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ये कैसा ‘ मीडिया’ जो खबरें ब्रेक ही नहीं कर पाता! नए साल में टूटना चाहिए ये ढर्रा

media analysis 2026: ऐसा लगता है जैसे मीडिया के सूत्र अब कमजोर पड़ रहे हैं। इसीलिए उसे सत्ताधारी पार्टी से खबरें तभी मिल पाती हैं, जब पार्टी खुद उसे आम करती है।

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Why Indian media fails to break political news

पिछले एक दशक से ज्यादा समय से हमारा मीडिया एक क्षेत्र में बुरी तरह पिछड़ रहा है और वो है खबर ब्रेक करने की कुशलता। ये कहने में किंचित संकोच नहीं है कि मीडिया अपने मूल काम यानी कोई ऐसा तथ्य या सूचना जो पब्लिक को पता नहीं हो, उसे पहुंचाने में तीव्रता नहीं दिखा पा रहा है।

कई पुरोधा भी पिछड़ रहे

ताजा मामला यूपी बीजेपी के अध्यक्ष पंकज चौधरी की ताजपोशी हो या फिर बीजेपी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नितिन नबीन के नाम की घोषणा, ऐसी किसी भी खबर को मीडिया सत्ताधारी पार्टी की ऑफिशियल रिलीज से पहले ब्रेक ही नहीं कर पाया। कई पुरोधा जो अपने को सरकार और सत्ता के बेहद करीब मानने का दावा करते हैं, वो भी खबर ब्रेक नहीं पा रहे हैं। उन्हें भी केवल तभी पता चलता है जब सरकार और पार्टी खबर रिलीज कर सबको जानकारी देती है।

ऐसे तमाम उदाहरण मौजूद

इससे पहले की कई घटनाओं का अगर सही मूल्यांकन करेंगे तो आपका ये समझ आ जाएगा कि आज के दौर का 'मीडिया' सरकार और सत्ताधारी पार्टी की कोई भी खबर ब्रेक ही नहीं कर पाता। और ऐसा कोई एकाध बार नहीं हुआ है। राष्ट्रपति से लेकर उपराष्ट्रपति का चयन हो या फिर हरियाणा, मध्य प्रदेश या राजस्थान के मुख्यमंत्रियों का चयन, हर जगह 'मीडिया' के सूत्र फेल रहे हैं। इसका मतलब तो साफ है कि मीडिया के सूत्र अब कमजोर पड़ गए हैं। सत्ताधारी पार्टी अपने निर्णयों में इतनी गोपनीयता बरतती है कि खबर उसकी मर्जी के बिना बाहर नहीं आती, तो फिर सवाल उठता है कि भई ये कैसा 'मीडिया' है, जो जिस पर लगातार विपक्ष भी सरकार की गोद में बैठने का आरोप खुल्लम खुल्ला लगाता है, उसे वहां की खबर की भी भनक नहीं लगा पाती है।

गड़बड़ा गया है सिस्टम

मीडिया में खबरों के लिए सूत्रों का बड़ा महत्व रहा है, पत्रकार नेता-मंत्रियों से रिश्ते बढ़ाते हैं ताकि ब्रेकिंग खबरें दूसरों तक पहुंचने से पहले उनसे होकर गुजरें। ऐसे में उनकी विश्वसनीयता बनी रहे और वह खुद को 'सबसे तेज' भी साबित कर सकें। हालांकि, अब पूरा सिस्टम गड़बड़ाया सा लगता है। ब्रेकिंग खबरें डायरेक्ट रूट अपना रही हैं और मीडिया को खुद को सबसे तेज बताने का मौका ही नहीं मिल रहा है। तो सवाल है कि जब इस दौर में मीडिया को सत्ता के बेहद करीब बताया जा रहा है, तो इस नजदीकी का क्या मतलब? मीडिया सरकार से जुड़ी खबरें ही ब्रेक नहीं कर पा रहा है। अब यह उसकी अक्षमता है, लाचारी है या कोई अघोषित आदेश, कौन जाने! पर उम्मीद की लौ अभी भी बाकी है, नए साल में हो सकता है कि मीडिया को लेकर इस दृष्टिकोण में बदलाव नजर आए और मीडिया अपने मूल कार्य पर लौटता हुआ दिखे।