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‘जुबली’ से झांकते हिंदी सिनेमा के स्याह और सफेद पन्ने

हिंदी सिनेमा के एक खास कालखंड में प्रवेश कर इतिहास की परतें उधेड़ते हुए 'जुबली' जितना सच बताती है, उससे कहीं अधिक उस दौर के सच ढूंढने को प्रेरित करती है। यही इसकी सार्थकता भी है।

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Patrika Desk

Apr 30, 2023

'जुबली' से झांकते हिंदी सिनेमा के स्याह और सफेद पन्ने

'जुबली' से झांकते हिंदी सिनेमा के स्याह और सफेद पन्ने

विनोद अनुपम
राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त कला समीक्षक


विक्रमादित्य मोटवाणे समय से खेलना जानते हैं। और फिर 1953 का कालखंड उनके लिए कोई अपरिचित भी नहीं। 'जुबली' के ठीक दस साल पहले 2013 में भी 1953 के बंगाल के ढहते सामंतवाद की पृष्ठभूमि पर वे एक प्यारी सी फिल्म लेकर आए थे, 'लुटेरा'। दर्शकों को समय से जोड़े रखने के लिए ही उन्होंने फिल्म की गति को भी नियंत्रित रखा था। 50 के दशक की फिल्मों की तरह 'लुटेरा' भी इतमीनान से चलती थी, एक-एक दृश्यों के साथ ठहर कर संवाद करते हुए।
'जुबलीÓ में भी यही नजर आया, प्राइम वीडियो के लगभग 50-50 मिनट की दस सीरीज में विक्रमादित्य दर्शकों को आराम से समय के साथ विचरने का अवसर देते हैं, ताकि वे समय को सिर्फ देखें नहीं, समय में प्रवेश करें, समय का अहसास करें। इस बार पृष्ठभूमि में हिंदी सिनेमा के 50 का दौर है। वही 50 का दौर जिसे हम विमल राय, गुरुदत्त, राजकपूर, महबूब खान, देव आनंद के लिए जानते रहे हैं। लेकिन, 'जुबलीÓ देखते हुए लगता है, इतिहास वही नहीं होता, जो हमें मालूम होने दिया जाता है। वह भी होता है जिसे हमें मालूम नहीं होने दिया जाता। इस वेब सीरीज के साथ लगभग आठ घंटे गुजारने के बाद लगता है, बात लव, सेक्स और धोखा की हो या फिर गलाकाट प्रतियोगिता की या फिर कंटेंट पर नियंत्रण की, हिंदी सिनेमा के आज का सच भी तो यही है, फिर 1953 क्यों? वास्तव में विक्रमादित्य को पता है कि सच पर समय की कोटिंग उसके कड़वेपन को कम कर देती है।
'जुबली' कितना इतिहास है, कितनी कल्पना, यह विक्रमादित्य समझने का अवसर नहीं देते। लेकिन, यह हिंदी सिनेमा के एक खास दौर की सच्चाई है, इसे स्थापित करने में वे कोई संकोच भी नहीं करते। कहानी एक फिल्म कंपनी 'राय टाकीज' की है, जिसे श्रीकांत राय और सुमित्रा राय चलाते हैं। दोनों पति पत्नी भी हैं, पार्टनर भी हैं, लेकिन दोनों के बीच विश्वास का एक भी धागा नहीं दिखता। जानकार इनमें उस समय के सफल स्टूडियो बांबे टाकीज के मालिक हिमांशु राय और देविका रानी की छवि ढूंढते हैं।
विक्रमादित्य इस सीरीज में कुछ तथ्यों को रेखांकित करते हुए इतिहास के उन स्याह पृष्ठों तक पहुंच जाते हैं, जिनकी हिंदी सिनेमा के इतिहास में कभी चर्चा ही नहीं होती। वर्ष 1952 में आकाशवाणी पर फिल्मी गाने बजाए जाने पर यह कहते हुए प्रतिबंध लगा दिया गया था कि ये पश्चिमी संस्कृति को बढ़ावा देते हैं। इसका एक कारण हिंदी सिनेमा के स्थापित व्यवसाय को कमजोर करना भी था, ताकि स्वतंत्र भारत का नया मित्र सोवियत संघ हिंदी सिनेमा में अपना वैचारिक प्रभुत्व कायम कर सके। विक्रमादित्य यह स्थापित करने में कतई संकोच नहीं करते कि 50 के दशक में रूसियों ने एक अभियान के तहत यहां प्रोपेगेंडा फिल्मों को बढ़ावा दिया। 50 के दशक की फिल्मों और फिल्म से जुड़े लोगों पर एक नजर डालें, तो वे यहां अतार्किक भी नहीं लगते। अधिकांश फिल्मकार रूसी दबाव के सामने समर्पण कर देते हैं, श्रीकांत राय झुकने को तैयार नहीं होते, तो उनका 'राय टाकीज' बंद करवा दिया जाता है। वे कहते हैं कि प्रोपेगेंडा के हिसाब से सिनेमा बनाने का कोई मतलब नहीं। सिनेमा तो कविता का आस्वाद देकर पब्लिक का लेवल ऊपर उठाने के लिए है। हिंदी सिनेमा के एक खास कालखंड में प्रवेश कर इतिहास की परतें उधेड़ते हुए 'जुबली' जितना सच बताती है, उससे कहीं अधिक उस दौर के सच ढूंढने को प्रेरित करती है। यही इसकी सार्थकता भी है।