सही मायने में आज के दौर में आम आदमी खाते-पीते, उठते-बैठते हुए भी मोबाइल पर नजर गड़ाए रहता है। वजह है विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर कुछ नया देखने की चाहत। बच्चों में यह चाहत लत का रूप लेेने लगी है।
सोशल मीडिया का जितना कम इस्तेमाल किया जाए उतना ही बेहतर है। बच्चों के मामलों में तो यह सुझाव अमल में लाना और भी जरूरी है। यही कारण है कि कर्नाटक हाईकोर्ट ने भी कहा है - सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने के लिए भी एक उम्र सीमा तय की जानी चाहिए। कोर्ट ने मौखिक टिप्पणी में यह भी कहा है कि यह सीमा कम से कम 21 वर्ष होनी चाहिए। कोर्ट की चिंता वाजिब भी है, क्योंकि आज के दौर में छोटे-छोटे बच्चों व किशोरों के हाथों में स्मार्टफोन आते जा रहे हैं। दुनिया भर में अभिभावक भी बच्चों को लग रही सोशल मीडिया की लत से परेशान हैं।
सही मायने में आज के दौर में आम आदमी खाते-पीते, उठते-बैठते हुए भी मोबाइल पर नजर गड़ाए रहता है। वजह है विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर कुछ नया देखने की चाहत। बच्चों में यह चाहत लत का रूप लेेने लगी है। बड़ी चिंता इस बात की है कि सोशल मीडिया के तमाम प्लेटफार्म इनके इस्तेेमाल को लेकर आयु सीमा को लेकर चुप ही हैं। जहां कहीं उम्र का बंधन है भी तो महज दिखावटी। क्योंकि उम्र के सत्यापन की पुख्ता व्यवस्था कहीं है ही नहीं। इसीलिए फेक जन्म तिथि अंकित पर सोशल मीडिया अकाउंट खूब बन रहे हैं। वैसे इंटरनेट की दुनिया में यह नहीं देखा जाता कि सोशल मीडिया पर उपयोगकर्ताओं की उम्र के आधार पर सामग्री परोसी जाए। न ही ऐसा करना संभव है। वहां तो जो कुछ उपलब्ध है वह सबके लिए है, भले ही उपयोगकर्ता बच्चे ही क्यों न हों। सोशल मीडिया के दुरुपयोग के खतरे अलग हैं। इनमें भी बच्चों को भागीदार बनाया जाने लगा तो समाज के लिए भी बड़ा खतरा बनते देर नहीं लगने वाली। मोबाइल के अधिक उपयोग से सेहत को लेकर जो खतरे हैं वे तो पहले ही सामने आने लगे हैं। अमरीका में चिकित्सकों ने एक शोध के जरिए यह बताया था कि जो बच्चे अपने सोशल मीडिया अकाउंट को बार-बार देखते हैं, उनके ब्रेन का आकार छोटा होने लगता है।
कर्नाटक हाईकोर्ट की चिंता पर सरकार ही कोई फैसला करे, इतना काफी नहीं है। बड़ी जिम्मेदारी अभिभावकों पर ही है। अगर माता-पिता चाहते हैं कि उनके बच्चे सोशल मीडिया से दूर रहें तो पहले उनको खुद पर अनुशासन कायम करना होगा। चिकित्सक भी ऐसा कहते हैं कि यह नहीं हो सकता अभिभावक खुद सोशल मीडिया पर सक्रिय नजर आएं और फिर अपने बच्चों को इससे दूर रहने की नसीहत दें। सोशल मीडिया मंच भी सदस्यता देने के ठोस कानून-कायदे तो बनाएं ही, सख्ती से इनकी पालना भी कराए। तब ही आभासी दुनिया से बच्चों पर मंडरा रहे खतरे को टाला जा सकेगा।