
दिल्ली के लोग पुराने शहर की गलियों पर एक मजाक करते हैं। कहते हैं कि पुरानी दिल्ली की कुछ गलियां इतनी तंग हैं कि अगर एक लड़की और लड़का आमने-सामने आ जाएं तो निकाह की ही गुंजाइश बचती है। कुछ ऐसी ही गलियां यमुना के किनारे बसे गोकुल की भी हैं, जहां श्रीकृष्ण का बचपन बीता।
इन संकरी गलियों में हजारों की भीड़ के बीच कुछ सजी-धजी महिलाएं दे दनादन छड़ियां चला रही थीं। कहीं भागने की जगह तो थी नहीं, ऐसे में इनसे बचने के लिए लोग एक-दूसरे पर गिर जाते थे। छड़ियां मारने में इतनी समानता का भाव था कि मीडिया वाले तो पिट ही रहे थे, पुलिसवालों को भी छड़ी पड़ रही थी। ये मौका था छड़ीमार होली का।
यमुना के किनारे पर बसा है गोकुल
छड़ीमार होली देखने के लिए हम शनिवार सुबह करीब 10 बजे मथुरा से गोकुल पहुंचे। यह मथुरा से 10 किमी दूर है। हाइवे के नजदीक ही यमुना के किनारे बसा है। हाइवे से गांव की तरफ मुड़ते ही ये समझ आ गया कि यहां कुछ खास चल रहा है।
गांव से पहले ही पुलिस ने बैरिकेडिंग लगाकर वाहनों की एंट्री बंद की हुई थी। गांव शुरू होते ही बड़ा सा पंडाल लगा था, जिसमें खूब जोर से गीत-संगीत चल रहा था। देश ही नहीं विदेश से आए लोग भी जमकर ठुमके लगा रहे थे। पता चला कि इस पंडाल में कुछ देर बाद छड़ीमार होली होनी है। हमने उस जगह का पता पूछा, जहां से गांव की औरतें यहां आनी हैं और उस ओर चल दिए।
रास्तों पर गाय और बंदर भी चल रहे थे साथ
गांव में अंदर की तरफ जाने पर हमने लोगों के साथ-साथ गायों और बंदरों का एक बेहद सुंदर गठबंधन देखा। लोग जो खा रहे थे, वही बंदरों और गायों को खिला रहे थे। साथ ही छोटे-छोटे रास्ते पर भी तीनों साथ-साथ आसानी से चल रहे थे।
छोटी गलियों का हम जिक्र कर ही चुके हैं। संकरी गलियों से होते हुए हम पहुंचे यमुना के करीब बने नंद महल में। वो मंदिर जिसके लिए माना जाता है कि यहां श्रीकृष्ण का बचपन बीता।
मंदिर में अंदर पूजा पाठ के साथ राधे-राधे के जयकारे लग रहे थे। तो बाहर ढोल पर डांस के एक-दूसरे पर दे दनादन रंग फेंका जा रहा था। इस दौरान रंग किस पर फेंका जाए, किस पर नहीं, या कोई बुरा तो नहीं मान जाएगा जैसा कोई कन्सेप्ट यहां दिखता ही नहीं है।
1 बजे से नंदमहल से निकली झांकी
दिन के करीब 1 बजे नंदमहल से कृष्ण की झांकी निकलती है। तंग गलियों से कृष्ण की झांकी गुतरती है तो लोग छतों से फूल बरसाने लगते हैं। इस दौरान कुछ नहीं दिखता, यानी भीड़ में ऊपर देखने के अलावा कोई ऑप्शन ही नहीं होता है।
कृष्ण की झांकी जैसे-जैसे तंग गलियों से निकलकर थोड़े बड़े रास्ते में आती है तो गोपियां बनी गांव की महिलाएं डंडा चलाना शुरू कर देती हैं। दुल्हन के कपड़ों में ये महिलाएं खुद को गोपी ही मानती हैं और ऐसे ही बर्ताव करती दिखती हैं।
गोपियां छड़ी चलाती हैं, कुछ को धीरे से पड़ती है तो कुछ को ऐसी लगती है कि दौड़कर दूर जाते दिखते हैं। दो-चार छड़ी खाने के बाद हम एक गोपी तक पहुंचते हैं। हम उनसे बातचीत शुरू करते हैं।
महिलाएं बोलीं- आज तो हम बस गोपी हैं
बातचीत शुरू होते ही ये महिला कहती हैं कि आज हमारा न तो कई नाम है और न दीदी, चाची का कोई रिश्ता। आज उनको गोपी ही पुकारा जाए। गोपी से हम इस होली के बारे में पूछते हैं।
गोपी कहती हैं, यहां कान्हा का बचपन बीता। हमारे मन में उनका वही रूप बसा है। हम उनके साथ होली खेलेंगे तो बरसाना की तरह लट्ठ तो नहीं मारेंगे। इतने छोटे कृष्णजी को चोट नहीं लग जाएगी। हम उनको चोट पहुंचाने के लिए नहीं बस होली के दिन मसखरी करने, उन्हें छेड़ने के लिए छड़ी मारते हैं।
छड़ी होली की शुरुआत कब से हुई और कैसे ये इतना बड़ा इवेंट बना, इस पर ज्यादातर गोपियों को बहुत ज्यादा पता नहीं होता, न ही उनका इस बारे में जानकारी इकट्ठा करने पर कोई ध्यान है। इन सबकी एक आस्था है और उसी में ये गोपियां बनकर होली खेलती हैं।
बीते कुछ दशकों में ज्यादा भव्य हुई है छड़ी होली
छड़ी मार होली के बारे में कुछ और लोगों से भी बात हुई। उन्होंने बताया कि छड़ी मार होली यूं तो बहुत पुरानी है, लेकिन इसको भव्यता बीते कुछ दशकों से ही मिली है। इससब बातचीत के बीच कृष्णजी की झांकी उस पंडाल में पहुंच जाती है, जहां दरअसल होली होनी है।
इस पंडाल में पहुंचने के बाद शुरू होती है, वो होली जिसका सबको इंतजार होता है। पंडाल में आने के बाद गोपियों का एकदम आक्रामक रूप दिखता है। कुछ इस तरह से छड़ी चलाती हैं कि पुलिसवालों को भी हालात संभालना मुश्किल हो जाता है।
गोपियां उन लोगों को ज्यादा छड़ी मारती हैं, जो उन पर गुलाल डालते हैं। ऐसे में पुलिस के लोग लोगों को गुलाल फेंकने से भी रोकते हैं। करीब एक-डेढ़ घंटे तक गोपियों से लोग पिटते हैं। इस बीच पंडाल पर डांस भी होता रहता है और लोग रंग भी खेलते रहते हैं।
इस सबके बीच गोपियों को रोककर लोग उनके साथ फोटो भी खींचते हैं और वीडियो भी बनाते रहते हैं। बीच-बीच में चलते रहते हैं और राधे-राधे के जयकारे लगाते रहते हैं।
सूरज ढलने के साथ कम होने लगते हैं लोग
जहां गोपियां छड़ी चलाते-चलाते नहीं थकती हैं, वहीं, लोगों को भी मार खाने में आनंद आता रहता है। कार्यक्रम का ढलान तब शुरू होता है, जब दोपहर ढलने लगती है। तेज संगीत के बावजूद गोपियां बैठने लगती हैं तो बाहर से आए लोग भी अब मथुरा और दिल्ली की तरफ लौटने लगते हैं।
सूरज ढलने के साथ ही गोपियां गांव की तरफ लौटने लगती हैं तो हम भी मथुरा की तरफ चल देते हैं। हालांकि तब तक हमारे चेहरे इतने रंगीन हो चुके होते हैं कि एक-दूसरे को पहचानने के लिए गौर करनी होती है। खैर चेहरे न रंगें तो फिर होली ही क्या और होली की शाम ही क्या? माधव राम जौहर का शेर है-
मुंह पर नकाब जर्द, हर जुल्फ पर गुलाल
होली की शाम ही तो है सुबह बसंत की।
Published on:
05 Mar 2023 09:27 am
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