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लैंडलाइन टेलीफोन से मोबाइल तक का रोमांचक सफर

जिस समाज में अधिकतर परिवारों के पास अपना फोन नहीं हुआ करता था और जाने-माने कलाकार-कवि भी पीपी नंबर देकर काम चलाया करते थे, उसी समाज में अब किशोरों तक के पास दो-दो नंबर हुआ करते हैं।

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Patrika Desk

May 17, 2023

लैंडलाइन टेलीफोन से मोबाइल तक का रोमांचक सफर

लैंडलाइन टेलीफोन से मोबाइल तक का रोमांचक सफर

अतुल कनक
लेखक और साहित्यकार

भारत में संचार क्रांति की शुरुआत 1850-1851 से मानी जा सकती है, जब कोलकाता और डायमंड हार्बर के बीच पहली टेलीग्राफ लाइन डाली गई थी। टेलीग्राफ का अमरीका के मोर्स नामक वैज्ञानिक ने 1837 में आविष्कार किया था और देखते ही देखते यह तकनीक दुनिया भर में फैल गई। टेलीफोन का आविष्कार ग्राहम बेल ने 1875 में किया था। तब ग्राहम बेल ने कब सोचा था कि उसका यह आविष्कार देखते ही देखते जीवन की शक्ल ही बदल देगा। खासकर मोबाइल के आविष्कार के बाद तो टेलीफोन हर आदमी की बड़ी जरूरत बन गया है। दूरसंचार के क्षेत्र में निजी क्षेत्र की कंपनियों की प्रतिस्पर्धा ने तो जैसे ग्राहकों की बल्ले-बल्ले कर दी है। लेकिन, क्या आप इस बात पर विश्वास करेंगे कि सन 1880 में जब दि ओरिएंटल कंपनी लिमिटेड और एंग्लो इंडियन टेलीफोन कंपनी ने भारत में अपना दूरसंचार नेटवर्क प्रारंभ करने के लिए आवेदन किया था तो उनके आवेदन को इस आधार पर रद्द कर दिया गया था कि यह क्षेत्र सिर्फ सरकार के एकाधिकार का है।
कुछ दशक पहले तक टेलीफोन पर बात करना कितना आह्लादकारी होता था, इसे पिछले जमाने के एक लोकप्रिय गीत को सुनकर जाना जा सकता है। सन 1949 में बनी पतंगा फिल्म में नायिका निगार सुल्ताना खुशी के मारे गाती है, 'मेरे पिया गए रंगून, वहां से किया है टेलीफून/ तुम्हारी याद आती है।Ó 1966 में बनी फिल्म प्यार मोहब्बत में नायिका सायरा बानो नायक देव आनंद को फोन करती है, लेकिन किसी कारणवश फोन पर बात नहीं हो पाती। इसके बाद नायक फोन करके गाना गाता है, ' हैलो-हैलो, सुन-सुन।Ó तलत महमूद का गाया प्रसिद्ध गाना, 'जलते हैं जिसके लिए, मेरी यादों के दियेÓ भी टेलीफोन पर ही नायक अपनी नायिका को सुनाता है। दरअसल, साठ के दशक के अंतिम दौर में टेलीफोन का इतना क्रेज हुआ करता था कि निर्माता किसी न किसी बहाने टेलीफोन पर बात करने के दृश्य अपनी फिल्मों में फिल्माना चाहते थे। फिल्म में टेलीफोन की घंटी अनिवार्य सी हो गई थी। यह बात अलग है कि अब इसने मोबाइल का रूप ले लिया है। मोबाइल जीवन का हिस्सा ही बन गया है। इसके बिना लोग अपने आपको अधूरा सा समझते हैं।
आज मोबाइल झोंपड़-पट्टी और छोटे-मोटे काम करने वालों तक पहुंच गया है। आज से तीस- पैंतीस साल पहले तक किसी घर में लैंडलाइन फोन होना भी एक स्टेटस सिंबल हुआ करता था। टेलीफोन की सुविधा सबके पास नहीं हुआ करती थी। खासकर, मध्यमवर्गीय बस्तियों में जिसके घर में टेलीफोन होता था, उसका रुतबा भी अलग होता था। लोग उसका फोन नंबर पी.पी. के रूप में अपने विजिटिंग कार्ड तक पर छपवाया करते थे। तब से लेकर अब तक दूरसंचार व्यवस्था में बहुत परिवर्तन आ गया है। जब एसटीडी यानी सब्सक्राइबर ट्रंक डायलिंग की शुरुआत हुई, तो जगह-जगह पीसीओ खुल गए। लोगों के लिए अपने प्रियजनों से बात करना आसान हो गया। लगभग उसी दौर में संदेशों के संप्रेषण के लिए पेजर आया था, लेकिन वह जितनी तेजी से आया, उतनी ही तेजी से प्रचलन से बाहर भी हो गया।
अस्सी के दशक तक अखबारों के दफ्तर टेलीप्रिंटर की आवाज से गूंजा करते थे। टेलीप्रिंटर पर महत्त्वपूर्ण खबरें उसी तरह फ्लैश के रूप में आती थीं, जिस तरह से आजकल टीवी चैनलों पर ब्रेकिंग न्यूज आया करती है। संचार क्रांति ने टेलीप्रिंटरों का भी पाश्र्व में धकेल दिया। सबसे बड़ी क्रांति हुई मोबाइल फोन आने के बाद हुई। जिस समाज में अधिकतर परिवारों के पास अपना फोन नहीं हुआ करता था और जाने-माने कलाकार-कवि भी पीपी नंबर देकर काम चलाया करते थे, उसी समाज में अब किशोरों तक के पास दो-दो नंबर हुआ करते हैं। सोशल मीडिया संचार क्रांति का नया पहरूआ हो गया है। भारत विश्व में दूरसंचार सेवाओं के सबसे बड़े उपयोगकर्ताओं में एक है। इस दौर में अधेड़ होती पीढ़ी ने दूरसंचार के क्षेत्र में बहुत बदलाव देखे हैं। कृत्रिम मेधा (एआइ)के दौर में ये बदलाव और व्यापक हो सकते हैं।