
law against rape
- कुमार प्रशांत, लेखक और कार्यकर्ता
ठट्ठ-के-ठट्ठ लोग - उन्माद से भरे और आक्रोश से कांपते-गरजते - फांसी दो, फांसी दो! किसे फांसी दो? बलात्कारी को! यह मध्यप्रदेश का मंदसौर है। बच्ची आठ साल की थी। स्कूल में छुट्टी हो गई, सारे बच्चे घर चले गए, यह बच्ची अटक गई क्योंकि घर से कोई लेने नहीं पहुंचा। जब पहुंचा तब तक बच्ची को ले कर कोई और ही चला गया था। घर वाले परेशान हाल पुलिस के पास पहुंचे और पुलिस वाले इस बिन बुलाई आफत को टालने की हर संभव कोशिश कर के भी जब टाल नहीं पाए तो बच्ची की गुमशुदगी दर्ज हुई। जब वह बच्ची किसी झाड़ी में मिली तो सबने कहा - यह दिल्ली के निर्भया कांड से भी आगे की दरिंदगी है।
कैसी विडंबना है कि हमने निर्भया कांड को अपना पैमाना बना लिया है। यह सारा घटनाक्रम कैसे चला, मैं न तो जानता हूं और न जानना चाहता हूं। मैं ठीक वहीं अटका हुआ हूं, जहां भीड़ ऐसी है और समवेत स्वर है - फांसी दो, फांसी दो। और मैं यही सोचने-समझने में लगा हूं कि मंदसौर जैसी छोटी जगह में यदि इतने सारे लोग बलात्कार जैसी घटना से सच में इस कदर उद्वेलित हैं तो क्या मुझे यह नहीं पूछ लेना चाहिए कि भाई, फिर आपके यहां बलात्कार हुआ कैसे? जिस समाज में इतने सारे लोग - पुरुष लोग - बलात्कार जैसी वारदात को इस तरह घृणित व निंदनीय मानते हैं, उसमें कोई बलात्कार की हिम्मत ही कैसे कर सकता है? इसलिए मैं मानता हूं कि बलात्कार के आईने में आप चाहें तो अपने समाज को देख सकते हैं।
बलात्कारी हमारे समाज का आदमी है। वह देखता और जानता है कि हम सब भी अपने घरों में या अपने समाज में लडक़ी की स्वतंत्र हैसियत, उसकी आजादी और उसकी स्वीकृति को स्वीकार नहीं करते हैं। क्या हमारे घरों में लडक़ी महफूज है? और समाज में? कहते हैं कि लडक़ी से सबसे ज्यादा मनमानी घर में होती है और वह भी रिश्तेदारों के बीच। यह सब वह बलात्कारी भी देखता है और जानता है कि ये लोग थोड़ा हल्ला-गुल्ला मचाएंगे और फिर सब जैसा है वैसा ही हो जाएगा। उसे याद है कि जब उसने निर्भया का काम तमाम किया था तब भी ऐसा ही आक्रोश उमड़ा था, वर्मा कमीशन भी बना था और देखते-देखते सरकार को उस कमीशन की सिफारिशों में पानी मिलाने की जरूरत दिखाई देने लगी थी। ‘लडक़ों से कुछ गलतियां हो जाती हैं’ जैसा घटिया तर्क चलाया जाने लगा था। उसने देखा है कि बलात्कार के बारे में हमारा नजरिया इस पर निर्भर करता है कि बलात्कार किसका हुआ है और बलात्कारी कौन है - धर्म भी और जाति भी और शिकार व शिकारी की हैसियत भी देखी जाती है। कठुआ के बाद का आलम क्या बलात्कारी ने नहीं देखा, उन्नाव के बाद क्या उसने आंखें बंद कर ली थीं? उसे यह भी पता है कि निर्भया के बाद भी दिल्ली में बलात्कार रुके नहीं और अगली वारदातों में कुछ वे लोग भी उसके साथ थे जो इंडिया गेट पर मोमबत्तियां जला रहे थे। मोमबत्तियां जब तक भीतर भी कुछ नहीं जलाती हैं तब तक रोशनी नहीं, धुआं उगलती हैं।
फांसी देने से न्याय कैसे होता है, मैं नहीं जानता हूं। फांसी से किसी गुनाह में कमी आती है, अनुभव और आंकड़े ऐसा नहीं बताते हैं। फांसी-फांसी से हमारा गुस्सा प्रकट होता है क्योंकि वह हमेशा दूसरे के लिए होता है। कहां सुनते हैं हम कि किसी ने अपने भाई से, अपने पति से, अपने पिता से नाता ही तोड़ लिया और उनकी फांसी की मांग करने लगा क्योंकि वह बलात्कारी है? फांसी की मांग कहीं एक आड़ तो नहीं है कि जिसके पर्दे में हम खुद को छिपाना चाहते हैं? एक मुख्यमंत्री तब कितना चतुर दिखाई देता है जब वह कानून-व्यवस्था बनाए रखने की अपनी विफलता छिपाने के लिए फांसी-फांसी करने लगता है?
कभी भाजपा के मुखर नेता रहे लालकृष्ण आडवाणी संसद में और बाहर एक ही राग अलापते थे कि अफजल गुरु को फांसी क्यों नहीं चढ़ाते? चढ़ा तो दिया लेकिन उस फांसी ने कितने नये अफजल गुरु पैदा किए, कभी इसका भी हिसाब लगाएंगे हम? अपराध की सजा ऐसी हो कि अपराधी अपराध से बाज आए और दूसरे उस रास्ते जाने से भय खाएं। अगर इन दोनों में से कुछ भी नहीं होता हो तो उसे सजा कैसे कहें हम? फिर तो हमें सजा की परिभाषा ही बदलनी होगी!
हमारे संविधान में और कानून में जब तक फांसी की सजा स्वीकृत है तब तक फांसी होगी। उसका फैसला हम अदालत पर छोड़ दें। उन्मादी भीड़ जब फांसी-फांसी की आवाज उठाती है और राजनेता अपना निकम्मापन छिपाने के लिए भीड़ को उकसाते हैं, तो उससे समाज का सामूहिक पतन होता है, उसका पाशवीकरण होता है और तब वही समाज निर्भया से भी ज्यादा क्रूर कर्म कर गुजरता है। यह दूसरा कोई नहीं, हम ही हैं जो किसी आसाराम या गुरमीत राम रहीम सिंह को भगवान का दर्जा देकर बलात्कार का आश्रम बनाने देते हैं। हम तब तक चुप रहते हैं जब तक भांडा नहीं फूटता है। मतलब बलात्कार हमारे भीतर हाहाकार नहीं मचाता है। अगर फांसी देनी ही है तो अपने भीतर के इस रेगिस्तान को फांसी दें हम। तब फंदा भी हमारा होगा और गला भी हमारा।

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