अगस्ता हमारी पसंद तो नहीं थी...
एस. कृष्णासामी पूर्व वायुसेना प्रमुख
अगस्ता हेलिकॉप्टर खरीद मेंं हुई गड़बडिय़ां और भ्रष्टाचार बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। इसकी मौजूदा सरकार को पूरी जांच करनी चाहिए। मेरे कार्यकाल के दौरान इस तरह के हेलिकॉप्टर खरीद की प्रक्रिया चल रही थी। 12 साल पहले जब मेरा कार्यकाल खत्म हो रहा था, उस वक्त वीवीआईपी हेलिकॉप्टर खरीद के लिए टेंडरिंग की प्रक्रिया चल रही थी और 'सिंगल वेंडरÓ की स्थिति से बचने के लिए तकनीकी काम हो रहा था। वीवीआईपी हेलिकॉप्टर खरीदने के लिए पहले तय हुई उड़ान की ऊंचाई सीमा को कम किया गया। इस बीच मैं दिसंबर 2004 में सेवानिवृत्त हो गया था। उसके बाद दोबारा ऐसे हेलिकॉप्टर खरीदने के लिए प्रक्रिया शुरू हुई। अब गड़बड़ कहां हुई, इसके लिए फिलहाल अटकले ही लगाई जा रही हैं।
पीएमओ भी जवाबदेह
इसमें अहम बिंदू यह है कि वीवीआईपी के लिए ऐसे वाहनों की खरीद के लिए पीएमओ से सलाह-मशविरा किया जाता है। क्यूआर (क्वॉलिटेटिव रिक्वायरमेंट) के लिए पीएमओ से पूछा जाता है। वायुसेना इस वाहन के तकनीकी प्रदर्शन और सुरक्षा के लिहाज से जरूरी बिंदुओं को स्पष्ट करती है। मसलन कोई हेलिकॉप्टर कितना ऊंचा और कितनी दूर तक और कितने समय तक उड़ सकता है। ये सब पीएमओ से पूछा जाता है कि उनकी क्या जरूरते हैं, हेलिकॉप्टर का वजन क्या हो सकता है। किस तरह के हेलीपैड की जरूरत होगी, यह सब चर्चा एयरफोर्स और पीएमओ के बीच चर्चा चलती है।
छोटा हेलिकॉप्टर
अगस्तावैस्टलैंड खरीद में भी यही प्रक्रिया हुई, फिर उसे चुना गया। 2012 में तीन हेलिकॉप्टर भारत को मिल भी गए थे। पर मेरे कार्यकाल में हम छोटे हेलीकॉप्टर खरीद पर विचार कर रहे थे। हम रूसी और ब्रिटिश हेलिकॉप्टर की सोच रहे थे। मेरे वक्त में अगस्ता वेस्टलैंड के बारे में सोचा भी नहीं जा रहा था, क्योंकि यह बहुत बड़ा था। हमें भारत के हिसाब से छोटे हेलिकॉप्टर की दरकार थी। वीवीआईपी की जरूरतों के हिसाब से यह पर्याप्त था। हमने रूसी हेलिकॉप्टर का सुझाव दिया। उनका प्रदर्शन लंबी दूरी और ऊंचाई के लिए लिहाज से अच्छा रहा है।
विशेषज्ञता बढ़ी पर...
वैसे तो हमारी रक्षा खरीद के बारे में हरेक चीज पारदर्शी होती है। सब कुछ फाइल पर नोटिंग किया जाता है। पीएमओ, एयरफोर्स, आर्मी चीफ या रक्षा मंत्रालय में हर जगह अपनी-अपनी नोटिंग की जाती है। बिना इसके आगे कोई निर्णय लिया ही नहीं जाता है। बोफोर्स के वक्त मैं सेवा में था, उसकी खरीद में दलाली के आरोप लगे। खरीद प्रक्रिया सवालों के घेरे में थी। पर तब की तुलना में आज हमारी खरीद प्रक्रियाएं बहुत सुधर गई हैं। हर जगह काफी 'चैक एंड बैलेंसÓ हैं। तकनीकी विशेषज्ञता बढ़ गई है। फिर भी अगस्ता खरीद में हुई गड़बड़ शर्मनाक है। मुझे ज्यादा बड़ी बात यह नहीं लगती कि यह किसने की बल्कि यह गड़बड़ी अब भी कहां हो रही है, उसे बाहर लाने की जरूरत है। किसी पार्टी या सरकार तक सीमित रखने की बजाय सिस्टम के अंदर खामी को फोकस करने की जरूरत है।
दलाली वैध रास्ता नहीं
राजनीतिक तंत्र यह कहकर पल्ला नहीं झाड़ सकता है कि दलाली को वैध कर देने से समस्या का समाधान निकल जाएगा। मैं इससे सहमत नहीं हूं। भारतीय परिप्रेक्ष्य में यह मुफीद नहीं है। हमारा तंत्र इतना परिपक्व नहीं हुआ है। सवाल है कि जब भी कोई गड़बड़ी हो तो उन व्यक्तियों को निशाने पर लिया जाए। वे फौरन सलाखों के पीछे हों। जांच में ही बरसों नहीं गुजरने चाहिए। हमारी विजिलेंस को पुख्ता क्यों नहीं किया जा सकता।
खासतौर पर, रक्षा तंत्र का प्रदर्शन का काम तो अव्वल रहना चाहिए। रक्षा खरीद से जुड़ीं फाइलों की नियमित जांच होनी चाहिए। ऑडिट होते रहना चाहिए। अगर जब भी किसी फाइल में गड़बड़ नजर आए तो वहीं कार्रवाई हो। 10-10 साल का वक्त कार्रवाई में लग जाता है। अगर गड़बड़ है तो तथ्यों को सामने रखें और तुरंत कार्रवाई क्यों नहीं की जाती। इतने बड़े-बड़े आरोप लगते हैं पर कार्रवाई और सजा किसको हुई? सरकार वादा करे कि अगस्ता में हुए भ्रष्टाचार की फाइलें सार्वजनिक की जाएंगी। जो भी तकनीकी निर्णय अगस्ता वैस्टलैंड के लिए बदले गए वे बाहर आ जाएंगे।
आरोप लगे, नतीजा नहीं
पनडुब्बी घोटाला 1987
नेताओं और नौसेना अधिकारियों पर पनडुब्बी सौदे में 20 करोड़ रु. दलाली का आरोप लगा। पूर्व नौसेना प्रमुख एसएम नंदा पर आरोप लगे।
बराक मिसाइल 1996-97
1150 करोड़ रु. में इस्राइल से 11 मिसाइल खरीद पर आपत्ति उठी। समता पार्टी के आरके जैन की गिरफ्तारी हुई।
बोफोर्स घोटाला 1991
स्वीडन से 155 बोफोर्स तोपें खरीद का सौदा हुआ। 64 करोड़ रु. की दलाली के लेन-देन के आरोप लगे। पीएम राजीव गांधी पर आरोप लगे।
ताबूत घोटाला 1999
कारगिल युद्ध में शहीदों के लिए 500 ताबूत की खरीद हुई। तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडीस पर घोटाले के आरोप लगे। फिर क्लीन चिट मिली।
अगस्ता वेस्टलेंड सौदा
1999-2000 : वायुसेना ने तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस के बार-बार सियाचीन दौरे को ध्यान में रखते हुए ॅ18 हजार फीट तक उडऩे वाले वीवीआईपी हेलिकॉप्टर खरीद का प्रस्ताव दिया।
2003 : तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बृजेश मिश्रा ने उड़ान की ऊंचाई 18 हजार फीट से कम कर 15 हजार फीट की अनुशंसा की।
2006 : संशोधित जरूरत के बाद दोबारा प्रस्ताव आया। सिकोर स्काई और अगस्ता वैस्टलेंड में थी प्रतिस्पर्धा। अगस्ता ने लगाई सस्ती बोली।
2008-09 : अगस्ता से हेलिकॉप्टर खरीद पर कीमत को लेकर वार्ता का दौर शुरू।
2010 : अगस्ता कंपनी से वीवीआईपी हेलिकॉप्टर खरीद का सौदा हुआ मंजूर।
2012 : बारह हेलिकॉप्टर में से पहली किश्त के रूप में तीन हेलिकॉप्टर भारत को मिले।
2014 : भारत ने अगस्ता द्वारा हेलिकॉप्टर आपूर्ति के लिए दलाली देने के खुलासे के बाद सौदा किया रद्द।
यूं तो पिछड़ते जाएंगे हम
सेनि. एडमिरल सुरीश मेहता रक्षा विशेषज्ञ
ज ब भी रक्षा उपरकणों से संबंधित सौदों में दलाली की बात आती है तो स्वाभाविक तौर चिंता होती कि दलाली खाकर क्या देश की सुरक्षा के साथ समझौता कर लिया गया है? पूर्व में बोफोर्स तोप सौदे को लेकर भी कहा जाने लगा था कि यह तोप तकनीकी रूप से भारतीय जरूरतों के मुताबिक सक्षम नहीं है। करगिल युद्ध में इन तोपों को इस्तेमाल के बाद सच्चाई का पता लगा कि इन तोपों के इस्तेमाल के कारण ही हम बेहतर स्थिति में थे।
बरती जाती है सतर्कता
रक्षा उपकरण संबंधी सौदों में काफी सतर्कता बरती जाती है। कंपनी के लोग संबंधित लोगों से संपर्क करते हैं और भारतीय सेना की जरूरत के मुताबिक सामग्री की खरीद होती है। एक-एक सौदे में वर्षों लग जाते हैं। अब तो इतनी अधिक सावधानी बरती जाने लगी है कि सौदे को लेकर जरा सी भी हेराफेरी की अफवाह पर ही सौदे रद्द कर दिए जाते हैं और कंपनी को काली सूची में डाल दिया जाता है। अगस्ता वेस्टलैंड हेलिकॉप्टर से संबंधित समझौते में ऐसा ही हुआ। इसी तरह कई और भी कंपनियां हैं, जिन्हें भारत की ओर से काली सूची में डाल दिया गया।
मामूली सी बात पर रक्षा उपकरण तैयार करने वाली कंपनी को यदि काली सूची में डाल देने से हम हमारे दुश्मनों के मुकाबले तकनीकी तौर पर काफी पिछड़ते चले जाते हैं। कई बार रक्षा सौदों को लेकर केवल आरोप लगाए जाते हैं और बाद में पता लगता है कि इन आरोपों को साबित करना बेहद कठिन है। ऐसे में केवल आरोपों के आधार पर काली सूची में डाल दी गई कंपनी से हो सकने वाले बेहतर समझौते नहीं हो पाते। इस तरह कुल मिलाकर हानि देश की ही होती है।रक्षा उपकरण बेचने के लिए कंपनियों के बीच गलाकाट प्रतिस्पर्धा होती है। ऐसे में यदि किसी एक कंपनी के साथ सौदा होता है तो अन्य प्रतिस्पर्धी कंपनियां यह दिखाने की कोशिश करने लगती है कि सौदे में कुछ न कुछ हेराफेरी जरूर की गई है। इस तरह की अफवाहों पर खबरें भी बनती हैं और बाद में कुछ साबित नहीं हो पाता।
ऐसे होता है नुकसान
हमने जर्मनी से हमने टाइप-209 पनडुब्बियों का सौदा किया था। दो पनडुब्बियां सीधे ही भारत आनी थी। दो पनडुब्बियां टुकड़ों में भेजी जानी थीं ताकि उसकी तकनीक समझ में आ जाए और इस मामले के लिए प्रशिक्षण भी हो जाए। एक पनडुब्बी हमारे यहीं बनाई जानी थी। दो पनडुब्बियां भारत में आईं और फिर इस सौदे में गड़बड़ी की खबरें सामने आने लगीं। जो सीधे पर इस सौदे में शामिल थे, उनकी बदनामी हुई, सौदा रद्द हो गया। बाद में सौदे में कोई गड़बड़ी सामने भी नहीं आई। लेकिन, इस सारी परिस्थिति में हम पनडुब्बी बनाने की तकनीक के मामले में काफी पिछड़ गए। हमें यदि रक्षा सौदे करने हैं तो अन्य देशों की सरकारों के साथ सीधी बातचीत की जाए।
ऐसी खबरें तोड़ती हैं सेना का मनोबल
सी. उदय भास्कर रक्षा विशेषज्ञ
रक्षा सौदे और उससे घोटालों के जुड़ाव का हमारे देश में तो चोली-दामन का साथ हो गया है। यह कोई आज की बात नहीं, प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के समय से ये घोटाले चल रहे हैं। कभी जीप खरीद घोटाला तो कभी बोफोर्स घोटाला और कभी ताबूतों की खरीद में घोटाला। यानी देखा जाए तो हर पांचवे साल में कोई न कोई घोटाला रक्षा सौदों में सामने आता ही रहा है।
रक्षा सौदों में गड़बडिय़ों के कारण जो सबसे बड़ा नुकसान हो रहा है, वह यह है कि हमारी सेना का मनोबल कमजोर होने लगा है। सेना को आधुनिक उपकरणों व हथियारों से लैस करने की जरूरत है लेकिन जब कोई सौदा करने की बात आती है तो जिम्मेदार लोग हिचकिचाते हैं। राजनेता और नौकरशाह दोनों को कोई भी कदम उठाने के पहले दस बार सोचना पड़ता है। लेकिन, चिंता की बात यह है कि सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति के अलावा कभी किसी मामले में ठोस नतीजे सामने आए ही नहीं।
आरोपों की राजनीति
हमारे यहां यह माना जाता है कि सबसे ज्यादा काला धन रियल एस्टेट में लगा हुआ है। सब कुछ जानते हुए भी कोई इस काले धन की जड़ तक जाने की कोशिश नहीं करता। यही सब रक्षा सौदों के मामलों में भी हो रहा है। करगिल का युद्ध हो या 1962 का भारत-चीन युद्ध, हमारी सेना में आधुनिक उपकरणों की कमी का सवाल उठता आया है। फिर भी देश की सेना अपना फर्ज निभाती रही है।
रक्षा सौदों में गड़बडिय़ों के ऐसे मामलों पर चर्चा केवल टीवी चैनलों की रेटिंग के लिए तो कारगर हो सकती है लेकिन किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए ऐसे मामले कलंकित करने वाले हैं। हेलिकॉप्टर खरीद के जिस सौदे ने इन दिनों बवाल मचाया हुआ है, उसे समझने के लिए यह भी देखना जरूरी होगा कि हमारे यहां रक्षा सौदों की कछुआ चाल रहती है।
आज तक यह तय ही नहीं हो पा रहा कि इन सौदों मे रिश्वत का आरोप सही है अथवा नहीं। सवाल स्वाभाविक है कि तमाम सावधानी के बावजूद रक्षा सौदों में घोटाले होते क्यों हैं? सबसे बड़ी वजह यह है कि हमारा देश रक्षा तैयारियों के मामले में सुस्त ही रहा है। आजादी के छह दशक बीतने के बावजूद देश रक्षा सामग्री उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भर नहीं बन पाया है। केलकर से लेकर रामाराव और बाद में रवीन्द्र गुप्ता कमेटी ने रक्षा उपकरणों को लेकर जितनी भी सिफारिशें कीं, उन पर अमल ही नहीं हुआ।
बड़ा कारण यह है कि हमारे देश का सरकारी क्षेत्र, वह चाहे रक्षा अनुसंधान का हो या उत्पादन का, अपनी छाप नहीं छोड़ पाया है। हम दुनिया में हथियारों के सबसे बड़े खरीदार बन गए हैं। इसके बावजूद हमारे देश में कभी यह तैयारी की ही नहीं गई कि स्थानीय स्तर पर भी रक्षा उपकरणों का उत्पादन संभव है। हम न केवल औने- पौने दामों पर हथियार खरीद रहे हैं वरन उन रोजगारों से भी हाथ धो रहे हैं जो हमारे देश में रक्षा उपकरणों का उत्पादन होने पर इस देश के लोगों को मिलता।
दूसरों पर क्यों रहें निर्भर
रक्षा उपकरणों के सौदों में हमने सदैव विदेशी निजी कंपनियों की ओर ही रुख किया है। कभी इस दिशा में सोचा ही नहीं गया कि हमारे देश में भी हथियार व रक्षा उपकरण तैयार करने की संभावना हो सकती है। हमारे देश के निजी क्षेत्र को क्यों नहीं इस दिशा में प्रोत्साहित किया जाता। हम सबको बेईमान समझने लगते हैं। गड़बड़ी करने वाला तो सब जगह ही करेगा। उसके लिए नियम कायदे बनाने की जरूरत नहीं। विदेशी कंपनियों के भरोसे तो रक्षा मामले में आत्मनिर्भरता ख्वाब ही होगा।