
Naga Sadhu
सिंहस्थ महाकुंभ में कुछ ऐसी बातें देखने को मिलती हैं जो और कहीं नहीं मिलती। इसी कुंभ के दौरान ही नागा साधुओं की दीक्षा दी जाती है। आइए जानते हैं नागा साधुओं से जुड़ी विचित्र जानकारियों के बारे में जो आम लोग नहीं जानते हैं।
ऐसे बनते हैं नागा साधु
किसी भी व्यक्ति को नागा साधु बनने के लिए 12 वर्ष तक का कठोर तप करना होता है। सबसे पहले तो उन्हें नागा पंथ में शामिल होने में ही छह वर्ष लग जाते हैं। इस दौरान नए साधु एक लंगोट के अलावा कुछ नहीं पहनते। कुंभ मेले में दीक्षा लेने के बाद ये लंगोट भी त्याग देते हैं और आजीवन दिगम्बर रहने का प्रण लेते हैं।
ऐसे होती हैं शिक्षा-दीक्षा
नागा साधुओं को सबसे पहले ब्रह्मचारी बनने की शिक्षा दी जाती है। तत्पश्चात महापुरुष दीक्षा होती है जिसके बाद खुद के यज्ञोपवीत तथा पिंडदान करना होता है। सबसे अंतिम परीक्षा दिगम्बर और श्रीदिगम्बर की होती है। श्रीदिगम्बर बनने के पहले नागा साधुओं का इन्द्रीय भंग कर दिया जाता है। इस तरह 12 वर्षों तक की कठिन तपस्या के बाद ही वो नागा साधु बन पाते हैं।
नागा साधु बनने के बाद साधु अखाड़े के आश्रमों तथा मंदिरों में रहते हैं। कुछ अपने गुरु की आज्ञानुसार हिमालय या घने जंगलों में तपस्या करने चले जाते हैं। इन्हीं में से कुछ को किसी गांव या शहर में आश्रम बनाकर रहने और संसार का कल्याण करने की आज्ञा दी जाती है जिसे वो अंतिम समय तक निभाते हैं।
ऐसी होती है नागाओं की दिनचर्या
नागा साधु सुबह सूर्योदय के पहले ही बिस्तर से उठ जाते हैं और नित्य कर्म से निवृत होकर श्रृंगार करते हैं। इसके बाद हवन, ध्यान, बज्रोली, प्राणायाम, कपाल क्रिया व नौली क्रिया करते हैं। दिन भर ये अपनी तपस्या में ध्यानमग्न रहते हैं। पूरे दिन में एक बार शाम को भोजन करने के बाद ये फिर से बिस्तर पर चले जाते हैं।
ऐसे मिलती है पदवियां
नागा साधुओं में भी आम समाज की भांति उपाधियां तथा पद होते हैं। इलाहाबाद के कुंभ में उपाधि पाने वाले साधु को नागा साधु कहा जाता है, उज्जैन में दीक्षा लेने वाले साधुओं को खूनी नागा, हरिद्वार में दीक्षा लेने वाले साधुओं को बर्फानी नागा तथा नासिक के कुंभ में दीक्षा लेने वाले साधुओं को खिचड़िया नागा कहा जाता है। दीक्षा लेने के बाद नागाओं की योग्यता के आधार पर उन्हें पद भी दिए जाते हैं।
Published on:
28 Apr 2016 06:35 pm
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