
के.एस. तोमर - वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक,
अयातुल्लाह अली खामेनेई की हत्या ने ईरान को 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद उसके सबसे निर्णायक मोड़ पर ला खड़ा किया है। किंतु भारत की प्रतिक्रिया भावनात्मक नहीं, बल्कि रणनीतिक है। नई दिल्ली के लिए यह क्षण वैचारिक बहस का नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, खाड़ी में बसे भारतीयों की सलामती, समुद्री व्यापार मार्गों की निरंतरता और क्षेत्रीय संतुलन की पुनर्समीक्षा का है। भारत संकट को घोषणाओं से नहीं, गणनाओं से परखता है। तेल आपूर्ति को लेकर आशंकाएं स्वाभाविक हैं, परंतु तात्कालिक ऊर्जा आपातकाल की स्थिति नहीं है। भारत के सामरिक पेट्रोलियम भंडार विशाखापत्तनम, मंगलूरु और पादुर में लगभग 5.3 मिलियन मीट्रिक टन क्षमता के साथ उपलब्ध हैं।
वाणिज्यिक भंडार सामान्यत: 60 से 70 दिनों की मांग को संभाल सकते हैं। वित्त वर्ष 2026 में पेट्रोलियम खपत 252.9 मिलियन मीट्रिक टन तक पहुंचने का अनुमान है, अत: चौकसी अनिवार्य है, किंतु संकट की स्थिति अभी दूर है। अतीत में प्रतिबंधों और वैश्विक उतार-चढ़ाव के दौरान भारतीय रिफाइनरियों ने आपूर्ति स्रोत बदलने की क्षमता दिखाई है।
तेहरान की सत्ता में निर्णायक बदलाव : खामेनेई के बाद सत्ता संतुलन स्पष्ट रूप से इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉप्र्स की ओर झुकता प्रतीत होता है। यह बल लंबे समय से ईरान की वास्तविक शक्ति-संरचना का केंद्र रहा है- मिसाइल कार्यक्रम, सामरिक उद्योग, बंदरगाह और क्षेत्रीय अभियानों पर इसका प्रभाव रहा है। धार्मिक प्रतिष्ठान वैचारिक वैधता देता था, जबकि निर्णायक नियंत्रण गार्ड के हाथों में था। अब यह अंतर लगभग समाप्त हो सकता है। ईरान के पास संगठित सैन्य ढांचा और विविधीकृत अर्थव्यवस्था है। गार्ड की आर्थिक पकड़ ऊर्जा, निर्माण, दूरसंचार और बंदरगाह प्रबंधन तक फैली है। इसलिए संभावित परिदृश्य अव्यवस्था का नहीं, बल्कि अधिक केंद्रीकृत और सैन्य-प्रधान गणराज्य का है।
होर्मुज की चुनौती और भारत का संतुलन : होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर तेहरान के संकेतों ने वैश्विक बाजारों में अस्थिरता पैदा की। विश्व के लगभग 20 प्रतिशत तेल व्यापार का मार्ग इसी संकीर्ण समुद्री रास्ते से गुजरता है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 90 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है और पिछले वित्त वर्ष में लगभग 161 अरब डॉलर का आयात किया। यदि मार्ग में दीर्घकालिक बाधा आती है तो इसका प्रभाव वित्तीय संतुलन और मुद्रास्फीति पर पड़ सकता है। फिर भी नई दिल्ली ने संयमित प्रतिक्रिया दी है। पेट्रोलियम मंत्रालय ने रिफाइनरियों के साथ समीक्षा बैठकें कर भंडार स्थिति का आकलन किया और अफ्रीका तथा दक्षिण अमरीका से वैकल्पिक आपूर्ति की संभावनाओं पर विचार शुरू किया। उत्पादन बढ़ाने के ओपेक+ संकेतों से आंशिक राहत मिल सकती है।
व्यापार, चाबहार और कूटनीतिक धैर्य : भारत-ईरान संबंध केवल ऊर्जा पर आधारित नहीं रहे। चाबहार बंदरगाह परियोजना भारत के लिए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच का रणनीतिक मार्ग है। यदि गार्ड-प्रधान शासन मजबूत होता है तो सुरक्षा प्राथमिकताएं बढ़ेंगी, परंतु ईरान भी क्षेत्रीय संपर्क परियोजनाओं के महत्व को समझता है। प्रतिबंधों से पहले द्विपक्षीय व्यापार 17 अरब डॉलर से अधिक था। पश्चिम एशिया को भारत के 8-9 मिलियन टन वार्षिक चावल निर्यात पर भी प्रभाव पड़ सकता है, यदि समुद्री बीमा या भुगतान चैनल बाधित होते हैं।
व्यापक सामरिक संकेत : चीन के लिए ईरान ऊर्जा और क्षेत्रीय संपर्क का महत्वपूर्ण केंद्र है। वह स्थिरता चाहता है, पर प्रत्यक्ष टकराव से बचेगा। रूस के लिए ऊंची तेल कीमतें आर्थिक लाभ ला सकती हैं, हालांकि तेहरान के साथ उसकी रक्षा साझेदारी भी गहरी है। पाकिस्तान, जो ईरान से सीमा साझा करता है, सीमाई अस्थिरता और आंतरिक सांप्रदायिक तनाव को लेकर चिंतित रहेगा। भारत के लिए चुनौती बहुआयामी है, पर नियंत्रण से बाहर नहीं। ऊर्जा भंडार, विविध स्रोत और संतुलित कूटनीति उसे लचीलापन प्रदान करते हैं। असली परीक्षा दीर्घकालिक भू-राजनीतिक अनिश्चितता में संतुलन बनाए रखने की है। रणनीतिक स्वायत्तता और आर्थिक यथार्थवाद पर आधारित भारत की विदेश नीति इस दौर में परखी जाएगी। यदि संयम, विवेक और दूरदृष्टि कायम रही, तो भारत न केवल अपने हितों की रक्षा करेगा, बल्कि पश्चिम एशिया में स्थिरता की एक संतुलित आवाज के रूप में उभरेगा।
Published on:
05 Mar 2026 01:32 pm
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