25 अगस्त 2026,

मंगलवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

क्या कोर्ट के आदेश से तय होगी विधेयक मंजूरी की समयसीमा?

जयपुर

image

Nitin Kumar

May 17, 2025

संवैधानिक सवाल: राष्ट्रपति मुर्मु ने शीर्ष कोर्ट से राय मांगी

नई दिल्ली. भारत के संवैधानिक इतिहास में एक असाधारण पहल करते हुए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सुप्रीम कोर्ट से संविधान के अनुच्छेद 143(1) के अंतर्गत राय मांगी है। उन्होंने पूछा है कि क्या राष्ट्रपति और राज्यपालों द्वारा विधेयकों की मंजूरी में समयसीमा तय करना न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र में आता है, जबकि संविधान में ऐसी कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं है।

8 अप्रेल 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु के राज्यपाल आर.एन. रवि द्वारा 10 राज्य विधेयकों को मंजूरी न देने के मामले में दिए फैसले में कहा था कि राज्यपालों व राष्ट्रपति को तय समय में उनके समक्ष पेश विधेयकों पर फैसला लेना होगा। राष्ट्रपति ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा कि संविधान में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, तो सुप्रीम कोर्ट किस आधार पर यह फैसला दे सकता है। राष्ट्रपति ने 14 अहम संवैधानिक प्रश्नों के जरिए न्यायपालिका और कार्यपालिका की सीमाओं के बारे में स्पष्टता मांगी है। तमिलनाडु के 10 लंबित विधेयकों पर ‘डीम्ड असेंट’ (मानी हुई स्वीकृति) की सुप्रीम कोर्ट की अवधारणा पर भी राष्ट्रपति ने आपत्ति जताई।

अनुच्छेद 143(1) के तहत राष्ट्रपति किसी भी कानून या तथ्य से जुड़े सवाल पर सुप्रीम कोर्ट से सलाह ले सकता है। यह केंद्र सरकार के लिए राष्ट्रपति के जरिए संवैधानिक मुद्दों पर स्पष्टता पाने का एक प्रावधान है।

अहम बिंदु, जो 14 प्रश्नों में उठाए गए

-अनुच्छेद 200 व 201 के तहत विधेयकों पर निर्णय लेने में राज्यपाल और राष्ट्रपति के विवेकाधिकार की न्यायिक समीक्षा, समयसीमा निर्धारण और मंत्रिपरिषद की सलाह से बाध्यता जैसे प्रश्न उठाए गए हैं। यह पूछा गया है कि क्या उनके निर्णय न्यायोचित हैं और क्या न्यायालय इनके लिए समयसीमा तय कर सकता है।

-अनुच्छेद 142 के तहत सुप्रीम कोर्ट की शक्तियों का दायरा क्या केवल प्रक्रियात्मक मामलों तक सीमित है या यह राष्ट्रपति/राज्यपाल के आदेशों को भी प्रतिस्थापित कर सकता है—यह सवाल विचाराधीन है। साथ ही अनुच्छेद 145(3) के तहत संविधान की व्याख्या से जुड़े मामलों को बड़ी पीठ के समक्ष भेजने की बाध्यता भी चर्चा में है।

-यह प्रश्न उठाया गया है कि क्या अदालतें किसी विधेयक की विषयवस्तु पर, कानून बनने से पूर्व ही, निर्णय दे सकती हैं। साथ ही अनुच्छेद 361 के तहत राज्यपाल/राष्ट्रपति के कृत्यों की न्यायिक समीक्षा पर सीमाएं कितनी हैं, यह भी स्पष्ट किया जाना शेष है।

-अनुच्छेद 131 के तहत संघ और राज्य सरकारों के बीच विवादों के निपटारे में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका और क्या यह अन्य न्यायिक उपायों (जैसे अनुच्छेद 32) को रोकता है।