
डॉ. राजेश कुमार व्यास
संस्कृतिकर्मी, कवि और कला समीक्षक
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बंगाल कलाओं की उर्वर भूमि है। यहीं से ब्रिटिश राज में भारतीय कला की आधुनिक दृष्टि ‘बंगाल स्कूल ऑफ आर्ट’ का प्रसार हुआ। अवनीन्द्रनाथ ठाकुर इसके प्रवर्तक थे। ‘अबन ठाकुर’ के रूप में उनका बाल साहित्य भी तो बंग्ला साहित्य की अनुपम धरोहर है! उनकी कलाकृतियों में बरते रंगों में भी सदा किसी मासूम बच्चे की सी खिलखिलाहट अनुभूत की है। यह महज संयोग ही नहीं है कि यही खिलखिलाहट अमूर्तन में कला की इस दौर की भाषा रचने वाले गणेश हालोई के चित्रों में भी है। वह भी बंगाल के ही हैं।
कुछ समय पहले कोलकाता जाना हुआ तो उनके निवास स्थान जाने का भी संयोग हुआ। प्रयाग शुक्ल और कलाकार यूसुफ के संग उनसे बतियाना हुआ। लगा किसी संत से भेंट हो रही है। सहज, शांत और निश्छल व्यक्तित्व! उनकी कलाकृतियों में भी यही सब समाया है। कला की परिपक्वता पर दृश्य का अनूठा अबोधपन! अमूर्तता पर उसको समझने की जटिलता नहीं। सीधी, वक्र, लहरदार रेखाएं पर उनमें समाई अनूठी लय। जितना दृश्य का मनोरम वहां है, उतना ही अदृश्य की एकरसता भंग करने वाली साधना भी।
गणेश हालोई न्यूनतम रेखाओं में छवियों का आकाश रचते हैं। वह कहते भी हैं, ‘अमूर्ततता ही सुंदर होती है। वास्तविकता दम घोंटने वाली होती है।’ सत्तर के दशक में उन्होंने ‘मेटास्केप’ चित्र शृंखला सिरजी थी। मुझे लगता है यह यथार्थ से बिम्ब, प्रतीकों और भावों की ओर उनका कला-प्रस्थान था। कभी उन्होंने अजंता में रहकर भित्तिचित्रों की प्रतिकृतियां बनाई थीं। उनके सिरजे में भारतीय कला की सुगंध तो है पर उसका अनुकरण नहीं। सूफियाना फक्कड़पन वहां है। कैनवस और कागज पर उन्होंने धान के खेत, घास के मैदान, रहस्यमय नदियां, पहाड़, गुफाएं और जीवन से जुड़ी कहानियां सिरजी हैं। बंग्ला कवि जीवनानंद दास की कविताओं के तत्वों को भी उन्होंने अपनी कलाकृतियों में जीवंत किया है। बंगाल की भूमि और जलवायु को रंगों की सतहों संग क्षणभंगुर ब्योरों में उन्होंने सहज ही कैनवस पर उकेरा है। वह कहते हैं, ‘चित्रकला समझ से प्रारंभ होती है और आश्चर्य पर समाप्त होती है।’ उनकी कलाकृतियों का सच यही है।
अपनी कलाकृतियां दिखाते, कविताएं सुनाते कोई दिखावा, प्रदर्शन नहीं। मैं अपने को रोक नहीं पाता और वहीं किताबों के पास पड़ा एक आमंत्रण पत्र उठाकर ऑटोग्राफ देने के आग्रह के साथ उन्हें सौंप दिया। निश्छल मुस्कान संग वह पैन से कुछ बनाने लगते हैं। तीन छोटी खड़ी रेखाएं, उनसे निकली कुछ टहनियां-सी, जल का आभास कराती लहरदार रेखाएं, टेढ़ी और उन्हें क्रॉस करती और दो रेखाएं — पक्षी का अहसास कराती एक आकृति और किनारे टापू-सा कुछ! ठीक से वर्णित नहीं कर सकते कि क्या बना है पर मनोरम। वह हस्ताक्षर करते हैं और मेरा नाम लिखकर सौंप देते हैं। अनुभूत करता हूं, गणेश हालोई दृश्य के पार जाते हैं। अंतर्मन उजास में अनुभूतियों का विरल रचते हैं। प्रकृति की लय का जैसे सांगीतिक छंद। हरे, नीले, पीले और धूसर में उन्होंने संवेदनाओं का उजास उकेरा है। रोशनी और अंधेरे पर स्पेस का अद्भुत विभाजन! भले ही उनके चित्र अमूर्त हैं, पर वहां दृश्य की सुगंध इस कदर समाई है कि बार-बार रिझाती वह अपने पास बुलाती है।
Published on:
25 Aug 2024 09:13 pm
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