
-संध्या नवोदिता
Gandhi Jayanti 2023: मैं जितना गाँधी को पढ़ती हूँ उतना ही वह मोहित करते हैं। आज उनकी देह का अवसान हुए सत्तर साल हो गए हैं पर वह पहले से भी ज्यादा हर जगह मौजूद हैं। उन्हें प्रेम करने वाले लोग बहुत हैं, उनसे नफरत करने वाले भी बहुत मुखर हैं। मैं उनका लगातार चर्चा में रहना कोई उपलब्धि नहीं मान रही, हालांकि आज के पैमाने पर चर्चा में बने रहना ही उपलब्धि माना जाता है, इसके इतर इस सदी में, इतने राजनैतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक बदलावों के बाद भी इस समाज को, देश को गाँधी के विचार की जरूरत है। गाँधी की प्रासंगिकता यहाँ पर है।
मुझे ‘आज गाँधी’ पर ‘प्रार्थना प्रवचन’ की रौशनी में बात करनी है। इस पुस्तक में दिल्ली की प्रार्थना सभाओं में, अप्रैल 1947 से जनवरी 1948 तक के दस महीनों में किये गये गए 224 प्रवचनों का संकलन है। इन प्रवचनों को मैंने पहली बार ही पढ़ा और इस बात पर हैरान हुई कि अब तक इन्हें क्यों नहीं पढ़ा। गाँधी को जानने समझने के लिए उनके ये प्रवचन बहुत महत्वपूर्ण हैं। पढ़ते हुए लगा कि जैसे मैं भी उनकी प्रार्थना सभा का हिस्सा बन गयी हूँ। जैसे रोज उनको सुन रही हूँ। पुस्तक में आज़ादी के साढ़े चार महीने पहले से ये प्रवचन शुरू होते हैं और आज़ादी के पाँच महीने बाद यानी गाँधी के जीवन के अंतिम दिन तक का संकलन इसमें है। इनके साथ चलते हुए मन सशंकित हो रहा था कि अभी जनवरी भी आयेगी, वह जनवरी जिसके अंतिम दिन पर तीन गोलियाँ गाँधी का इंतज़ार कर रही हैं। उस दिन गाँधी प्रार्थना के लिए आयेंगे, सभा में पहुँचेंगे, पर कभी पहुँच नहीं पायेंगे, वह दिन रक्तरंजित होगा। गाँधी के साथ रक्त शब्द ही कितना असंगत लगता है। लेकिन उस दिन अहिंसा के साथ हिंसा का शब्द भी सदा के लिए जुड़ गया।
यह सब भावुक लग रहा होगा. लेकिन गाँधी तो भावुक ही थे। उनको पढ़ते हुए मुझे बार-बार लगा है कि उनको तर्क से बहुत नहीं समझा जा सकता। यह उन्हीं सबसे बड़े ‘भंगी’ गाँधी का कमाल है कि वह हमारे तर्क को उत्तेजित करते हैं, हमारी तार्किकता को पैनी धार देते हैं कि हम सच में इन प्रार्थना प्रवचनों का हिस्सा हैं भी या नहीं। सारी भावुकता के साथ मैं गाँधी विचार के साथ काफी सहमत होते हुए भी शत प्रतिशत नहीं हूँ, गाँधी के नैतिक मूल्यों से मैं पूरी तरह सहमत हूँ।
पुस्तक हर प्रार्थना सभा का ब्योरा देती है। शब्द-दर-शब्द. गाँधी की प्रार्थना सभा में रोज छः चीज़ें होती हैं- 1. बौद्ध धर्म का जापानी भाषा में मन्त्र, 2. संस्कृत में गीता के श्लोक, 3. अरबी भाषा में कुरआन से एक कलमा, 4. फारसी भाषा में जरथुस्त्र का मन्त्र, 5. हिन्दी या किसी प्रादेशिक भाषा में भजन और आखिर में 6. राम-नाम या नारायण नाम की धुन। इन लहजों में समन्वयवादी गाँधी मुखर होते हैं, जो विविधतापूर्ण भारत की ज़रुरत तब भी थी और आज भी है। सिर्फ भारत ही नहीं, इस समन्वय की जरूरत तो व्यष्टि से समष्टि तक को है।
गाँधी बोल रहे हैं। ये प्रवचन गाँधी को परत दर परत खोलते हैं। कितने सहज थे गाँधी ! वह कहते हैं मैं केवल सत्य का शोधक हूँ। यदि आपको मेरे विचारों में कोई असंगति दिखाई पड़े तो परेशान न हों, मेरे उससे अगली तारीखों के विचार भी देखें और अंतिम को ही सत्य माने। क्योंकि मैं सत्य की साधना में अपने विचार बदलता रहता हूँ। मुझे असंगत होने में ज़रा भी दिक्कत नहीं है। मैं सुसंगत होने का भक्त नहीं हूँ। यह हैं अपने को प्रतिपल बदलने को तैयार गाँधी, उचित लगे तो अपनी ही बात छोड़ने, खारिज करने को तैयार गाँधी। क्या सच में गाँधी इसी धरती पर जन्मे थे?
जो आपको मारने आये उसके प्रति भी मन में प्रेम रखो, क्योंकि मृत्यु ईश्वर की दी हुई है, उसका हेतु कोई भी बने। वह जान भी ले तो ख़ुशी से दे दो। सन 1946 की अप्रैल से वह ऐसी बातें कह रहे थे। देश दंगे की आग में झुलस रहा था। एक बूढ़ा आदमी ठंडे पानी का चलता फिरता झरना बन गया था। जहाँ आग जा रही थी पीछे पीछे गाँधी जा रहे थे।
आज़ादी की लड़ाई में गाँधी हर वर्ग को अंग्रेजों के खिलाफ एकजुट करने में सफल हुए थे और अंग्रेजों की बड़ी ताकत को देखते हुए यह ज़रूरी था कि सब एक साथ खड़े हों। गाँधी के साथ बड़े पूंजीपति, व्यापारी, मुसलमान, छात्र, हरिजन, स्त्रियाँ आदि आये।
उस समय गाँधी के साथ जितनी बड़ी संख्या में और जितनी ताकत के साथ स्त्रियाँ जुड़ीं इतने पिछड़े समाज में स्त्रियों की इतनी बड़ी राजनैतिक भागीदारी चकित करती है, तसल्ली भी देती है। वे साडी पहने सर पर पल्लू रखे उनकी प्रार्थना सभा में माइक पर बोलती नजर आती हैं, वे आन्दोलन में गाँधी के साथ लड़ती हैं, पद यात्राओं में साथ चलती हैं। उनके साथ आने वाली महिलाओं में सबसे पहले उनके परिवार की महिलाएं थीं, जैसे खुद कस्तूरबा, जिन्हें उन्होंने अहिंसा का पहला पाठ पढ़ाने वाली शिक्षिका घोषित किया। गाँधी ने कस्तूरबा से कहा कि हम पुरुष जैसे सरकार से लड़ते हैं वैसे तुम भी लड़ो। फिर वे महिलाएं जो उनके करीब थीं और बाद में परिवार का हिस्सा बन गयीं। गाँधी जिन दो महिलाओं के कंधे पर हाथ रखकर चलते थे, उनमें से एक आभा बंगाली थीं, उनका विवाह गाँधी के परपोते कनु से हुआ था। मनु गाँधी की दूर की रिश्तेदार थी। वह मनु को पोती कहते थे। ये आभा और मनु उस समय मौजूद थीं, जब गोडसे ने गाँधी को गोली मारी थी और वे महिलाएं जो उच्च वर्ग से थीं और गाँधी के वृहत्तर परिवार का हिस्सा बनीं, जिनमें सरोजिनी नायडू, राजकुमारी अमृत कौर, रवीन्द्र नाथ टैगोर की भांजी सरला देवी, सुशीला नायर आदि. इनके बाद वे महिलाएं जो विश्व परिवार से थीं- मीरा (जो ब्रिटिश अफसर की बेटी मेडलीन स्लेड थीं), माग्रेट स्पीगेल, श्लेजिन फेरिंग, मिली ग्राहम, नीला क्रैम कुकु, पोलक सेज आदि थीं। एल्यानोर भौटॉन की एक पुस्तक है- ‘वीमेन बिहाइंड महात्मा गांधी जी’, जो 1954 में लिखी गयी. हमारी नजर में स्त्रियों के लिए बराबरी के अवसर बनाते हुए गाँधी अपने आखिरी दौर में उन्हीं स्त्रियों के कंधो का सहारा लेते हैं। स्त्रियों को कंधा देने या उनका कंधा लेने से किसी का महात्मापन बाधित नहीं होता, ‘महात्मा’ ‘गाँधी’ का भी नहीं. महिलाओं से जुड़ी जिन बातों को लेकर कुछ ठस्स बुद्धि के लोग उनका चरित्र हनन करने का प्रयास करते हैं उनके लिए यह जानना ज़रूरी है। स्त्रियों को कंधा देने या उनका कंधा लेने से किसी का महात्मापन बाधित नहीं होता- ‘महात्मा’ ‘गाँधी’ का भी नहीं !
गाँधी का ह्रदय स्त्री का है या पुरुष का, यह समझना बड़ा मुश्किल है. बहरहाल, उन्होंने सभी जेंडर को एक लड़ाई के लिए इकठ्ठा करने का अद्भुत काम किया। गाँधी जेंडर नहीं बल्कि मनुष्य मात्र की बात करते हैं। वह स्त्री पुरुष को प्रतिद्वंदी नहीं बल्कि एक दूसरे का पूरक मानते हैं।
यह गाँधी के साथ आने वाली महिलाओं की सम्पूर्ण तस्वीर नहीं है बल्कि बस एक मोटा प्रतिनिधि जिक्र है, यह समझने का कि एक राजनीतिज्ञ के साथ कभी इतने बड़े पैमाने पर हर वर्ग, आयु, जाति, देश और विदेश तक की महिलाएं शामिल हुई थीं, ख़ास कर यह वह समय है जब आज़ादी के आन्दोलन में पुरुष ही मुख्य थे और स्त्रियाँ बड़ी सामाजिक बुराइयों से पीड़ित थीं। न उनके लिए शिक्षा थी, न स्वास्थ्य, न अच्छा खाना, पहनना, न बहुत नौकरियां, न घर से निकलने का कोई रिवाज़, जब शादी और घर की चक्की ही उनके लिए अंतिम विकल्प था।ऐसे समय में गाँधी स्त्रियों का भरोसा जीतते हैं और कितने सहज तरीके से उन्हें आज़ादी की महान लड़ाई का ज़रूरी हिस्सा बना लेते हैं, यह बड़ी बात है। भारतीय इतिहास में ऐसा कोई नेता देखना मुश्किल है जिसने पूरे देश से स्त्रियों की इतनी बड़ी भागीदारी कराई हो।
गाँधी आज इसलिए ज़रूरी हैं क्योंकि जब भी देश की बड़ी आबादी के दुखों की बात होगी, जब जनता के दुःख दर्द को समझने और उसे दूर करने की ज़रूरत होगी, तब गाँधी से बेहतर कौन मिलेगा जिनसे हम यह सीख पायेंगे कि करोड़ों करोड़ आम जनता से संवाद कैसे किया जाता है। स्त्रियों, शोषितों को कैसे उनकी लड़ाई के लिए तैयार किया जाता है।
गाँधी आज भी इसलिए ज़रूरी हैं कि जब वह अपनी 1910 में लिखी पुस्तक हिन्द स्वराज में कहते हैं- ‘ मेरा स्वाभिमान मुझे यह नहीं सिखाता कि देशी राजाओं के मातहत जिस तरह प्रजा कुचली जाती है उसी तरह उसे कुचलने दिया जाए, मुझ में बल होगा तो मैं देशी राजाओं के जुल्मों के खिलाफ और अंग्रेजी जुल्म के खिलाफ जूझूँगा।’ वह जुल्म मात्र के खिलाफ हैं, चाहे वह देशी सत्ता करे या विदेशी। इटली को आस्ट्रिया की गुलामी से छुडाने की बात पर वह कहते हैं –‘दो राजाओं के बीच शतरंज की बाजी लगी थी, इटली की प्रजा तो प्यादा थी। आस्ट्रिया के जाने से इटली को क्या लाभ हुआ? इटली के मजदूर अब भी दुखी हैं, जिन सुधारों के लिए जंग मची वे तो हुए नहीं, प्रजा की हालत सुधरी नहीं।’
आगे गाँधी कहते हैं- ‘ हिन्दुस्तान की ऐसी दशा करने का तो आपका इरादा नहीं ही होगा. मैं मानता हूँ कि आपका विचार हिन्दुस्तान के करोड़ों लोगों को सुखी करने का होगा, यह नहीं कि आप या मैं राजसत्ता ले लूँ। इसलिए हमें सिर्फ प्रजा की स्वतन्त्रता का ही विचार करना चाहिए।’ आज भी जनता त्रस्त है। गाँधी को सत्ता किसकी है इससे बहुत मतलब नहीं था, मतलब जनता के सुख से था। वह कहते थे यदि अँगरेज़ हिन्दुस्तानी जनता का भला करें तो मैं उन्हें विदेशी नहीं, हिन्दुस्तानी मान लूँगा।
गाँधी की कार्यनीति आज इसलिए ज़रूरी लगती है क्योंकि हमारे पास आज भी इससे ज्यादा कारगर आन्दोलन के तरीके नहीं हैं। क्रूर, ताकतवर और भयानक दमनकारी अँगरेज़ सत्ता से उस समय अहिंसा से लड़ा जा सका। यह गाँधी ही थे जिनके जवाब में शासक जलियाँ वाला काण्ड नहीं कर सकते थे और न ही तूतीकोरेन। हम भले गाँधी को नायक देखने के आदी हों, क्योंकि हम मसीहाई और करिश्मे को प्रणाम करने के आदती हो गये हैं लेकिन यह समझना होगा कि गाँधी हर एक नागरिक में नायकत्व का स्वप्न देख रहे थे। गाँधी एक व्यक्ति नहीं वह एक संस्था बन गये थे, हैं। वह अलग अलग देशों के प्रमुखों, और उनकी जनता के सवालों का बाकायदा जवाब देते थे। साथ ही ज़रूरत पड़ने पर देश के हर कोने में अपने सहयोगियों को लम्बे समय के लिए भेजते थे।गाँधी के पास नेतृत्व की एक स्पष्ट परिकल्पना थी कि नेतृत्व को एक सेवक और साथी होना चाहिए।
गाँधी द्वेष की जगह प्रेमधर्म सिखाते हैं, हिंसा की जगह आत्मबलिदान को रखते हैं, पशुबल को आत्मबल से चुनौती देते हैं। आज भी हम सोचें कि इन समस्याओं का इससे बेहतर और सटीक जवाब क्या होगा ? हम सोचें कि आज जलियाँ वाला के सौ साल हुए, हमारे पास सत्ता के जुल्म से निपटने के लिए क्या विकल्प हैं? सत्य का मूल्य कब कम होगा? अहिंसा कब अच्छा मूल्य नहीं होगा? यह कौन नहीं चाहेगा कि उसके साथ अहिंसक व्यवहार किया जाए? लोगों की नैतिकता को उकसा कर या प्रोत्साहित करके गलत कामों से रोकना सही कदम है। निश्चित ही सच्चे लोकतन्त्र में मनुष्य के जीवन में राज्य का दखल न्यूनतम हो जाएगा, लेकिन इसके लिए राज्य और सभ्यता को अभी लम्बी दूरी तय करनी है। सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह, अभय, आस्था, सत्याग्रह, शारीरिक श्रम, सर्वोदय, न्यासिता, ब्रह्मचर्य, स्वतंत्रता और लोकतन्त्र, स्वदेशी, भ्रातृत्व - गाँधी अपने मूलभूत मूल्यों से इन्हीं हितों को प्राप्त करने की चेष्टा करते हैं, इनमें से कौन सा मूल्य हम अप्रासंगिक कहेंगे? निश्चित ही ये सभी मूल्य गाँधी की इस बात को पुष्ट करते हैं कि यह धरती पूरी दुनिया की ज़रुरत को पूरा कर सकती है पर लालच एक भी व्यक्ति का पूरा नहीं कर सकती। ये मूल्य मनुष्य का निर्माण करते हैं।
मैंने प्रार्थना प्रवचन पढ़ा - यह मुझे एक भोले हृदय की, एक सच्चे आदमी की ,एक साफ़ दिल व्यक्ति की, सच में एक सत्याग्रही की बातें लगीं, वह दरअसल प्रार्थना ही लगी। यह गाँधी के उतार का वर्ष है, ये उनके जीवन का अंतिम वर्ष है, ये गाँधी के धुंधले होते जाने का वर्ष है। अब इस समय गाँधी जो भी बोल रहे हैं वह लगातार अपना प्रभाव खो रहा है। अब ये वे गाँधी नहीं हैं जिन्होंने बड़े बड़े आन्दोलन चलाए थे और जिनकी एक आवाज़ पर सब उठ खड़े होते थे। जिनके बारे में कवि ने खूब लिखा है - चल पड़े जिधर दो डग मग पर, चल पड़े कोटि पग उसी ओर, उठ गयी जिधर भी एक दृष्टि , मुड़ गये कोटि दृग उसी ओर....
अब ये वे गाँधी नहीं थे। उन्होंने अपने ही जीवन में अपनी आवाज़ का बहुत बड़ा उत्थान और फिर उसका असर कम होते जाना देख लिया था और वह इसे खूब महसूस कर रहे थे। आज गाँधी साम्प्रदायिकता से हार रहे थे। प्रार्थना प्रवचन में वह इस बात को बार बार कहते हैं कि मेरी एक आवाज़ पर लोग उठ खड़े होते थे अब मेरी कोई नहीं सुनता। यह कमजोर होते हुए गाँधी हैं। इन गाँधी के बारे में बात बहुत कम की गयी है। जो भी कुछ पढ़ा लिखा गया है वह आन्दोलनकर्ता गाँधी के बारे में और राजनैतिक प्रभावशाली गाँधी के बारे में ज्यादा कहा गया है। देश आज़ाद होने के बाद गाँधी ने जो भी किया उसके बारे में कम चर्चा होती है। आज़ादी के बाद की क्या गाँधी की राजनीति रही है, वह क्या कर रहे थे, यह कम देखा पढ़ा सुना गया है। प्रार्थना प्रवचन इसी हिस्से पर केन्द्रित है।
इस पूरे उतार के दौरान भी उनके अपने विश्वास और मूल्य और भी मजबूत होते चले जाते हैं। यानी अपने आन्दोलन के समय उन्होंने जिन मूल्यों के साथ यात्रा शुरू की, उतार के क्षणों में भी वे इन मूल्यों में सत्यता देख रहे थे। कहीं पर भी वह इन मूल्यों से समझौता नहीं करते। इस बात पर ध्यान देना होगा कि गाँधी जिन मूल्यों को लेकर चले थे उन मूल्यों पर कभी उन्होंने मामूली अविश्वास भी नहीं किया। उनको यह बात स्पष्ट थी कि मूल्य ही निदान हैं।
जिस समय आज़ादी मिलनी थी, उससे एक साल पहले पूरे देश में हलचल शुरू हो गयी थी, दंगे हो रहे थे, जो उसके एक साल बाद तक अपने भीषणतम रूप में जारी रहे। उस दरम्यान गाँधी ने अपने इन औजारों से कभी विश्वास नहीं खोया, वे लगातार इन्हीं औजारों से लड़ते रहे। उस पागलपन के माहौल में उनकी कोई नहीं सुन रहा था। इसके बाद कोई बड़ा आन्दोलन खड़ा नहीं हो पाया जो देश को इस व्यथा से मुक्त करा सके। हालाँकि गाँधी दंगा प्रभावित क्षेत्र में खुद भी जा रहे थे और अपने सहयोगियों को भेज रहे थे और दंगे शांत भी हो रहे थे, फिर भी गाँधी खुद को बार बार कमजोर बूढ़ा कहते हैं। विडम्बना रही कि इस वक्त बड़ा आन्दोलन तो दूर की बात, गाँधी की आवाज़ जैसे एक कमजोर बुजुर्ग की आवाज़ बन कर रह गयी। जो अपने जीवन का सुनहरा अध्याय लिख चुके थे और अब कुछ भी कहना बाकी नहीं था। ऐसे समय में यह गाँधी का, वह जितनी मजबूत भूमिका में रहे थे, उस के अनुसार गाँधी का रुदन भी था, सामाजिक रुदन था, व्यक्तिगत रूप से वह बहुत मजबूत थे, वह कहते ही हैं कि अब तो मैं अरण्य रोदन कर रहा हूँ। ऎसी जगह पर रुदन कर रहा हूँ जहाँ मेरे रुदन को कोई सुन नहीं रहा। मैं रो रहा हूँ सुनने वाला कोई नहीं है, इस शब्द को बार बार प्रयोग में ले आते हैं। यहीं पर यह बात भी देखने में आती है कि गाँधी की ह्त्या कब होती है। उनकी ह्त्या तब होती है जब वे इतिहास के और अपने जीवन के मोड़ पर सबसे कमज़ोर गाँधी थे, जब वह किसी के लिए चुनौती नहीं थे, वह कोई ऐसा बड़ा निर्णायक आन्दोलन करने की स्थिति में नहीं थे। उस समय गाँधी पर प्रहार होता है, उस समय गाँधी की ह्त्या होती है। हो सकता है उसके बाद उनका जीवन कम ही होता, वह जीवन के उन्यासीवें वर्ष में थे, हो सकता है वे दस साल और जीते। हालांकि अपने जीवन के बारे वह कहते थे कि जिस तरह मैं जीता हूँ, जिन नियमों और कर्म का पालन करता हूँ, उसमें मुझे 125 साल जीना है। जिस तरह वह व्रत उपवास रखते थे, लम्बी लम्बी पदयात्राएं करते थे, खाने में शुद्धता का ख्याल रखते थे, प्राकृतिक चिकित्सा पर निर्भर थे, मन साफ़ रखने के लिए मौन रखते थे, अहिंसा और शान्ति उनका मूल्य रहे, वह कहते थे कि इस विधि से जो भी रहेगा वह सवा सौ साल तो जियेगा ही। वह कहते थे कोई मुझे मार दे, तो मेरा क्या चला जाएगा। मृत्यु तो ईश्वर को देनी है। वह मुझे कभी भी बुला सकता है। यह कहते हुए वह यह बात जोड़ देते थे कि अगर उसे अब मुझसे कोई और महत्वपूर्ण काम न कराना हो तो मुझे बुला ले। मानो वह ईश्वर को ऐसा लालच दे देते थे कि अभी मैं तुम्हारा महत्वपूर्ण काम करने के लिए यहाँ पर हूँ और अगर तुम मुझे अभी बुला लोगे तो तुम्हारा वह महत्वपूर्ण काम छूट जाएगा।
उनका खुद को लेकर जो मूल्य था, वही मूल्य सभी के लिए था।वह पूरे हिन्दू समाज से यही तो कहते थे मरना तो एक दिन है ही, मारने वाला ईश्वर है, फिर घृणा अपने भीतर में रखकर क्यों मरना ! शायद गाँधी अपने इसी मनोभाव में जिए और उसी मनोभाव उन्होंने अपनी देह भी छोड़ी।
यह मानना होगा कि गाँधी के सिद्धांत और व्यवहार में अंतर नहीं था। वह जो लिखते थे, वैसा ही वह बोलते थे, और जैसा वह बोलते थे वैसा ही उनके जीवन में देखने को मिलता था। वह कितनी भी अव्यवहारिक बात आपको लगती हो, पर वह वैसा ही जीवन जीते थे। इसलिए क्योंकि वह सच्चे हैं। इस अव्यवहारिक का व्यवहार वह खुद ही हैं। कई बार लोगों को गाँधी हठी दीखते हैं, उन्होंने जो मन में सोच लिया वही उन्हें करना होता था, जो बोलते थे वही करते थे इसमें कोई अंतर नहीं होता था। गाँधी ने ऐसा कुछ भी नहीं कहा जिसे उन्होंने खुद जीकर या प्रयोग करके न दिखाया हो।
किताब के प्रथम खंड के आवरण पर लिखा है- वैष्णव जन तो तेने कहिये जो पीड़ पराई जाने रे... वह गाँधी का पूरा का पूरा जीवन दिखाता है, और दूसरे खंड का जो आवरण है उस पर सिर्फ हे राम लिखा है, वह अंतिम समय में गाँधी की मनोदशा को दर्शाता है। हे राम यानी आश्चर्य में रहने वाला व्यक्ति, या कुछ खोजने वाला व्यक्ति, या पीड़ा में रहने वाला व्यक्ति, या सबका शुकराना करने वाला व्यक्ति. हे राम यानी सबको माफ़ कर दिया उस व्यक्ति ने। हम ऐसे समाज से हैं जिनके मन में राम इस तरह बसे हुए हैं कि हम कैसी भी प्रतिक्रिया पर राम बोलते हैं- आश्चर्य , क्षोभ, दुःख, लगाव. कुछ भी प्रकट करना हो तो - हे राम। इन अनंत भावों के बीच गाँधी को यदि देखा जाए कि पूरे जीवन काल में वे जैसे रहे, आखिरी समय में भी उनके मनोभाव वैसे ही रहे। यदि यह सच है तो उन्होंने अंतिम समय में सबको माफ़ कर दिया होगा।
गाँधी आज भी प्रासंगिक हैं. जो लोग जनता से संवाद की ईमानदारी सीखना चाहते हैं उन्हें आज भी गाँधी के पास जाना होगा। वह कैसे अपने जीवन के हर पल जनता से जुड़ते हैं। कोई सुरक्षा ताम झाम नहीं, भाषण, पदयात्रा, गाँव देहात की यात्रा, हर किसी से मिलना, बात करना, यहाँ तक कि एकांत में की जाने वाली प्रार्थना भी कैसे जन प्रार्थना सभा में बदल गयी। ये उपाय उसी मस्तिष्क में आ सकते हैं जो अपने प्रति ईमानदार है। अपने प्रति सच्चा है। इसीलिए गाँधी सब के प्रति सच्चे हैं। गाँधी सत्य सिखाते हैं, बिना डरे सच बोलो, सत्य बोलना कितनी सामान्य सी बात है। अगर हम असली गाँधी से प्यार करते हैं तो हमें इतनी शक्ति तो मिल ही जायेगी कि हम निर्भय होकर सत्य बोल सकें, सत्याग्रही भी बनें. गाँधी निर्भय होने का मन्त्र देते हैं, सत्याग्रह को हथियार में बदल देते हैं, अहिंसा को ईमान की लड़ाई का कवच बना देते हैं। यह सब करते हुए वे कहीं झुकते नहीं, समझौता नहीं करते, अंग्रेजों के जुल्म की आंधी हो या भारत की आज़ादी का बेहद तकलीफदेह रक्तरंजित आख्यान, गाँधी अहिंसा के उसी कवच को पहने लहू में तर हो जाते हैं और हे राम उनके पूरे जीवन का एक सार बन जाता है। गाँधी सदिच्छाओं के जीवित पुंज हैं, हमारे पास गाँधी से प्रेम करने के अलावा कोई विकल्प नहीं।
(संध्या हिंदी की प्रसिद्ध कवयित्री हैं और ये उनके निजी विचार हैं)
Updated on:
02 Oct 2023 12:02 pm
Published on:
02 Oct 2023 11:33 am
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