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उपचुनावों में भाजपा की हार: नकारात्मक माहौल, खतरे का संकेत

भाजपा जब असमान विचारधारा वाली पार्टियों के साथ गठबंधन कर सकती है तो वह टीडीपी के साथ तालमेल बिठाने में क्यों नाकाम रही?

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Sunil Sharma

Mar 17, 2018

amit shah

amit shah

- अतुल कौशिश, वरिष्ठ पत्रकार

लोकसभा उपचुनाव में करारी हार के बाद भाजपा नीत नेशनल डेमाके्रटिक एलायंस (एनडीए) को दूसरा बड़ा झटका तब लगा जब तेलुगुदेशम पार्टी ने गठबंधन से नाता तोडऩे का फैसला कर लिया। भाजपा को हुए ये दोनों ही नुकसान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा दोनों की लोकप्रियता में गिरावट की ओर इशारा करते हैं। लेकिन मीडिया में इस बात का कोई खास जिक्र नहीं है। हालांकि इससे सरकार पर कोई संकट नहीं है लेकिन भाजपा के लिए यह आत्मावलोकन का वक्त है। उसे व्यापक राजनीतिक दृष्टिकोण अपनाना होगा।

भाजपा ने जैसा वादा किया था कि वह कांग्रेस से अलग किस्म की पार्टी बनकर दिखाएगी, वैसा कुछ नहीं हुआ। पार्टी ने स्वयं को ऐसा स्वरूप देने की कोशिश भी नहीं की। यदि हमारी रक्षा तैयारियां कमजोर बताने वाली रिपोर्टों को सही माना जाए तो सरकार के इस दावे में भी संदेह ही है कि इस क्षेत्र में अकर्मण्यता और ‘पंगु नीतियों’ से छुटकारा मिल चुका है। भाजपा ने कुछ पार्टियों से बेमेल गठबंधन किए हैं। जम्मू कश्मीर में पीडीपी व पूर्वोत्तर में कुछ ऐसी पार्टियों के साथ, जिन्हें भाजपा स्वयं ‘अलग तरह की’ पार्टी मानती थी।

शिवसेना के बारे में भी संशय है कि वह भाजपा की पक्षधर है या विरोधी। भाजपा जब असमान विचारधारा वाली पार्टियों से साथ गठबंधन कर सकती है तो यह टीडीपी के साथ तालमेल बिठाने में क्यों नाकाम रही? भाजपा ने लोकसभा उपचुनाव में हार के लिए अति आत्मविश्वास, विपक्ष के अपवित्र गठबंधन और पार्टी की सोशल इंजीनियरिंग की विफलता को जिम्मेदार ठहराया है। लेकिन यह मानने को तैयार नहीं है कि वादे पूरे न होने का गुस्सा जनता ने चुनावों में निकाला है। कृषि, रोजगार और निवेश में नकारात्मक माहौल जगजाहिर है। पार्टी को नरम रुख अपनाते हुए विपरीत विचारधाराओं का भी स्वागत करना चाहिए। प्रतिद्वंद्वियों पर शब्दबाण ताने रहने वाले नेताओं के बजाए विनम्र नेता अधिक लोकप्रिय होते हैं।