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युनुस खुदा वास्ते घर जल्दी आओ, बच्चे भूख से तड़प रहे हैं, अब मैं मर जाऊंगी

भूख से तड़पती हुई पत्नी ने अपने पति युनुस से फोन पर कहा, जल्दी घर आ जाओ अब मैं मर जाऊंगी।

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yogi adityanath

नोएडा/मुरादाबाद। आशुतोष पाठक

यह किस्सा युनुस की जुबानी है। वही युनुस जिनकी 43 वर्षीय पत्नी अमीरजहां 25 जनवरी 2018 को मुरादाबाद के जिला अस्पताल में दोपहर करीब तीन बजे चल बसीं। युनुस, उनके बच्चों और पड़ोसियों का दावा है कि अमीरजहां की मौत भूख से हुई। कई दिनों से उन्होंने खाना नहीं खाया था। क्यों, घर में राशन नहीं था, इसलिए। हालांकि, डॉक्टर और प्रशासन के दावे अलग हैं। उनके मुताबिक, अमीरजहां की मौत टीबी से हुई। दोनों पक्षों के अपने-अपने दावे हैं। इन खबरों में आप दोनों पक्ष को पढि़ए और तय किजिए कि कौन सच बोल रहा है और कौन झूठ। ..तो पहले युनुस की जुबानी उनकी बात सुनते हैं, क्योंकि वहीं से पूरी कहानी पता चलेगी।

चार महीने से घर में बहुत तंगी थी। मैं दो तरफ से जकड़ा हुआ था। एक, बीमारी, और दूसरा गरीबी। हालत यह थी कि दवा तो दूर मेरे पास राशन खरीदने तक को पैसे नहीं थे। कहीं, काम भी नहीं मिलता। मेरी पत्नी अमीरजहां और तीन मासूम बच्चे (तबस्सुम, रहनुमा और मुस्कान) कई-कई दिन तक भूख से तड़पा करते थे। उनकी यह हालत मुझसे देखी नहीं जाती। हालात बेकाबू होते तो मजबूरी में रिक्शा चलाकर कुछ पैसे का इंतजाम करता। तब राशन आता, लेकिन इससे मेरी बीमारी बढ़ जाती। साब, रिक्शा चलाने में कोई बुराई नहीं थी, लेकिन शरीर मेरा साथ नहीं देता था।

मैं बताता हूं क्यों। दरअसल, हम कांठ के रहनेे वाले थे। घर पर खेती बारी थी नहीं, तो काम की तलाश में 25 साल पहले मुरादाबाद आ गए। यहां ढलाई का काम करने लगा। लेकिन उसका धुंआ मेरे फेफड़े में जा रहा था और इससे मुझे टीबी हो गई। कुछ साल वह काम किया, लेकिन स्थिति बिगड़ी तो छोडऩा पड़ा। इसके बाद रिक्शा चलाने लगा। लेकिन सांस फूलने लगती थी और बीमार पड़ जाता। कई-कई दिन तक बिस्तर पर रहता था, ऐसे में फांकाकशी की नौबत आ जाती। पिछले छह महीने में हालात ज्यादा बिगड़ गए थे। घर का खर्च चलना मुश्किल होने लगा था। पत्नी और बच्चों की हालत देखता तो बहुत दुख होता। एक परिचित ने पुणे में काम दिलाने की बात कही। तीन महीने पहले उनके साथ वहां गया। दो हफ्ते ठेले पर बिस्कुट और नमकीन बेचा, लेकिन बदकिस्मती साथ नहीं छोड़ रही थी। वहां भी तबीयत खराब हो गई। दवा खाई तो रिएक्शन हो गया। चेहरा और शरीर सूज गया। जगह-जगह घाव भी हो गए। मुरादाबाद से अमीरजहां रोज फोन करतीं, जल्दी पैसा भेजो। घर में खाने को कुछ नहीं है। शायद आप समझ सकते हैं कि एक मां पर तब क्या बीतती होगी, जिसके घर में राशन का एक दाना नहीं। पति परदेस में बीमार है और घर में बच्चे भूख से तड़प रहे हैं।

दुकानदार को फोन कर कुछ राशन देने को कहा, खुदा खैर करे, उनने दिया भी। परिवार को एक बार फिर राशन मिलने लगा। लेेकिन बीमारी मेरा पीछा नहीं छोड़ रही थी कि काम पर वापस जाऊं। काम नहीं तो आमदनी भी नहीं हो रही थी। दिन बीतते गए, 15 जनवरी को एक बार फिर अमीरजहां का फोन आया। बोलीं, दुकानदार अब उधार राशन नहीं दे रहा। घर पर राशन खत्म हो गया। बच्चे भूखे हैं। कुछ करो, बस जल्दी आ जाओ। मैंने भरोसा दिलाया, सब ठीक होगा, इंतजार करो।

19 जनवरी को फिर फोन आया कि घर में राशन बिल्कुल नहीं है। बच्चे भूख से तड़प रहे हैं, जल्दी आओ। मेरी भी तबीयत ठीक नहीं है। मुझसे यह स्थिति देखी नहीं जा रही। अब मैं मर जाऊंगी। उन्हें दिलासा दिया कि खुदा हमारी मदद जरूर करेगा। नमाज में भी खुदा से दुआ करता कि स्थिति सुधरे और हमें रोटी नसीब हो। अमीरजहां रोज फोन करतीं और मैं उन्हें बस दिलासा देता। फिर आया 25 जनवरी। वह मनहूस दिन। दोपहर करीब एक बजे बड़ी बेटी तबस्सुम ने फोन किया कि अम्मी बेहोश हो गई है। मैं यह खबर सुनकर सन्न था। मैंने बिना समय गवांए यूपी के लिए ट्रेन पकड़ ली। उसी समय मुरादाबाद में अपने एक परिचित को फोन किया। उनसे अमीरजहां को तुरंत अस्पताल ले जाने की मिन्नतें की। वह आए और उसे अस्पताल पहुंचाया। डॉक्टरों ने उनका इलाज किया। दो घंटे क्या इलाज हुआ, पता नहीं। लेकिन बताते हैं कि करीब तीन बजे मेरी अमीरजहां अल्लाह को प्यारी हो गई। (यह कहतेे हुए युनुस की आंखेेें भर आईं। हाथ-पैर कांपने लगे। मैं उनसे करीब दो फुट दूर बैठा था, उनके पूरे शरीर में कंपन साफ देख पा रहा था। उनकी यह हालत देख मुझे आगे बात करने की हिम्मत नहीं हुई, लेकिन युनुस ने एक बार फिर बोलना जारी रखा। सच कहूं तो मैं उनकी और बच्चों के हिम्मत की दाद देता हूं कि अमीरजहां की मौत और अपनी गरीबी को वह कितनी बेबाकी से बयां कर रहे थे।)

(आप यह खबर पत्रिका डॉट कॉम पर पढ़ रहे हैं। बता दें कि पत्रिका डॉट कॉम यूपी में बीते कुछ महीनों में भूख से हुई मौतों पर श्रंखला चला रहा है। यह उसी कड़ी में दूसरी किस्त है। इससे पहले पहली किस्त में आपने पढ़ा —यह पढ़ने के बाद आपको शर्मिंदगी होगी कि हम किस समाज में रह रहे हैं अगली यानी तीसरी किस्त आप 14 फरवरी को पढ़ेंगे —"अमीरजहां हमेशा अपने नाम की तरह रही, उसमें खुद्दारी थी, कभी हाथ नहीं फैलाया" —)