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अनजान चेहरों से खून का रिश्ता बनाता है रक्तदान

। भारत में रक्त आधान का पहला लिखित वृत्तांत 1942 का मिलता है, जब द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान पश्चिमी बंगाल में ब्लड बैंक की स्थापना की गई थी। इस दिशा में डॉ. जे. जी. जॉली ने 70 के दशक में स्तुत्य कार्य किया और ब्लड बैंकों की स्थापना और निस्वार्थ रक्तदान को प्रेरित करने में योगदान दिया। इस बार विश्व रक्तदाता दिवस अभियान उन रोगियों पर केंद्रित किया गया है, जिन्हें जीवन भर रक्त के आधान की आवश्यकता होती है।

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Patrika Desk

Jun 14, 2023

अनजान चेहरों से खून का रिश्ता बनाता है रक्तदान

अनजान चेहरों से खून का रिश्ता बनाता है रक्तदान

पीयूष पाण्डेय
विज्ञान संचारक,
बेंगलूरु


हाल ही उड़ीसा में हुए रेल हादसे में लगभग 278 लोगों की मृत्यु हो गई और बड़ी संख्या में लोग घायल हो गए। जैसे ही आसपास के लोगों को इस घटना की सूचना मिली तो बहुत से लोग तो घटनास्थल की ओर सहायता करने को दौड़े और बहुत सारे लोग ऐसे भी थे, जो रक्तदान के लिए अस्पतालों और रक्तदान केंद्रों तक पहुंचे। उन्हें आभास था कि घायलों की चिकित्सा में भारी मात्रा में रक्त की आवश्यकता अवश्य पड़ेगी।
रक्तदान करके लोगों की जान बचाई जा सकती है। यही वजह है कि लोगों को इस मसले पर जागरूक करने के लिए हर वर्ष १4 जून को विश्व रक्तदाता दिवस मनाया जाता है। इस दिन नेक प्रकृति के लोग बढ़-चढ़कर रक्तदान में भाग लेते हैं। और, वे ऐसा वर्ष भर करते रहते हैं। मनुष्य के शरीर में 4 से 6 लीटर के बीच रक्त शरीर की रक्त वाहिनियों में संचार करता है। इसकी मात्रा आयु और शरीर सौष्ठव पर निर्भर करती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आह्वान पर इस बार रक्तदाता दिवस का स्लोगन है, 'रक्तदान करो, प्लाज्मा दान करो, जीवन बचाओ, बार-बार ऐसा करो।Ó यह दिन उन अनगिनत स्वैच्छिक, अवैतनिक रक्तदाताओं के महत्त्वपूर्ण योगदान को रेखांकित करने और इस कार्य के प्रति वैश्विक जागरूकता बढ़ाने के लिए गढ़ा गया था।
जीव विज्ञान अथवा चिकित्सा विज्ञान में रक्त को एक ऊतक या ऑर्गन कहा गया है। इसका अर्थ होता है शरीर का एक अंग। रक्तदान करना उतना ही महान कार्य है जितना शरीर के किसी अन्य अंग का दान करना, जैसे- आंख, यकृत (लिवर), किडनी। जब किसी व्यक्ति का रक्त या रक्त का कोई अवयव दूसरे व्यक्ति को चढ़ाया जाता है, तो इस प्रक्रिया को आधान या अंग्रेजी में ट्रांसफ्यूजन कहा जाता है। रक्त आधान का इतिहास चिकित्सा विज्ञान के विकास के समानांतर चला है। रक्तदान की प्रक्रिया सुरक्षित और अपेक्षाकृत दर्द रहित है। नियमित रक्तदान के दौरान आप अपने कुल रक्त का लगभग 47५ मिलीलीटर देते हैं। शरीर इस आयतन को 24 से 48 घंटों के भीतर पूरा कर लेता है, पर लाल रक्त कोशिकाओं की भरपाई में 10 से 12 सप्ताह लग जाते हैं। जिस बोतल या प्लास्टिक की थैली में रक्त को संरक्षित रखा जाता है, उसमें पहले से कुछ रसायन रखे होते हैं, जो रक्त को अवक्षेपण से बचाते हैं और उसे लंबी अवधि तक सुरक्षित रखते हैं। इस प्रकार किसी दाता का 475 मिलीलीटर रक्त बढ़कर 500 मिलीलीटर हो जाता है। इसे एक यूनिट रक्त कहा जाता है। पुरुष हर तीन महीने में एक बार सुरक्षित रूप से रक्तदान कर सकते हैं, जबकि महिलाएं हर चार महीने में एक बार। यदि पूर्ण रक्त के दान की बजाय केवल किसी एक घटक का आधान हो रहा हो, तो यह समय घट जाता है। जैसे, यदि केवल प्लाज्मा या प्लेटलेट्स का आधान किया गया हो तो इसे तीन महीने से पहले भी दुबारा किया जा सकता है।
प्लाज्मा रक्त का मुख्य घटक है और इसमें ज्यादातर पानी होता है, जिसमें प्रोटीन, आयन, पोषक तत्त्व और अपशिष्ट मिश्रित होते हैं। लाल रक्त कोशिकाएं शरीर में एक स्थान से दूसरे स्थान में ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड ले जाने का कार्य करती हैं। प्लेटलेट्स रक्त के थक्के जमाने का दायित्व निभाते हैं। श्वेत रक्त कोशिकाएं प्रतिरक्षा प्रणाली का हिस्सा हैं और प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया में भाग लेती हैं। कोशिकाएं और प्लेटलेट्स मानव रक्त का लगभग 45 प्रतिशत बनाते हैं, जबकि प्लाज्मा शेष 55 प्रतिशत।
गौरतलब है कि वर्ष 1972 में रक्त के घुले हुए और कोशिकीय घटकों के पृथक्करण और उपयोग में न आने वाले अवयव वापस दाता के रक्त में लौटाने की प्रक्रिया विकसित की गई। इससे मानव को बहुत फायदा हुआ। भारत में रक्त आधान का पहला लिखित वृत्तांत 1942 का मिलता है, जब द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान पश्चिमी बंगाल में ब्लड बैंक की स्थापना की गई थी। इस दिशा में डॉ. जे. जी. जॉली ने 70 के दशक में स्तुत्य कार्य किया और ब्लड बैंकों की स्थापना और निस्वार्थ रक्तदान को प्रेरित करने में योगदान दिया। इस बार विश्व रक्तदाता दिवस अभियान उन रोगियों पर केंद्रित किया गया है, जिन्हें जीवन भर रक्त के आधान की आवश्यकता होती है।