
छत्तीसगढ़ के अनोखे चर्च की कहानी... जब 1868 में बिश्रामपुर से फैला ईसाई धर्म, जानें 154 साल पुराना इतिहास(photo-patrika)
Chhattisgarh Church: छत्तीसगढ़ का बिश्रामपुर चर्च राज्य के इतिहास में एक अनोखा धार्मिक स्थल है। यह केवल पूजा का केंद्र नहीं, बल्कि सेवा, शिक्षा और छत्तीसगढ़ी भाषा के संरक्षण का भी महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। चर्च का इतिहास 1868 से जुड़ा है और इसे राज्य का पहला ऐतिहासिक चर्च माना जाता है। रायपुर से बिलासपुर जाते हुए हाईवे पर करीब 60 किलोमीटर की दूरी पर बिश्रामपुर स्थित है। यह गांव लगभग 5-7 हजार लोगों का छोटा सा समुदाय है।
बाहरी नजरों से यह जगह सामान्य लग सकती है, लेकिन छत्तीसगढ़ के इतिहास और धार्मिक परंपरा में इसका महत्व बहुत बड़ा है। विश्रामपुर का यह स्थल अपने ऐतिहासिक महत्व के कारण ‘द सिटी ऑफ रेस्ट’ के नाम से भी जाना जाता है। 18वीं सदी से जुड़े इस क्षेत्र ने ईसाई धर्म के प्रसार और स्थानीय संस्कृति के संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। छोटे से गांव में छत्तीसगढ़ी संस्कृति, मिशनरी कार्य और सामाजिक सेवा का यह अनोखा संगम आज भी जीवंत है।
जर्मनी से आए मिशनरी रेवरेंड ऑस्कर लॉरर ने 1868 में बिश्रामपुर को अपनी कर्मस्थली बनाया। उस समय छत्तीसगढ़ी केवल बोलचाल की भाषा थी, लिखित साहित्य का अभाव था। उन्होंने स्थानीय भाषा सीखकर बाइबिल का ‘न्यू टेस्टामेंट’ छत्तीसगढ़ी में अनुवाद किया। इस अनुवाद ने न केवल ईसाई धर्म का प्रचार किया बल्कि छत्तीसगढ़ी भाषा को साहित्यिक पहचान भी दी।
बिश्रामपुर चर्च की सबसे अनोखी विशेषता इसका प्रार्थना हॉल के साथ सटा हुआ कब्रिस्तान है। इस अद्वितीय संरचना ने इसे देश के चर्चों में विशेष पहचान दिलाई है। सिर्फ एक धार्मिक स्थल होने के अलावा, यह चर्च सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व का प्रतीक भी बन चुका है। प्रार्थना हॉल और कब्रिस्तान का यह संयोजन दर्शाता है कि यह स्थल न केवल पूजा और प्रार्थना का केंद्र है, बल्कि समय, इतिहास और स्थानीय परंपराओं के साथ गहरे जुड़ा हुआ है।
लॉरर का उद्देश्य केवल धर्म प्रचार नहीं था। उन्होंने यहां पहला स्कूल और छोटा दवाखाना खोला। हैजा और अकाल जैसी आपदाओं के दौरान उन्होंने ग्रामीणों की मदद की। ग्रामीणों को आधुनिक खेती और बीजों की जानकारी देकर उनकी आर्थिक स्थिति सुधारने का प्रयास किया।
कहा जाता है कि लॉरर को इस जगह पर शांति और विश्राम मिला, इसलिए उन्होंने इसे ‘बिश्रामपुर’ नाम दिया। 19 मई 1868 को उन्होंने चर्च की आधारशिला रखी। यही स्थान आज छत्तीसगढ़ में ईसाई मिशनरी कार्यों का प्रमुख केंद्र बन गया।
लॉरर ने छत्तीसगढ़ी भाषा सीखी और बाइबिल के ‘न्यू टेस्टामेंट’ का अनुवाद स्थानीय बोली में किया। इस कार्य के चलते बिश्रामपुर न केवल ईसाई धर्म का केंद्र बना, बल्कि छत्तीसगढ़ी भाषा को लिखित और साहित्यिक पहचान भी मिली। उनका यह प्रयास ग्रामीणों के लिए धर्म को समझने और अपनाने का माध्यम भी बन गया।
आज बिश्रामपुर चर्च न केवल धार्मिक स्थल है, बल्कि छत्तीसगढ़ी भाषा, संस्कृति और सामाजिक सेवा का प्रतीक भी है। क्रिसमस और अन्य धार्मिक अवसरों पर यहां दूर-दूर से लोग श्रद्धा व्यक्त करने आते हैं। रेवरेंड लॉरर की मेहनत और उनकी भाषा के प्रति प्रेम ने इसे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से अमूल्य बनाया।
Published on:
04 Jan 2026 10:18 am
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