
arun kamal, poet
विनय उपाध्याय
यह वह समय है/जब शेष हो चुका है पुराना/और नया आने को शेष है.. अवसाद और उम्मीद के बीच नई जगह की तलाश करती यह कविताई पुकार अरुण कमल की है। शब्द की परंपरा में जीवन और मनुष्य की पवित्र गंध के पास ले जाते हिंदी के इस अग्रणी कवि को अगर समग्रता में देखना हो तो 'पूर्वग्रह' के इस नए अंक में यह संभव है। भारत भवन (भोपाल) से प्रकाशित साहित्य और कलाओं की आलोचना त्रैमासिकी ने चार सौ पन्नों का यह विशेषांक तब शाया किया है, जब आपदा और हताशा की मारी दुनिया में साहित्य का परिसर भी सन्नाटा फांक रहा है। अनचाही खामोशियों के बीच यह सुसम्पादित अंक अरुण की कविता के खिलते हुए कमल की पांखुरियों से झरता जीवन का गहन विश्वास है। पैंतीस से भी ज्यादा कवि-आलोचकों ने अरुण कमल के कृति-व्यक्तित्व को यहां नजर भर आंका है। निश्चय ही सभ्यता की एक लम्बी अवधि में कविता की अहमियत रही है और अरुण कमल साहित्य की आकाश गंगा के वे सितारे रहे हैं, जिन्होंने तमाम दुश्वारियों के बीहड़ से गुजरते जीवन के प्रति कामनाओं को हमेशा बचा कर रखा- 'मैं जब उठूं तो भादो हो/ पूरा चन्द्रमा उगा हो ताड़ के फल सा/गंगा भरी हो धरती के बराबर/ खेत धान से धधाये/और हवा में तीज-त्योहारों की गमक/इतना भरा हो संसार कि जब मैं उठूं/तो चींटी भर जगह भी खाली न हो।
सम्पादक प्रेमशंकर शुक्ल से अरुण का लंबा संवाद इस अंक की उपलब्धि है, जहां सलीके से पूछे गए जिज्ञासा भरे सवालों के जवाब एक लेखक के अध्ययन, आचरण, संस्कार और जीवन-दृष्टि से वाबस्ता होने का अवकाश देते हैं। यहां एक सिरे पर अरुण कमल खूबसूरत बात कहते हैं-'जिनके पास ताकत है, वे सुन्दर नहीं हो सकते...न ही सौंदर्य की सृष्टि वे कर सकते हैं। पूंजीवाद ताकत और हिंसा को महामंडित करता है, जबकि साहित्य के नायक सबसे कमजोर लोग हुए जिनकी आत्मा पवित्र थी और मूल्य महान। निर्बल लोगों की आत्मा में मनुष्यता और अच्छाई बची है, जो संसार बचाएगी।' साहित्य अकादमी, दिल्ली के प्रतिष्ठा सम्मान से विभूषित अरुण कमल सत्तर के बाद उभरे हिंदी के बहुचर्चित कवि हैं। बिहार उनकी सरजमीं है। अपने जनपद की सरहदों से बहुत दूर तक उनके लिखे-कहे का मान रहा है। 'पूर्वग्रह' का यह अंक इस बात की तस्दीक भी करता है। दरअसल, किसी विचारधारा के कपाटों में कुंद होकर शब्द-क्रीड़ा न करते हुए कमल अर्थ की सघन छाया में जीवन से खुला संवाद करते हैं।
सम्पादकीय में प्रेमशंकर उचित ही कहते हैं कि अरुण कमल का कवि अपनी इच्छा-आकांक्षा में जीवन ही जीवन चाहता है। जीवन से बाहर उसको कुछ भी स्वीकार या मंजूर नहीं है। विराग, विचलन और विपदाओं के इस दौर में अरुण कमल की कविता जीवन का सविनय उद्घोष है। उन्हें फिर से पढ़ा जाना चाहिए। मुसलसल पढ़ा जाना चाहिए, ताकि जिंदगी के मानी और गहरे उतर सकें। वे फरमाते हैं-'अपना क्या है इस जीवन में सब तो लिया उधार, सारा लोहा उनका, अपनी केवल धार।'
(लेखक कला साहित्य समीक्षक और टैगोर विश्वकला एवं संस्कृति केंद्र के निदेशक हैं)
Published on:
27 May 2021 08:12 am
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