
बद्रीनाथ धाम बहुत ही प्रसिद्ध तीर्थस्थल है। कहा जाता है की यह दूसरा बैकुंठ धाम है। धर्म ग्रंथों के अनुसार यही वह जगह है जहां भगवान विष्णु सतयुग में देवताओं और मनुष्यों को साक्षात दर्शन देते थे। इस जगह की हर युग में कुछ ना कुछ कहानी जरुर है। पुराणों के अनुसार बताया जाता है की बद्रीनाथ में द्वापर युग से भगवान विष्णु के विग्रह दर्शन भक्तों को होने लगे। एक कथा में बदरीनाथ को लेकर यह कथा भी प्रचलित है की यही वह स्थान है जहां श्री हरि नें नर-नारायण रूप में तपस्या की थी। बद्रीनाथ धाम को लेकर कई रोचक कहानियां प्रचलित हैं, तो आइए जानते हैं वे बातें....
यहां देवी लक्ष्मी का स्वरूप है बदरी
एक बार देवी लक्ष्मी और भगवान विष्णु एक दूसरे से नाराज हो गए। इसके बाद देवी लक्ष्मी अपने पिता समुद्र के घर चली गईं और भगवान विष्णु भी आहत होकर नर-नारायण पर्वत के बीच तपस्या करने चले गए। फिर कई सालों बाद देवी लक्ष्मी को अपनी भूल का ज्ञान हुआ, तो वे भगवान विष्णु को ढ़ूंढ़ने लगीं। इन्होंने देखा कि नारायण बर्फ से ढ़के पर्वतों के बीच बैठे तप कर रहे हैं और उन पर बर्फ गिर रही है। देवी लक्ष्मी यह सब देखकर बहुत दुखी हुईं और वे बदरी यानी बेड़ का पेड़ बन गईं ताकी तप में लीन भगवान विष्णु पर बर्फ ना गिरे। वहीं जब भगवान विष्णु का तप पूर्ण हुआ तो उन्होंने देवी लक्ष्मी को बेड़ के वृक्ष के रूप में देखा। इससे भगवान विष्णु बहुत प्रसन्न हुए और उन्होनें कहा की इस स्थान को बद्रीनाथ धाम से जाना जाएगा। तब से अब तक उस स्थान को बद्रीनाथ धाम के नाम से जाना जाता है और यही तीर्थ बदरी नारायण से भी जाना जाता है और यहां बदरी देवी लक्ष्मी का स्वरूप है।
शिव भूमि हो गई श्री हरि की भूमि
बद्रीनाथ को लेकर पौराणिक कथाओं में एक कथा यह भी प्रचलित है, कि बदरीनाथ धाम में शिवजी सपरिवार निवास करते थे। परंतु एक बार जब भगवान विष्णु तपस्या के लिए कोई स्थान ढ़ूढ रहे थे तो अचानक उन्हें यह स्थान दिखा और उन्हें यह स्थान बेहद पसंद आ गया। श्री हरि यह जानते थे की यह जगह उनके आराध्य भगवान शिव का निवास स्थान है। इसलिए उन्होंने एक युक्ति निकाली और शिवजी से उनका धाम मांग लिया। भगवान शिव ने विष्णु जी को यह स्थान दे दिया और तब से विष्णु जी यहां निवास करने लगे। बस तभी से यह शिव भूमि श्री हरि की भूमि बदरीनाथ धाम के नाम से जानी जाने लगी।
नर-नारायण ने की थी तपस्या
बदरीनाथ धाम को लेकर एक और कथा मिलती है कि धर्म के दो पुत्र थे नर और नारायण। ये दोनों ही धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए अपना आश्रम स्थापित करना चाहते थे और इसके लिए पवित्र स्थान की तलाश में थे। उन्हें इस स्थान की प्राप्ति हुई और उन्होंने इस जगह का नाम बदरी विशाल रख दिया। बदरीनाथ दो पहाड़ियों के बीच स्थित है। एक पर भगवान नारायण ने तपस्या की थी जबकि दूसरे पर नर ने। नारायण ने द्वापर युग में श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लिया, वहीं नर नें अर्जुन के रुप में अवतार लिया था।
पांडवों ने यहीं किया था पिंडदान
मान्यताओं के अनुसार बदरीनाथ धाम में ही पांडवों ने अपने पितरों का पिंडदान किया था। यही वजह है कि आज भी बदरीनाथ के ब्रह्मकपाल क्षेत्र में लोग दूर-दूर से अपने पितरों का पिंडदान करने आते हैं। कहा जाता है कि बदरीनाथ के दर्शन ही नहीं बल्कि स्मरण मात्र से ही मनुष्य का कल्याण हो जाता है। कथा यह भी है कि यहीं पर भगवान शिव को बह्मकपाल के पास बह्महत्या के पाप से मुक्ति मिली थी।
Published on:
13 May 2019 04:44 pm
बड़ी खबरें
View Allट्रेंडिंग
