें भाजपा का प्रतिशत 40 और कांग्रेस का 47 फीसदी है। सर्वाधिक केस तमिलनाडु के सत्ताधारी दल द्रमुक के नेताओं पर बताए गए हैं। रिकॉर्ड 87 प्रतिशत मंत्री विभिन्न आपराधिक मामलों में लिप्त हैं। वहीं, केंद्र सरकार के 72 मंत्रियों में से 29 मंत्रियों ने अपने ऊपर आपराधिक केस होना स्वीकारा है। भाजपा के 336 मंत्रियों में से 136 पर आपराधिक केस हैं जिनमें 88 पर बहुत ही गंभीर आरोप हैं। सियासी लोग दागियों के संबंध में बातें सिर्फ जनता में करते हैं। जनता को उम्मीदें बंधाई जाती हैं कि दागी नेताओं को दल प्रमुख बाहर का रास्ता दिखाएंगे, लेकिन ऐसा कोई नहीं करता। चुनावी भाषणों में इस मसले को लेकर सिर्फ गाल बजाए जाते हैं। एडीआर की मौजूदा रिपोर्ट में कांग्रेस के 61 मंत्रियों में 45 पर, डीएमके के 31 में से 27, टीएमसी के 40 में से 13, तेलुगु देशम पार्टी के 23 में से 22, आम आदमी पार्टी के 16 में से 11 मंत्रियों पर गंभीर आरोप लगे बताए हैं। क्या इन पार्टियों के प्रमुखों या संस्थापकों में इतनी नैतिकता है कि ऐसे दागियों को पार्टी से निकाल सकें। शायद नहीं।

ताजुब्ब यह भी है कि इन दागियों में लगभग सभी अरबपति हैं। सभी के पास अपार संपत्ति हैं। यानी जितने आपराधिक मामलों में वृद्धि हुई, उतनी ही दागियों की आय में भी इजाफा भी हुआ। कुछ राज्यों को छोड़कर आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, बिहार, ओडिशा, महाराष्ट्र, कर्नाटक, पंजाब, तेलंगाना, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली और पुडुचेरी ऐसे राज्य हैं जहां के नेताओं पर सर्वाधिक मुकदमे दर्ज हैं। हालांकि सुखद यह है कि हरियाणा, जम्मू-कश्मीर, नागालैंड और उत्तराखंड के मंत्रियों पर इस समय किसी भी किस्म का कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं हैं। बावजूद इसके राजनीति में सुधार और समानता की उम्मीद नहीं की जा सकती। जितने ही कानून बना लें, सख्तियां बढ़ाई जाएं, संसद या विधानसभाओं में नए कानून पारित हो जाएं, दागियों की संख्या कम नहीं होगी। ये तस्वीर भविष्य के लिए बेहद चिंतनीय और खतरनाक है। सियासी व्यवस्थाएं ऐसी बन चुकी हैं कि बिना धन या बाहुबल के कोई राजनीति में प्रवेश ही नहीं कर पाता। बगैर पैसे के चुनाव लड़ना तो संभव ही नहीं। एडीआर रिपोर्ट से यह भी पुष्टि हुई है कि बीते पांच वर्षों में कानूनों का सबसे ज्यादा दुरुपयोग माननीयों ने ही किया है।

174 मंत्रियों पर गंभीर मामले इस वक्त कोर्ट में चल रहे हैं, देशभर के 302 मंत्रियों में से।

47% की वृद्धि दागियों की संख्या में।

(एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार)