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Azadi Ka Amrit Mahotsav : हमारे मन एक हों, सब साथ चलें

Azadi Ka Amrit Mahotsav : 75वां स्वतंत्रता दिवस 75th independence day 2021 एक पवित्र अवसर है। इस दिन 74 साल पहले हम विदेशी राज की परतंत्रता के सभी बंधनों से मुक्त हुए, स्वाधीन हुए। इसे हम अमृत महोत्सव के रूप में मना रहे हैं।

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Azadi Ka Amrit Mahotsav : हमारे मन एक हों, सब साथ चलें

Azadi Ka Amrit Mahotsav : हमारे मन एक हों, सब साथ चलें

राजेंद्र बोड़ा, वरिष्ठ पत्रकार

Azadi Ka Amrit Mahotsav : Independence Day 2021 : एक राष्ट्र के रूप में भारतवासियों के लिए 75वां स्वतंत्रता दिवस 75th independence day 2021 एक पवित्र अवसर है। इस दिन 74 साल पहले हम विदेशी राज की परतंत्रता के सभी बंधनों से मुक्त हुए, स्वाधीन हुए। इसे हम अमृत महोत्सव के रूप में मना रहे हैं। इस महोत्सव का विशेष महत्त्व है। आजादी के इन सात दशकों में जमाना बदल गया है। तीसरी पीढ़ी आ गई है। पहली पीढ़ी ने आजादी पाने की जद्दोजहद का जमाना खुद देखा था, भुगता था। दूसरी पीढ़ी ने उसे अपने बुजुर्गों से सुना, महसूस किया। परंतु वर्तमान तीसरी पीढ़ी को उसकी कोई सहज याद नहीं है। यह महोत्सव मौजूदा पीढ़ी को उन सपनों, आशाओं तथा अपेक्षाओं की याद दिलाएगा जिन्हें 'हम भारत के लोग' अपने दिलों में लिए हुए रहे थे। आर्थिक-सामाजिक गैर-बराबरी की धूल को पोंछ कर खुशहाल भारत के निर्माण का यज्ञ पूरा करने के लिए और तेजी से जुट जाने के लिए यह महोत्सव नया उत्साह भरेगा।

आजादी के बाद की तीसरी पीढ़ी देश को एक युवा राष्ट्र बनाती है। हमारी 65 प्रतिशत आबादी 35 साल से कम उम्र की है जो अकल्पनीय बदलाव लाने की क्षमता रखती है, यदि सबको गुणवत्ता वाली शिक्षा मिल जाए, सेहत ठीक रखने के इंतजाम हों और हाथों में हुनर दे दिया जाए। यह पीढ़ी तैयार होकर अर्थव्यवस्था में भागीदार बन जाए तो हमारे देश को दुनिया के शीर्ष पर पहुंचने से कोई नहीं रोक सकता। इसलिए यही वह समय है जब हम अपने पुरातन इतिहास वाले नए राष्ट्र के भविष्य के लिए लक्ष्य निर्धारित करें।

स्वाधीनता दिवस का अमृत महोत्सव यह अवसर देता है कि हम भविष्य पर निगाह रखते हुए देश की आजादी के संघर्ष के गौरवशाली इतिहास को भी याद रखें। अपनी कमजोरियों को जानें व उनका आकलन करें, मगर उनसे लज्जित न हों। आत्मसम्मान के साथ आगे बढ़ें। भारत के पास गर्व करने के लिए अथाह भंडार है, समृद्ध इतिहास है, चेतनामय सांस्कृतिक विरासत है जो हमें ऊंची उड़ान भरने के लिए शक्तिशाली पंख देती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गत मार्च माह में गुजरात के साबरमती आश्रम से स्वाधीनता के अमृत महोत्सव की शुरुआत करते हुए कहा था कि 'किसी राष्ट्र का गौरव तभी जाग्रत रहता है जब वो अपने स्वाभिमान और बलिदान की परम्पराओं को अगली पीढ़ी को भी सिखाता है, संस्कारित करता है, उन्हें इसके लिए निरंतर प्रेरित करता है।' इसीलिए यह आशा की जा सकती है कि यह महोत्सव नई पीढ़ी में लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति सम्मान पैदा करेगा और उनमें आजादी पाने के लिए दिए गए बलिदानों की स्मृति जगाते हुए समता तथा न्याय मूलक समाज की रचना की प्रेरणा देगा।

इस महोत्सव के दौरान लोकतांत्रिक व्यवस्था में नैतिकता के प्रतिमानों की याद भी आएगी और संविधान प्रदत्त अधिकारों के आग्रह के साथ हम में दायित्वों का बोध भी होगा। हम अपने और अपनों के संकुचित दायरे से बाहर निकल कर वृहद सामाजिक दायित्व को भी समझेंगे। अपने ही सच को सार्वभौमिक सच मानने के दुराग्रह से बचेंगे। यही सनातन मार्ग भी है। ऐसा करना कुछ चुनिंदा लोगों का काम नहीं है। यह हम सभी का दायित्व है। तेजी से बदल रही डिजिटल यंत्र तकनीक के दौर में इसकी और भी गहनता से आवश्यकता है। तभी हम तेजी से हो रहे जबरदस्त बदलाव के दौर में अपने पांव मजबूती से जमाए रख सकेंगे और ऋग्वेद के इस मंत्र का अनुसरण कर सकेंगे - 'ऊँ संगच्छध्वं संवदध्वंसं वो मनांसि जानताम्' अर्थात 'हम सब एक साथ चलें, आपस में संवाद करें, हमारे मन एक हों।'