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संपादकीयः युद्ध के बीच ऊर्जा जरूरतों पर बनाए रखनी होगी नजर

तेल की कीमतों में हर 1 डॉलर की बढ़ोतरी से भारत पर सालाना 1.8 बिलियन डॉलर का अतिरिक्त बोझ पड़ता है। ऐसे में तेल की कीमतों में वृद्धि न केवल पेट्रोल-डीजल महंगा करेगी, बल्कि परिवहन, उर्वरक, बिजली और रोजमर्रा की वस्तुओं पर भी असर डालेगी।

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अमरीका-इजरायल के हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत ने पूरे क्षेत्र में प्रतिशोध की आग को जन्म दे दिया है। ईरान समर्थित हिजबुल्ला के संघर्ष में उतरने और ईरान की ओर से अमरीकी ठिकानों व साइप्रस स्थित ब्रिटिश एयरबेस को निशाना बनाए जाने पर आशंका है कि अब यह टकराव और बढऩे वाला है। पश्चिम एशिया की जटिल राजनीति में वैश्विक ताकतों की प्रत्यक्ष और परोक्ष भागीदारी इस स्थिति को और खतरनाक बनाती है। अमरीका की रणनीतिक मौजूदगी, ईरान के क्षेत्रीय सहयोगी, इजराइल की सुरक्षा चिंताएं और खाड़ी देशों की नाजुक संतुलन नीति, ये सभी तत्व आग में घी का काम कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में दुनिया की प्रमुख शक्तियां दो खेमों में बंटती हैं तो यह संघर्ष व्यापक युद्ध का रूप ले सकता है। इतिहास गवाह है कि इस क्षेत्र में छिड़े युद्ध अक्सर लंबा खिंचते हैं और उनका असर सीमाओं से बहुत दूर तक महसूस किया जाता है।

ईरान नेे होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद कर दिया है। यह जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की धुरी है, जहां से दुनिया का करीब एक तिहाई कच्चा तेल और करीब 20 प्रतिशत गैस का परिवहन होता है। इस मार्ग में व्यवधान का अर्थ है- तेल की कीमतों में उछाल, आपूर्ति संकट और वैश्विक मुद्रास्फीति का नया दौर। दुनिया की कई अर्थव्यवस्थाएं पहले ही आर्थिक दबाव झेल रही हैं, ऐसे में यह झटका वैश्विक वित्तीय स्थिरता को डगमगा सकता है। भारत के लिए यह परिदृश्य गहरी चिंता का विषय है। भारत का लगभग पचास फीसदी कच्चा तेल और 85 फीसदी गैस आपूर्ति होर्मुज जलडमरूमध्य से होती है। वर्तमान में भारत के 38 टैंकर होर्मुज में फंसे होने की जानकारी भी सामने आई है। तेल की कीमतों में हर 1 डॉलर की बढ़ोतरी से भारत पर सालाना 1.8 बिलियन डॉलर का अतिरिक्त बोझ पड़ता है। ऐसे में तेल की कीमतों में वृद्धि न केवल पेट्रोल-डीजल महंगा करेगी, बल्कि परिवहन, उर्वरक, बिजली और रोजमर्रा की वस्तुओं पर भी असर डालेगी। इससे महंगाई बढ़ेगी और आर्थिक विकास की गति प्रभावित हो सकती है। खाड़ी देशों में बसे लाखों भारतीयों की सुरक्षा और रोजगार भी संकट में पड़ सकते हैं। भारत ने अपने लोगों को निकालने का काम शुरू कर दिया है लेकिन स्थिति और बिगड़ी तो यह बड़ा संकट होगा।

भारत की विदेश नीति परंपरागत रूप से संतुलन, संवाद और बहुपक्षीय सहयोग पर आधारित रही है। भारत को अपनी इसी पहचान को और मजबूत करना होगा। एक ओर भारत के अमरीका, यूरोप और खाड़ी देशों से रणनीतिक संबंध हैं, तो दूसरी ओर ईरान के साथ ऊर्जा, चाबहार बंदरगाह और ऐतिहासिक सांस्कृतिक जुड़ाव भी महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में तनाव कम करने और वार्ता की दिशा में प्रयास करना भारत के दीर्घकालिक हित में होगा। इसके साथ ही भारत को संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर युद्धविराम, मानवीय गलियारे और कूटनीतिक समाधान की वकालत करनी चाहिए।