
भारत के मोबिलिटी सेक्टर में इस समय एक संरचनात्मक बदलाव देखने को मिल रहा है। सरकार समर्थित भारत टैक्सी का उभरना सिर्फ बाजार में एक नए विकल्प के आने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इस बात पर पुनर्विचार का संकेत है कि राइड-हेलिंग प्लेटफॉर्म्स को कैसे डिजाइन और संचालित किया जाना चाहिए। इस बदलाव के केंद्र में तीन अहम मुद्दे हैं—उपभोक्ताओं के लिए किफायती सेवाएं, ड्राइवरों की आय में स्थिरता, और प्लेटफॉर्म मॉडल्स की दीर्घकालिक स्थिरता।
कई वर्षों तक राइड-हेलिंग का प्रमुख मॉडल कमीशन आधारित रहा है, जिसमें प्लेटफॉर्म हर राइड से एक निश्चित प्रतिशत लेते हैं। हालांकि, अबभारत टैक्सी जैसे प्लेटफॉर्म और अन्य निजी कंपनियां तेजी सेसब्सक्रिप्शन या SaaS आधारित मॉडल अपना रही हैं। इस नए मॉडल मेंप्लेटफॉर्म एक बिचोलिये के बजाय केवल ड्राइवरों और यात्रियों को जोड़ने वाले एक डिजिटल माध्यम के रूप में काम करते हैं, जहां वे कमीशन केबजाय तय शुल्क लेते हैं और ड्राइवर अपनी पूरी कमाई अपने पास रख सकते हैं।
इस बदलाव के पीछे का तर्क सीधा है। कम मार्जिन पर काम करने वाले ड्राइवरों के लिए उतार-चढ़ाव वाले कमीशन की बजाय स्थिर आय ज्यादा महत्वपूर्ण होती है। वहीं, यात्रियों के लिए—खासतौर पर कम किराए वाली और अक्सर होने वाली यात्राओं में—किफायती दरें बनाए रखना जरूरी है। यह बदलाव टियर-2 और टियर-3 शहरों में खास मायने रखता है, जहां मोबिलिटी सीधे तौर पर रोजगार, शिक्षा और जरूरी सेवाओं तक पहुंच को प्रभावित करती है। सब्सक्रिप्शन आधारित मॉडल बिना भारी निवेश के विस्तार को संभव बनाते हैं और फर्स्ट-माइल व लास्ट-माइल कनेक्टिविटी को भी मजबूत करते हैं।
हालांकि, नीतिगत ढांचा इस बदलाव के साथ कदम नहीं मिला पाया है। वर्तमान में ऐप-आधारित मोबिलिटी सेवाओं के राइड किराए पर 5% जीएसटी प्रस्तावित है। मामूली और अक्सर लेनदेन वाले इस सेक्टर में इसका असर मामूली नहीं है। इससे सीधे तौर पर ड्राइवरों की आय प्रभावित होती है और समय के साथ किराए बढ़ सकते हैं, जिससे इन नए मॉडलों के फायदे कमज़ोर पड़ जाते हैं।
जैसा कि श्री मंजुनाथ के करुणाडा, अध्यक्ष – बेंगलुरु जिला, विजया सेनेड्राइवर्स यूनिट, कहते हैं: “ज्यादातर ड्राइवर सिर्फ गुजारा करने लायक ही कमा पाते हैं औरजीएसटी सीमा से काफी नीचे हैं… ऐसे में किराए पर जीएसटी लगाने सेहमारी आय पर असर पड़ता है या यात्राएं महंगी हो जाती हैं… नीतियों कोइस वास्तविकता को समझना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिएकि टैक्स हमारी रोजी-रोटी की कीमत पर न लगे।”
यह समस्या किसी एक प्लेटफॉर्म तक सीमित नहीं है, बल्कि संरचनात्मकहै। निजी और सरकारी—दोनों तरह के मॉडलों पर एक जैसा टैक्सप्रस्तावित है। भारत टैक्सी, जिसे एक सहकारी विकल्प के रूप में सोचागया है, जहां कमीशन शून्य हो और ड्राइवरों के हितों पर ध्यान दिया जाए, वह भी इसी चुनौती का सामना कर रहा है। इससे साफ है कि समस्याबाजार के डिजाइन में नहीं, बल्कि नीतिगत सामंजस्य की कमी में है।
इस स्थिति को और जटिल बनाती है नियामकीय अस्पष्टता। कई मामलोंमें भुगतान सीधे यात्रियों और ड्राइवरों के बीच नकद या UPI के जरिएहोता है, जिससे प्लेटफॉर्म के लिए जीएसटी वसूलना व्यावहारिक रूप सेमुश्किल हो जाता है। ऐप-आधारित सेवाएं डिजिटल ट्रेसबिलिटी, सुरक्षाऔर शिकायत निवारण जैसे फायदे देती हैं, जो पारंपरिक परिवहन में नहींमिलते। लेकिन अगर इन पर ज्यादा बोझ डाला गया, तो लेनदेन फिर सेअनौपचारिक व्यवस्था की ओर जा सकते हैं, जिससे पारदर्शिता, समावेशन और सरकार के डिजिटल इंडिया अभियान को नुकसान होसकता है।
जब प्लेटफॉर्म नवाचार नीतियों से आगे निकल जाता है, तो नीति में देरीकी कीमत अब सिर्फ सैद्धांतिक नहीं रहती, बल्कि ज़मीनी स्तर पर साफदिखने लगती है। ऐसे में, सब्सक्रिप्शन आधारित मोबिलिटी प्लेटफॉर्म्स केलिए स्पष्ट और भविष्य को ध्यान में रखने वाले जीएसटी दिशानिर्देशजरूरी हैं, ताकि सेवाएं किफायती बनी रहें, ड्राइवरों की आय सुरक्षित रहेऔर इस क्षेत्र का विकास जारी रह सके।
Published on:
01 May 2026 03:18 pm
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