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पहली बार ऐसा हुआ है जब पाकिस्तान स्थित लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंककारी गुटों का नाम ब्रिक्स घोषणा पत्र में शामिल किया गया।
ब्रिक्स देशों के नौवें शिखर सम्मेलन में भारत को बड़ी कूटनीतिक सफलता हासिल हुई है। पहली बार ऐसा हुआ है जब पाकिस्तान स्थित लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंककारी गुटों का नाम ब्रिक्स घोषणा पत्र में शामिल किया गया। इतना ही नहीं, ब्रिक्स के सभी सदस्य देशों ने आतंकवाद के विभिन्न स्वरूपों की कड़ी निंदा करते हुए आतंकियों, उनके पोषकों और समर्थकों को आतंकी घटना के लिए बराबर जिम्मेदार मानने की बात कही है। इस सम्मेलन की खास बात यह रही कि संरक्षणवाद के मुख्य मुद्दे से इतर सम्मेलन का घोषणा पत्र पूरी तरह आतंकवाद के खात्मे पर केन्द्रित रहा।
डोकलाम सीमा विवाद में चीन के खिलाफ कूटनीतिक जीत के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत की यह एक और बड़ी सफलता मानी जा रही है। क्योंकि अभी तक चीन के रवैये के कारण जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर जैसे आतंकियों को संयुक्त राष्ट्र की आतंकी सूची में शामिल करवाने में भारत सफल नहीं हो पा रहा था। लेकिन अब चूंकि चीन ने भी ब्रिक्स घोषणा पत्र जैसे महत्वपूर्ण दस्तावेज में जैश-ए-मोहम्मद, लश्कर-ए-तैयबा, तहरीक-ए-तालीबान पाकिस्तान (टीटीपी) और हिज्ब-उल-तहरीर (पाकिस्तान में स्थित गुट) सहित तालीबान, आईएसआईएस, अलकायदा, पूर्वी तुर्किस्तान और उज्बेकिस्तान के इस्लामिक आन्दोलन तथा हक्कानी नेटवर्क को क्षेत्र में आतंकवाद के लिए जिम्मेदार ठहराया है।
सम्मेलन में नरेन्द्र मोदी ने आतंकवाद के मुद्दे को मजबूती से उठाया। सदस्य देशों के नेताओं ने इसका समर्थन किया। अब भारत को इस अभियान को अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर और तेज करना होगा ताकि मसूद अजहर और पाकिस्तान में बैठे आतंक के पोषकों पर कार्रवाई हो सके। इस घोषणा पत्र पर चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की सहमति तो है लेकिन भीतर ही भीतर चीन भारत की इस सफलता को पचा नहीं पा रहा होगा। क्योंकि संयुक्त राष्ट्र में मसूद अजहर मुद्दे पर वही अडंग़ा लगाता रहा है। लेकिन अब वह इस मुद्दे पर विरोध नहीं कर पाएगा। आतंकवाद पर नकेल से जहां ब्रिक्स देशों में आपसी आर्थिक और व्यापारिक सम्बन्ध मजबूत होंगे, क्षेत्र में शान्ति भी स्थापित होगी। बस हमें अपना अभियान पुरजोर जारी रखते हुए चीन पर दवाब कायम रखना होगा।
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