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पुरस्कारों और नई पुस्तकों से इस वर्ष नजर आया उत्साह

उम्मीद की जानी चाहिए कि नए वर्ष में रचनात्मकता की यह यात्रा बदस्तूर जारी रहेगी। कलम रुकेगी नहीं, छापाखानों में यूं ही काम होता रहेगा, पाठकों का दुलार लेखकों और रचनाओं को मिलता रहेगा। साहित्य जगत में विमर्श और बहस के सिलसिले परवान चढ़ेंगे। राजनीति और समाज में वैमनस्यता का वातावरण समाप्त होगा, छपे शब्द की महत्ता अक्षुण्ण रहेगी।

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Patrika Desk

Jan 01, 2023

पुरस्कारों और नई पुस्तकों से इस वर्ष नजर आया उत्साह

पुरस्कारों और नई पुस्तकों से इस वर्ष नजर आया उत्साह


अतुल चतुर्वेदी
लेखक और साहित्यकार

वर्ष 2022 साहित्यिक हलचल की दृष्टि से कई महत्त्वपूर्ण संकेत और अर्थ छोड़ कर जा रहा है। वर्ष 2022 के जाते-जाते घोषित हुए साहित्य अकादमी पुरस्कार के लिए हिंदी भाषा के लिए पुरस्कृत कवि और विचारक बद्री नारायण के कविता संग्रह 'तुमड़ी के शब्द' को चुना गया। इस वर्ष की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि रही गीतांजलि श्री को उनके उपन्यास रेत समाधि के अनुवाद 'टूम ऑफ सैंड' पर बुकर पुरस्कार मिलना। यह प्रथम अवसर था, जब कोई बुकर पुरस्कार दक्षिण किसी एशियाई भाषा को मिला है। भारतीय लेखन की दृष्टि से यह इस बात की पुष्टि थी कि भारतीय भाषाओं का लेखन न केवल विश्वस्तरीय है, वरन् हमारे अनुवाद को भी नई उड़ान मिल रही है। साथ ही यह भी उम्मीद बंधती है कि भविष्य में भारतीय भाषाओं की अन्य कृतियां भी अनुवाद के माध्यम से विश्व साहित्यिक पटल पर आ सकेंगी।
इसी वर्ष साहित्य अकादमी पुरस्कार के तहत राजस्थानी भाषा के लिए बीकानेर के वरिष्ठ लेखक कमल रंगा को उनकी नाट्य कृति 'अलेखूं अंबा' के लिए पुरस्कार की घोषणा हुई। यह कृति महाभारत की पात्र अंबा को मूल में रखकर रची गई है। इस वर्ष ही साहित्य अकादमी का युवा पुरस्कार हिंदी भाषा के लिए 'प्रमेय' उपन्यास के लिए भगवंत अनमोल को दिए जाने की घोषणा की गई। यह उपन्यास आइटी की पढ़ाई कर रहे एक युवा और उसके दूसरे धर्म की लड़की से प्रेम की कहानी पर आधारित है। इस साल बुकर पुरस्कार विजेता अंतरराष्ट्रीय मशहूर लेखक सलमान रुश्दी पर जानलेवा हमला पेनसिलवेनिया के पास एक आयोजन में किया गया। 75 वर्षीय इस लेखक पर चाकू से कई वार किए गए, जिससे उनको एक आंख और एक हाथ गंवाना पड़ गया। कट्टरपंथ के जीवित रहते आज लेखक और पत्रकार सुरक्षित नहीं हंै, यह हमला इस बात का प्रमाण है। फिल्म निर्माण भी दिनोंदिन कठिन होता जा रहा है। हर ऐतिहासिक और सामाजिक सवाल खड़े करने वाली फिल्म निशाने पर है। मुहम्मद जुबैर और पुलित्जर पुरस्कार के लिए चयनित सना इरशाद मट्टूू के साथ व्यवहार को भी ध्यान में रखना होगा। सवाल यह है कि क्या लेखक अपने कत्र्तव्य से मुंह चुरा लें? वे लेखक और विचारक ही थे, जिन्होंने आजादी की लड़ाई से लेकर आज तक चुनौतियों को स्वीकार किया है और मुंह नहीं छुपाया है ।
इस वर्ष स्त्री विमर्श को केंद्र में रखकर हंस पत्रिका ने अत्यंत जरूरी और लीक से हटकर आयोजन किया। इस आयोजन में लगभग एक दर्जन सत्र स्त्री सृजनशीलता पर आयोजित किए गए, जिनमें कई लेखिकाओं ने सक्रिय भागीदारी निभाई। प्रत्येक सत्र में अधिकतर महिला रचनाकारों ने ही सहभागिता की। यह अनूठा आयोजन साहित्य की दुनिया में नई उम्मीद दिखाता है। इस साल साहित्य का नोबेल पुरस्कार फ्रेंच लेखिका एनी एर्नोक्स को मिला। उनका लेखन आत्मकथात्मक ही रहा है। वह इसे राजनीतिक काम भी मानती हैं। इसके अलावा उनकी अंग्रेजी में भी कई कृतियां आ चुकी हैं। इस वर्ष कोविड से मुक्ति के बाद देश भर में साहित्यिक आयोजनों का सिलसिला चलता रहा। कथादेश ने भी आयोजन किए और राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर ने भी लगातार जिला स्तरीय और आंचलिक साहित्यकार सम्मेलनों की शृंखला शुरू की और रचनात्मकता को नए आयाम देने की कोशिश की। उम्मीद की जानी चाहिए कि नए वर्ष में रचनात्मकता की यह यात्रा बदस्तूर जारी रहेगी। कलम रुकेगी नहीं, छापाखानों में यूं ही काम होता रहेगा, पाठकों का दुलार लेखकों और रचनाओं को मिलता रहेगा। साहित्य जगत में विमर्श और बहस के सिलसिले परवान चढ़ेंगे। राजनीति और समाज में वैमनस्यता का वातावरण समाप्त होगा, छपे शब्द की महत्ता अक्षुण्ण रहेगी।