
गुरु प्रकाश पासवान
राष्ट्रीय प्रवक्ता, भारतीय जनता पार्टी और दलित इंडियन चैम्बर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के सलाहकार
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प्रख्यात समाजवादी नेता लोकनायक जयप्रकाश नारायण समाजवाद को सामाजिक-आर्थिक समानता के लिए पूर्ण सिद्धांत मानते थे। उन्होंने अपनी पुस्तक ‘समाजवाद क्यों’ में विस्तृत व्याख्या की है कि भारत के लिए समाजवाद उपयुक्त क्यों है। वह लिखते हैं- ‘समाजवाद केवल व्यक्तिगत आचरण, व्यवहार की संहिता नहीं है, वह सामाजिक पुनर्निर्माण की व्यवस्था भी है। जब हम भारत में समाजवाद को लागू करने की बात करते हैं तो जो चीज हमें सबसे पहले अनुभव होती है, वह है समाजिक विभाजन, संस्कृति और अवसर की विषमताएं, साथ ही जिंदगी की श्रेष्ठ वस्तुओं का निराशाजनक रूप से असमान वितरण। गरीबी, भूख, गंदगी, बीमारी, अज्ञानता का कष्टकारी फैलाव है, जबकि मुट्ठी भर लोग आनंद, सुख-सुविधा और सत्ता-सुख भोगते हैं।’ विडंबना है कि असमानता आज भी विद्यमान है, सामाजिक व आर्थिक दोनों तरह से। हमारे लिए आज भी यह अभिशाप बनी हुई है। आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए एक समान व्यवस्था की जरूरत पर राष्ट्रीय सहमति थी और ईडब्ल्यूएस कोटा आर्थिक रूप से हाशिए पर खड़े वर्ग के लिए सामाजिक न्याय का एक रूप ही है।
दरअसल, सामाजिक न्याय हमारे संविधान निर्माताओं के सावधानीपूर्वक संजोए हुए लक्ष्यों में एक रहा है। आजादी की भोर में विशेष तौर पर आम्बेडकर ने सामाजिक रूप से वंचित वर्ग के लिए सरकारी शिक्षा और रोजगार की व्यवस्था में प्रणालियों को सुनिश्चित किया। पर दुर्भाग्य से जाति के नाम पर भेदभाव अब भी जारी है। राजस्थान के जोधपुर से एक खबर है, ट्यूबवेल से पानी भरने गए 46 वर्षीय दलित किशन लाल भील को बुरी तरह से पीटा गया, जिससे उसकी मौत हो गई। इसलिए ‘रिजर्वेशन’ और ‘रिप्रजेंटेशन’ से मिलकर ही भारत के करोड़ों वंचित और आश्रयहीन वर्गों के लिए सुदृढ़ आधार तय होता है। जरूरी है कि सबको साथ लेकर चलने की सामूहिक आकांक्षा हो। इसी रोशनी में न्यायाधीश दिनेश माहेश्वरी ने ईडब्ल्यूएस कोटे के फैसले पर अपनी सहमति जताते हुए महत्त्वपूर्ण टिप्पणी की द्ग ‘103वां संविधान संशोधन वैध है और यह संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन नहीं करता।’ उन्होंने यह भी कहा कि ईडब्ल्यूएस के लिए आरक्षण कोटा 50 प्रतिशत की उच्चतम सीमा से बढऩे के बावजूद बुनियादी ढांचे का उल्लंघन नहीं करता है क्योंकि यह सीमा अपने आप में लचीली है।
प्रख्यात समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया प्रचलित सामाजिक-आर्थिक असमानता के प्रबल विरोधी रहे। उनके लेख और भाषण हमेशा सामाजिक व आर्थिक रूप से हाशिए के लोगों के मुद्दों पर सूक्ष्म भेद उजागर करने वाली सार्वजनिक बहस को प्रेरित करते थे। हालांकि, लोहिया और जयप्रकाश के स्वघोषित अनुयायियों जैसे राजद, डीएमके और एआइएमआइएम के प्रति इतिहास बहुत विनम्र नहीं होगा। यह उल्लेख करना आवश्यक हो जाता है कि क्षेत्रीय जाति-आधारित दल चालाकी से अपना हित साधने के लिए मैदान में हैं। एक राजनीतिक दल के लिए केवल एक समूह या समुदाय की तरफ से बोलना या प्रतिनिधित्व करना अन्य का बहिष्कार करने की मानसिकता दर्शाता है। मूलत: सामाजिक न्याय के विचार को लेकर आगे बढ़े राजद और डीएमके आज एक परिवार और एक जाति की ‘पूंजी’ हैं। एक देश के रूप में, हमें एक आदिवासी महिला को देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद तक पहुंचता हुआ देखने में सात दशक लग गए। भारतीय राजनीति की तथाकथित सामाजिक न्याय वाली ब्रिगेड ने तो इसका भी संयुक्त रूप से विरोध ही किया था।
बीते आठ वर्षों में अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति के सशक्तीकरण की प्रणाली में आए बदलाव का ही नतीजा है कि जाति और समुदाय से परे हटकर 47 करोड़ से अधिक बैंक खाते खोले गए और हर नागरिक की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए दो अरब से ज्यादा कोरोना वैक्सीन लगाई जा चुकी हैं। गांधी से लेकर दीनदयाल उपाध्याय तक और सर्वोदय से लेकर अंत्योदय के सिद्धांतों तक, हमारे नेताओं ने हमेशा ही सर्वहारा को उनका अधिकार देना सुनिश्चित किया है।
Updated on:
10 Nov 2022 03:09 pm
Published on:
09 Nov 2022 07:38 pm
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