
गिरीश्वर मिश्र
प्रख्यात मनोविद, विचारक और महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा के पूर्व कुलपति
योग शब्द को सुनते ही मन में कई छवियां उभरने लगती हैं। वे योगी भी याद आते हैं जो त्यागी-संन्यासी का जीवन जीते गुफा या कन्दरा में रह कर अध्यात्म की साधना करते हैं। आसन, प्राणायाम और ध्यान जैसे शब्द याद आने लगते हैं। नए दौर में अब योग के साथ एक नया अर्थ भी जुड़ गया है। उसे जीवन-शैली के रूप में देखा जा रहा है। सच कहें तो योग आत्म-परिष्कार या अपने को उदात्त मार्ग पर ले चलने की पद्धति है। इस अर्थ में योग ऐसी प्रक्रिया है जो शरीर और मन दोनों को प्रभावित करती है। यह शोध से प्रमाणित है कि योग के अनुशासन में रहने और जीने वाला व्यक्ति शरीर से चुस्त, भावनात्मक रूप से स्थिर और बौद्धिक रूप से तीक्ष्ण होता है।
आत्म-परिष्कार यानी खुद में सुधार लाना सुनने में बड़ा सरल लगता है पर वास्तव इसके लिए लगन और सतत अभ्यास की जरूरत पड़ती है। यह कुछ कठिन और श्रमसाध्य प्रक्रिया है। साथ ही सच यह भी है कि आत्म-परिष्कार की कोई सीमा भी तय नहीं की जा सकती क्योंकि वह जीवनपर्यंत चलने वाली प्रक्रिया है। हम सब लोग अच्छी तरह जीना चाहते हैं। क्रोध, असहायता और कुंठा होने पर व्यथा होती है। मानव जीवन जटिल है और हम सब अनेक अंतर्विरोधों के बीच जीवन जीते हैं। तमाम किस्म की निजी और सामुदायिक जरूरतों को पूरा करते हुए अपनी नाव खेनी होती है।
सच कहें तो अनंत स्वप्न के साथ सीमित भौतिक यथार्थ के बीच हमें जीना होता है। ऐसे में कुशलता और चेतना के साथ जीते हुए जीवन समृद्ध और पूर्ण हो सकता है। योग-विज्ञान इस कार्य में बड़ा सहायक होता है। मन और शरीर के संकुल में उन्नयन को गति देने के लिए योग-विज्ञान कुछ तकनीकों का उपयोग करता है। आसन, प्राणायाम और ध्यान वस्तुत: ऐसी ही तकनीकें हैं। इसमें उचित आहार, विहार, निद्रा और चेष्टा (व्यवहार) आदि भी सहयोगी साबित होते हैं। इन सबको मिला कर योग की 'शारीरिक संस्कृति' बनती है। इसी तरह त्याग या संन्यास इस अर्थ में आत्म-परिष्कार में सहायक होते हैं कि उनसे राह में आने वाले तरह-तरह के अंतराय या व्यवधान और विघ्न-बाधाएं दूर हो जाती हैं। इसीलिए सिद्ध, योगी, संत और महात्मा दूर-दराज के निर्जन स्थलों पर रहना पसंद करते हैं। संसार से विरत हो कर आत्मोत्कर्ष वाला यह रास्ता निश्चय ही हर किसी के लिए सुगम और सहज नहीं हो सकता। अधिकांश लोगों के लिए जीवन में मोह-ममता को नियंत्रित करने या विवेकसम्मत अनासक्ति का भाव अपनाना ही ठीक होता है।
योग आत्म-उन्नयन की अनोखी विधा है जिसे शारीरिक, भावनात्मक और मानसिक कई दृष्टियों से देखा जा सकता है। शारीरिक पक्ष पर ध्यान हठ योग में अधिक दिया जाता है जिसका विवरण हठयोग प्रदीपिका और घेरंड संहिता आदि ग्रंथों में विस्तार से मिलता है। इसमें आसन और प्राणायाम पर विशेष बल दिया जाता है। आजकल आम जनों का ध्यान शारीरिक स्वास्थ्य पर अधिक जाता है। इसलिए हठ योग अधिक लोकप्रिय हो रहा है। इसमें दक्षता बड़े अभ्यास से आती है। इससे दीर्घ जीवन और शक्ति की प्राप्ति तो होती है, इसके साधक चमत्कारी कार्य भी कर पाते हैं। आसनों में स्थिरता का अभ्यास मन की चंचलता पर काबू पाने में सहायक होता है। प्राण शक्ति को धारण करना और उसे शरीर के किसी भाग में भेजना भी लाभप्रद होता है। आसन और प्राणायाम के साथ साधक को शरीर की आंतरिक गतिविधि का पता भी चलता है और उनका नियंत्रण भी किया जाता है।
शरीर निश्चित रूप से मनुष्य के अस्तित्व को एक ठोस भौतिक आधार देता है। भौतिक आधार के बिना मन भी स्वतंत्र रूप से कोई कार्य नहीं कर सकता। चेतना की अभिव्यक्ति होने के लिए माध्यम जरूरी है और हमारा मस्तिष्क वही माध्यम या उपकरण है। इस जगत में सक्रिय होने के लिए शरीर एक उपकरण का कार्य करता है। यह शरीर दिव्य परमात्मा की भी अभिव्यक्ति है। इसलिए इस शरीर की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। इसे ऐसा रूप देना चाहिए ताकि इसमें दिव्य तत्व के उपकरण बनने की योग्यता आ सके।
Published on:
21 Jun 2024 05:29 pm
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