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नैतिक चेतना के प्रणेता थे आचार्य तुलसी

आचार्य तुलसी ने सन् 1949 में अणुव्रती संघ की स्थापना की।

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नैतिक चेतना के प्रणेता थे आचार्य तुलसी

नैतिक चेतना के प्रणेता थे आचार्य तुलसी

डॉ. सोहन लाल गांधी

'अन्य अनेक स्थानों के कुछ व्यक्तियों की तरह भारत में भी एक पतला, दुबला, सामान्य कद एवं तेज चमकीली आंखों वाला धार्मिक नेता विश्व की वर्तमान स्थिति से बहुत चिंतित है। 34 वर्ष की आयु वाले इस भारतीय संत का नाम तुलसी है, जो अहिंसा में विश्वास रखने वाले जैन सम्प्रदाय तेरापंथ के आचार्य हैं। आचार्य तुलसी ने सन् 1949 में अणुव्रती संघ की स्थापना की। जब वे समस्त भारतवासियों को नैतिक जीवन जीने की प्रतिज्ञाएं ग्रहण करवाने में सफल हो जाएंगे, तो वे विश्व के शेष भागों में रहने वाले व्यक्तियों को भी अणुव्रती जीवन जीने की प्रेरणा देंगे।'

ये पंक्तिया न्यूयार्क से प्रकाशित होने वाली पत्रिका 'टाइम' के 15 मई, 1950 के अंक में 'अणुव्रत और अणुबम' शीर्षक से उसके सम्पादक द्वारा लिखे गए एक अग्रलेख में से उद्धृत की गई हैं। यह सम्पादकीय टिप्पणी दिल्ली के चांदनी चौक स्थित नगर निगम के विशाल प्रांगण में एक असाधारण घटना से अनुप्रेरित थी। अणुव्रती संघ की स्थापना का प्रथम वार्षिक अधिवेशन हो रहा था। ऊंचे आसन पर युवक आचार्य तुलसी विराजमान थे। उस युवक आचार्य ने कहा, 'समाज में व्याप्त अनैतिकता, हिंसा एवं दुराचार से मेरा मन भारी एवं व्यथित हो उठा है। मैंने यह निश्चय कर लिया है कि आज से मैं अपना सम्पूर्ण जीवन समाज में व्याप्त अनैतिकता के विरुद्ध संघर्ष करने में व्यतीत करूंगा। मेरा एकमात्र लक्ष्य होगा अहिंसा एवं मानवीय एकता पर आधारित विश्व का निर्माण करना। यदि अणुबम में विश्व को नष्ट करने की राक्षसी शक्ति है, तो मैं कहना चाहूंगा कि उसका प्रतिरूप हमें अणुव्रत में मिलेगा, जो अणुबम के निहित खतरे से मानव जाति को बचाने में सक्षम है।'

इन शब्दों का लोगों पर जादुई प्रभाव पड़ा। 600 से अधिक श्रावकों ने अणुव्रत प्रतिज्ञा ग्रहण की। इनमें अधिकतर व्यापारी एवं उद्योगपति थे। उन्होंने कालाबाजारी, रिश्वत, शोषण, साम्प्रदायिकता, हिंसा, मिलावट आदि बुराइयों से एक निश्चित सीमा तक दूर रहने के लिए व्रत ग्रहण किए। यह कोई साधारण घटना नहीं थी। देश-विदेश के दैनिक पत्रों ने प्रमुखता से मुखपृष्ठ पर इस घटना से जुड़े समाचार प्रकाशित किए। तब से लेकर अब तक अणुव्रत आन्दोलन ने एक विशाल वट वृक्ष का रूप धारण कर लिया है। इसकी शाखाएं दूर-दूर तक फैल गई हैं। हजारों-हजारों लोगों ने अणुव्रत के आलोक में नया जीवन प्रारंभ कर अनन्त शान्ति की अनुभूति की है।