
आपकी बात, क्या जिताऊ उम्मीदवार के चक्कर में पार्टियां लोकतंत्र को नुकसान पहुंचा रही हैं?
लोकतंत्र का अपमान
आजकल सत्ता पाने का लोभ इस कदर बढ गया है कि राजनीतिक दल जिताऊ उम्मीदवार के अंधे लोभ के कारण उसकी दागी पृष्ठभूमि और चारित्रिक दागों को भी नजरअंदाज कर देते हैं। इस तरह ये दल लोकतंत्र का खुला अपमान करते हैं। -ओमप्रकाश श्रीवास्तव, उदयपुरा, मध्यप्रदेश
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लोकतंत्र बना मजाक
जिताऊ उम्मीदवार के चक्कर में राजनीतिक दल लोकतंत्र का मजाक उड़ा रहे हैं। जिताऊ उम्मीदवार तो एक बहाना है। हकीकत यह है कि पार्टियां यह देखकर उम्मीदवार खड़े करती हंै कि कौन कितना देश को लूट कर अपना व पार्टी का घर भर सकता है। लाल बहाुदर शास्त्री, जयप्रकाश नारायण जैसे लोग राजनीति में आने चाहिए, तभी लोकतंत्र बच सकता है।
-सुनील कुमार माथुर, जोधपुर
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जिताऊ उम्मीदवार ही आधार
टिकट के लिए जिताऊ उम्मीदवार होना सबसे प्रमुख आधार है। इसके लिए पार्टी के आंतरिक सर्वे और नेताओं के फीडबैक से मिलान कराया जाता है। जिन विधायकों की स्थिति खराब होती है उनका टिकट काटने से पार्टी पीछे नहीं हटती है लेकिन इसका असर लोकतंत्र पर पड़ता है। जनता की भावनाएं , आकांक्षाएं एवं विश्वास जिन उम्मीदवारों से जुड़ा होता है कई बार पार्टी ऐसे लोगों को कमजोर उम्मीदवार समझकर चुनाव से बाहर कर देती हैं।
-सतीश उपाध्याय, मनेंद्रगढ़, छत्तीसगढ़
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जीतना ही लक्ष्य
राजनीतिक पार्टियों चुनाव में सीट निकालने वाले उम्मीदवार को ही खड़ा करती है। इस चक्कर में अच्छे उम्मीदवारों को दरकिनार कर दिया जाता है। वर्तमान दौर में येन केन प्रकारेण चुनाव में जीत हासिल करना ही पार्टियों का एकमात्र लक्ष्य है। इसके लिए साम, दाम, दंड, भेद जैसी सभी नीतियों में उम्मीदवार का पारंगत होना अनिवार्य है। अनुचित तरीकों से हासिल की गई जीत निश्चित ही लोकतंत्र को नुकसान पहुंचाती है। लोकतंत्र की मूल भावना इससे आहत होती है।
-ललित महालकरी, इंदौर
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दूरगामी नुकसान
लोकतन्त्र के सिद्धांतों के साथ खिलवाड़ करने से अल्पकालिक लाभ मिल सकते हैं किन्तु दूरगामी नुकसान भयंकर होते हैं, जिनसे आम जनता भी त्रस्त होती है। उम्मीदवार तो नैतिक रूप से मजबूत व्यक्ति को ही बनाया जाना चाहिए।
-मुकेश भटनागर, भिलाई
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जीत ही लक्ष्य
किसी भी पार्टी की चुनाव में जीत बहुत मायने रखती हैं। इसी जीत की खातिर, पार्टियां ऐसे जिताऊ उम्मीदवारों को चुनाव मे खड़ा करने लगी हैं जिन्हें लोकतंत्र की परिभाषा तक नहीं मालूम है। धनबल और बाहुबल के जोर से चुनाव जीतने वाले ये उम्मीदवार या तो आपराधिक प्रवृत्ति वाले होते हैं या फिर उनकी नीयत राजनीति में आ कर पैसा बनाने की होती हैं।
-नरेश कानूनगो, देवास, मध्यप्रदेश
Published on:
18 Oct 2023 05:33 pm
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